कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
दशम ब्राह्मण
ब्राह्मण १३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४९९
दशम ब्राह्मण
मरणोत्तर ऊर्ध्वगतिका वर्णन
जिस समय यह पुरुष इस लोकसे मरकर जाता है, उस होता है । उसमें होकर वह ऊपरकी ओर चढता है । वह
समय वह वायुको प्राप्त होता है । वहाँ वह वायु उसके लिये चन्द्रलोकमें पहुँच जाता है । वहाँ चन्द्रमा भी उसके लिये
छिद्रयुक्त हो जाता—मार्ग दे देता है, जैसा कि रथके पहियेका छिद्रयुक्त हो मार्ग देता है, जैसा कि दुन्दुभिका छिद्र होता है ।
छिद्र होता है । उसके द्वारा वह ऊर्ध्व होकर चढता है । वह उसके द्वारा वह ऊपरकी ओर चढता है । वह अशोक (शारीरिक
सूर्यलोकमें पहुँच जाता है। वहाँ सूर्य उसके लिये वैसा ही दुःखसे रहित ) और अधिम ( मानसिक दुःखशून्य ) लोकमें
छिद्ररूप मार्ग देता है, जैसा कि लम्बर नामके बाजेका छिद्र पहुँच जाता है और उसमें सदा—अनन्त कालतक अर्थात्
ब्रह्माके अनेक कल्पोंतक निवास करता है ॥ १ ॥
एकादश ब्राह्मण
व्याधिमें और मृत पुरुषके श्मशान-गमन आदिमें तपकी फल
व्याधियुक्त पुरुषको जो ताप होता है, वह निश्चय जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है । मरे
ही परम तप है, जो ऐसा जानता है, वह परम हुए मनुष्यको सब प्रकार जो अग्निमें रखते हैं, यह
लोकको ही जीत लेता है । मृत पुरुषको जो वनको निश्चय ही परम तप है, जो ऐसा जानता है, वह परम
ले जाते हैं, यह निश्चय ही परम तप है, जो ऐसा लोकको ही जीत लेता है ॥ १ ॥
द्वादश
अन्न एवं प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना
कोई कहते हैं कि अन्न ब्रह्म है; किंतु ऐसी बात नहीं है। सकता है और न अशुभ ही । ]' पिताने हाथसे निवारण करते हुए
क्योंकि प्राणके बिना अन्न सड़ जाता है । कोई कहते हैं— कहा—'प्रातृद ! ऐसा मत कहो। इन दोनोंकी एकरूपताको
प्राण ब्रह्म है; किंतु ऐसी बात नहीं है । क्योंकि अन्नके बिना प्राप्त होकर कौन परमताको प्राप्त होता है ?' अतः उससे उस
प्राण सूख जाता है । परंतु ये दोनों देव एकरूपताको प्राप्त ( प्रातृदके पिता ) ने 'वि' ऐसा कहा । 'वि' यही अन्न है ।
होकर परम भावको प्राप्त होते हैं—ऐसा निश्चयकर प्रातृद वि-रूप अन्नमें ही ये सब भूत प्रविष्ट हैं । 'रम्' यह प्राण है,
स्ट्रपिने अपने पितासे कहा था—'इस प्रकार जाननेवालेका क्योंकि र अर्थात् प्राणमें ही ये सब भूत रमण करते हैं ।
मैं क्या शुभ करूँ अथवा क्या अशुभ करूँ ? [ क्योंकि जो ऐसा जानता है, उसमें ये सब भूत प्रविष्ट होते हैं और
कृतकृत्य हो जानेके कारण उसका तो न कोई शुभ किया जा सभी भूत रमण करते हैं ॥ १ ॥
त्रयोदश
प्राणकी विविध रूपोंमें उपासना
'उक्थ' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे । प्राण ही सलोकताको प्राप्त होता है । 'साम' इस प्रकार प्राणकी उपासना
उक्थ है, क्योंकि प्राण ही सब इन्द्रियोंको उत्थापित करता है । करे । प्राण ही साम है, क्योंकि प्राणमें ही ये सब भूत सुसङ्गत
इस उपासकसे उक्थवेत्ता पुत्र उत्पन्न होता है । जो ऐसी होते हैं । समस्त भूत उसके लिये सुसङ्गत होते हैं, तथा
उपासना करता है, वह प्राणके सायुज्य और सालोक्यको उसकी श्रेष्ठतामें कारण होते हैं । जो इस प्रकार उपासना
प्राप्त करता है । 'यजुः' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे । करता है, वह सामके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता
प्राण ही यजु है, क्योंकि प्राणमें ही इन सब भूतोंका योग होता है । प्राण 'क्षत्र' है—इस प्रकार प्राणकी उपासना करे । प्राण
है । सम्पूर्ण भूत इसकी श्रेष्ठताके कारण इससे संयुक्त होते हैं । ही क्षत्र है । प्राण ही क्षत्र है—यह प्रसिद्ध है । प्राण इस
जो ऐसी उपासना करता है, वह यजुके सायुज्य और