कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४३८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
४३८ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ५
षोडश खण्ड
अश्वपति और बुडिलका संवाद
फिर उसने अश्वतराश्वके पुत्र बुडिलसे कहा—'वैयाघ्रपद्य ! दर्शन करते हो। जो पुरुष इस वैश्वानर आत्माकी इस प्रकार
तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'पूज्य उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन
राजन् ! मैं तो जलकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है, किंतु यह
बोला—] 'जिसकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही आत्माका वस्ति ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा
रयिसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है, इसीसे तुम रयिमान् (धनवान्) कि—'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा वस्तिस्थान फट
और पुष्टिमन् हो। तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका जाता' ॥ १-२ ॥
सप्तदश खण्ड
अश्वपति और उद्दालकका संवाद
तत्पश्चात् राजाने अरुणके पुत्र उद्दालकसे कहा—'गौतम ! और प्रियका दर्शन करते हो। जो कोई इस वैश्वानर
तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'पूज्य आत्माकी इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता
राजन् ! मै तो पृथिवीकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता
बोला—] 'जिसकी तुम उपासना करते हो यह निश्चय ही है। किन्तु यह आत्माके चरण ही है।' ऐसा उसने कहा और
प्रतिष्ठासंज्ञक वैश्वानर आत्मा है। इसीसे तुम प्रजा और यह भी कहा कि—'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारे चरण
पशुओंके कारण प्रतिष्ठित हो। तुम अन्न भक्षण करते हो शिथिल हो जाते' ॥ १-२ ॥
अष्टादश खण्ड
अश्वपतिक वैश्वानर आत्माके सम्बन्धमे उपदेश
राजाने उनसे कहा—'तुम सब लोग इस वैश्वानर (द्युलोक) है, चक्षु विश्वरूप (सूर्य) है, प्राण पृथग्वर्त्मा
आत्माको अलग-सा जानकर अन्न भक्षण करते हो। जो कोई (वायु) है, देहका मध्यभाग बहुल (आकाश) है, वस्ति ही
'यही मैं हूँ' इस प्रकार अभिमानका विषय होनेवाले इस रयि (जल) है, पृथिवी ही दोनों चरण ह, वक्षःस्थल वेदी
प्रादेशमात्र वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह समस्त है, लोम दर्भ हैं, हृदय गार्हपत्याग्नि है, मन अन्वाहार्यपचन
लोकोंमें, समस्त प्राणियोंमें और समस्त आत्माओंमें अन्न भक्षण
करता है। उस इस वैश्वानर आत्माका मस्तक ही सुतेजा है और मुख आहवनीय है' ॥ १-२ ॥
एकोनविंश खण्ड
'प्राणाय स्वाहा' से पहली आहुति
अतः जो अन्न पहले आवे उसका हवन करना चाहिये, द्युलोकके तृप्त होनेपर जिस किसीपर द्युलोक और आदित्य
उस समय वह भोक्ता जो पहली आहुति दे उसे 'प्राणाय स्वाहा' (स्वामिभावसे) अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है और उसकी
ऐसा कहकर दे। इस प्रकार प्राण तृप्त होता है। प्राणके तृप्त तृप्ति होनेपर स्वय भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और
होनेपर नेत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, नेत्रेन्द्रियके तृप्त होनेपर सूर्य ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ १-२ ॥
तृप्त होता है, सूर्यके तृप्त होनेपर द्युलोक तृप्त होता है तथा
विंश खण्ड
'व्यानाय स्वाहा' से दूसरी आहुति
तत्पश्चात् जो दूसरी आहुति दे उसे 'व्यानाय स्वाहा' ऐसा होनेपर श्रोत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, श्रोत्रके तृप्त होनेपर चन्द्रमा
कहकर देना चाहिये। इससे व्यान तृप्त होता है। व्यानके तृप्त तृप्त होता है, चन्द्रमाके तृप्त होनेपर दिशाएँ तृप्त होती हैं तथा
खण्ड २४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४३९
दिशाओंके तृप्त होनेपर जिस किसीपर चन्द्रमा और दिशाएँ पश्चात् वह भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके
[स्वामिभावसे] अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है। उसकी तृप्तिके द्वारा तृप्त होता है ॥ १-२ ॥
एकविंश खण्ड
'अपान्याय स्वाहा' से तीसरी आहुति
फिर जो तीसरी आहुति दे उसे 'अपान्याय स्वाहा' ऐसा तृप्त होनेपर जिस किसीपर पृथिवी और अग्नि [स्वामिभावसे]
कहकर देना चाहिये । इससे अपान तृप्त होता है । अपानके तृप्त अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, एवं उसकी तृप्तिके पश्चात्
होनेपर वागिन्द्रिय तृप्त होती है, वाक्के तृप्त होनेपर अग्नि तृप्त भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त
होता है, अग्निके तृप्त होनेपर पृथिवी तृप्त होती है तथा पृथिवीके होता है ॥ १-२ ॥
द्वाविंश खण्ड
‘ स्वाहा' से चौथी आहुति
तदनन्तर जो चौथी आहुति दे उसे 'समानाय स्वाहा' है तथा विद्युत्के तृप्त होनेपर जिस किसीके ऊपर विद्युत् और
ऐसा कहकर देना चाहिये । इससे समान तृप्त होता है । पर्जन्य अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, एवं उसकी तृप्तिके अनन्तर
समानके तृप्त होनेपर मन तृप्त होता है, मनके तृप्त होनेपर भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त
पर्जन्य तृप्त होता है, पर्जन्यके तृप्त होनेपर विद्युत् तृप्त होती होता है ॥ १-२ ॥
त्रयोविंश खण्ड
'उदानाय स्वाहा' से पाँचवीं आहुति
फिर जो पाँचवीं आहुति दे उसे 'उदानाय स्वाहा' ऐसा आकाशके तृप्त होनेपर जिस किसीपर वायु और आकाश
कहकर देना चाहिये । इससे उदान तृप्त होता है। उदानके [स्वामिभावसे] अधिष्ठित हे वह तृप्त होता है, और उसकी
तृप्त होनेपर त्वचा तृप्त होती है, त्वचाके तृप्त होनेपर वायु तृप्तिके पश्चात् स्वय भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और
तृप्त होता है, वायुके तृप्त होनेपर आकाश तृप्त होता है तथा ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ १-२ ॥
• चतुर्विंश खण्ड
भोजनकी अग्निहोत्रत्वसिद्धिके लिये इस प्रकार हवन करनेका फल
वह, जो कि इस वैश्वानरविद्याको न जानकर हवन करता जो इस प्रकार जाननेवाला होकर अग्निहोत्र करता है उसके
है उसका वह हवन ऐसा है, जैसे अङ्गारोंको हटाकर भस्ममें समस्त पाप भस्म हो जाते हैं । अतः वह इस प्रकार जानने-
हवन करे, क्योंकि जो इस (वैश्वानर) को इस प्रकार जानने- वाला यदि चाण्डालको उच्छिष्ट भी दे तो भी उसका वह अन्न
वाला पुरुष अग्निहोत्र करता है उसका समस्त लोक, सारे भूत वैश्वानर आत्मामें ही हुत होगा । इस विषयमें यह मन्त्र है।
और सम्पूर्ण आत्माओंमें हवन हो जाता है ॥ १-२ ॥ जिस प्रकार इस लोकमें भूखे बालक सब प्रकार माताकी
इस विषयमें यह दृष्टान्त भी है—जिस प्रकार सींकका उपासना करते हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणी अग्निहोत्रकी उपासना
अग्रभाग अग्निमें घुसा देनेसे तत्काल जल जाता है उसी प्रकार करते हैं, अग्निहोत्रकी उपासना करते हैं ॥ ३-५ ॥
॥ पञ्चम अध्याय ॥ ५ ॥