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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

by गीताप्रेस

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished832 pages

ब्राह्मण ९ ] ४ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४८३

Page 519Permalink

ब्राह्मण ९ ] ४ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४८३
उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । यह जो शारीर-पुरुष है,
वही यह है। शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—],'अच्छा,
उसका देवता कौन है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'अमृत' ऐसा
कहा ॥ १० ॥
[ शाकल्य—] 'काम ही जिसका आयतन है, हृदय लोक
है और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण आध्यात्मिक
कार्य-करण-समूहका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता है।
याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान
कर रहे हो ! ] ।' [ याज्ञवल्क्य—] 'जिसे तुम सम्पूर्ण
आध्यात्मिक कार्य-करण-सघातका परम आश्रय बतलाते
हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह काममय
पुरुष है, वही यह है । हे शाकल्य ! और बोलो।'
[ शाकल्य—] 'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने
कहा—'स्त्रियाँ' ॥ ११ ॥
[ शाकल्य—] 'रूप ही जिसका आयतन है, चक्षु लोक
हैं और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म
कार्य-करण-समूहका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता है। हे
याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान
कर रहे हो ! ] ।' [याज्ञवल्क्य—] 'तुम जिसे सम्पूर्ण अध्यात्म
कार्य-करण-समूहका परम आश्रय बतलाते हो, उस पुरुषको
तो मैं जानता हूँ । जो भी यह आदित्यमे पुरुष है, वही यह
है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'उसका
देवता कौन है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'सत्य' ऐसा कहा ॥ १२ ॥
[ शाकल्य—] 'आकाश ही जिसका आयतन है, श्रोत्र
लोक है और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण
अध्यात्म कार्य-करण-समूहका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता
है। हे याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका
अभिमान कर रहे हो ! ] ।' [ याज्ञवल्क्य—] 'तुम जिसे
सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करण-समूहका परम आश्रय कहते हो, उस
पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह श्रोत्रसम्बन्धी प्रातिश्रुत्क
पुरुष है, वही यह है; हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—]
'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'दिशाएँ' ऐसा
कहा ॥ १३ ॥
[ शाकल्य—] 'तम ही जिसका आयतन है, हृदय लोक
है, मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-
करण-समूहका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता है, याज्ञवल्क्य !
[ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे
हो ! ] ।' [ याज्ञवल्क्य—] 'तुम जिसे समस्त आध्यात्मिक
कार्य-करण-समूहका परम आश्रय बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं
जानता हूँ । जो भी यह छायामय पुरुष है, वही यह है । हे
शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'उसका कौन
देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'मृत्यु' ऐसा कहा ॥ १४ ॥
[ शाकल्य—] 'रूप ही जिसका आयतन है, नेत्र लोक
हैं और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण अध्यात्म
कार्य-करण-सघातका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता है। हे
याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका
अभिमान कर रहे हो ! ] ।' [याज्ञवल्क्य—] 'तुम जिसे सम्पूर्ण
अध्यात्म कार्य करण-सघातका परम आश्रय बतलाते हो, उस
पुरुषको तो म जानता हूँ । जो भी यह आदर्श (दर्पण) के
भीतर पुरुष है, वही यह है । हे शाकल्य ! और बोलो।'
[ शाकल्य—] 'उसका देवता कौन है ?' तब याज्ञवल्क्यने
'असु' ऐसा कहा ॥ १५ ॥
[ शाकल्य—] 'जल ही जिसका आयतन है, हृदय लोक
है और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण अध्यात्म
कार्य-करण-सघातका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता है। हे
याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही विद्वान् होनेका
अभिमान कर रहे हो ! ] ।' [ याज्ञवल्क्य—] 'जिसे तुम सम्पूर्ण
अध्यात्म कार्य-करण-समूहका परम आश्रय बतलाते हो, उस
पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह जलमे पुरुष है, वही
यह है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [शाकल्य—] 'उसका
कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'वरुण' ऐसा कहा ॥ १६ ॥
[ शाकल्य—] 'वीर्य ही जिसका आयतन है, हृदय लोक
है और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म
कार्य-करण सघातका परम आश्रय जानता है, वही ज्ञाता है। हे
याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही विद्वान् होनेका अभिमान
कर रहे हो ! ]' [याज्ञवल्क्य—] 'जिसे तुम सम्पूर्ण अध्यात्म
कार्य-करण-सघातका परम आश्रय बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं
जानता हूँ । जो भी यह पुत्ररूप पुरुष है, वही यह है । हे
शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'उसका कौन देवता
है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'प्रजापति' ऐसा कहा ॥ १७ ॥
'शाकल्य !' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'इन ब्राह्मणोंने निश्चय
ही तुम्हें अगारे निकालनेका चिमटा बना रक्खा है' ॥ १८ ॥
'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा शाकल्यने कहा, 'यह जो तुम इन
कुरुपाञ्चालदेशीय ब्राह्मणोंपर आक्षेप करते हो सो क्या तुम
ब्रह्मवेत्ता हो—ऐसा समझकर करते हो ?' [ याज्ञवल्क्य—
मेरा ब्रह्मज्ञान यह है कि ] 'मैं देवता और प्रतिष्ठाके सहित