कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण २ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ५०३
ब्राह्मण २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०३
मुझे बलि ( भेंट ) दिया करो।' [इन्द्रियोंने कहा—]
'बहुत अच्छा' ॥ ८–१३ ॥
उस वागिन्द्रियने कहा, 'मैं जो वसिष्ठा हूँ, सो तुम ही
उस वसिष्ठगुणसे युक्त हो।' 'मैं जो प्रतिष्ठा हूँ, सो तुम ही
उस प्रतिष्ठासे युक्त हो' ऐसा नेत्रने कहा। 'मैं जो समृद्ध हूँ,
सो तुम ही उस समृद्धिसे युक्त हो' ऐसा श्रोत्रने कहा। 'मैं
जो आयतन हूँ, सो तुम्हीं वह आयतन हो' ऐसा मनने
कहा। 'मैं जो प्रजाति हूँ, सो तुम ही उस प्रजातिसे
युक्त हो' ऐसा रेतस्ने कहा। [ प्राणने कहा-] 'किंतु ऐसे
गुणोंसे युक्त मेरा अन्न क्या है और वस्त्र क्या है ?' [ वागादि
बोले-] 'कुत्ते, कृमि और कीट-पतङ्गोंसे लेकर यह जो कुछ
भी है, वह सब तुम्हारा अन्न है और जल ही वस्त्र है।'
[ उपासनाका फल-] 'जो इस प्रकार प्राणके अन्नको जानता
है, उसके द्वारा अभक्ष्य-भक्षण नहीं होता और अभक्ष्यका
प्रतिग्रह (संग्रह) भी नहीं होता। ऐसा जाननेवाले श्रोत्रिय
भोजन करनेसे पूर्व आचमन करते हैं तथा भोजन करके
आचमन करते हैं। इसीको वे उस प्राणको अनग्न (वस्त्रयुक्त)
करना मानते हैं' ॥ १४ ॥
द्वितीय ब्राह्मण
पञ्चाग्निविद्या और उसे जाननेका फल; त्रिविध गतिका वर्णन
प्रसिद्ध है कि आरुणिका पुत्र श्वेतकेतु पञ्चालोंकी सभामें
आया । वह जीवलके पुत्र प्रवाहणके पास पहुँचा, जो
[ सेवकोंसे] परिचर्या करा रहा था। उसे देखकर प्रवाहणने
कहा, 'ओ कुमार !' वह बोला, 'जी !' [ प्रवाहण-] 'क्या
पिताने तुझे शिक्षा दी है ?' तब श्वेतकेतुने 'हाँ !' ऐसा उत्तर
दिया ॥ १ ॥
'जिस प्रकार मरनेपर यह प्रजा विभिन्न मागोंसे जाती है—
सो क्या तू जानता है ?' श्वेतकेतु बोला, 'नहीं !' [राजा-]
'जिस प्रकार वह पुनः इस लोकमें आती है—सो क्या तुझे
मालूम है ?' 'नहीं,' ऐसा श्वेतकेतुने उत्तर दिया। [राजा-]
'इस प्रकार पुनः-पुनः बहुतोंके मरकर जानेपर भी जिस प्रकार
वह लोक भरता नहीं है—सो क्या तू जानता है ?' 'नहीं,'
ऐसा उसने कहा । [ राजा-] 'क्या तू जानता है कि कितने
बारकी आहुतिके हवन करनेपर आप (जल) पुरुष-शब्दवाच्य
हो उठकर बोलने लगता है ?' 'नहीं,' ऐसा श्वेतकेतुने कहा।
'क्या तू देवयानमार्गका कर्मरूप साधन अथवा पितृयानका
कर्मरूप साधन जानता है, जिसे करके लोग देवयानमार्गको प्राप्त
होते हैं अथवा पितृयानमार्गको ? हमने तो मन्त्रका यह
वचन सुना है—मैंने पितरोंका और देवोंका, इस प्रकार दो
मार्ग सुने हैं, ये दोनों मनुष्योंसे सम्बन्ध रखनेवाले मार्ग हैं।
इन दोनों मागोंसे जानेवाला जगत् सम्यक् प्रकारसे जाता है।
तथा ये मार्ग [ द्युलोक और पृथिवीरूप ] पिता और माताके
मध्यमें हैं।' इसपर श्वेतकेतुने 'मैं इनमेंसे एक भी नहीं
जानता,' ऐसा उत्तर दिया ॥ २ ॥
फिर राजाने श्वेतकेतुसे ठहरनेके लिये प्रार्थना की। किंतु
वह कुमार ठहरनेकी परवा न करके चल दिया। वह सीधा
अपने पिताके पास आया और उससे बोला, 'आपने यही कहा
था न कि मुझे सब विषयोंकी शिक्षा दे दी गयी है ?'
[ पिता-] 'हे सुन्दर धारणाशक्तिवाले ! क्या हुआ ?'
[ पुत्र-] 'मुझसे एक क्षत्रियबन्धुने पाँच प्रश्न पूछे थे, उनमेंसे
मैं एकको भी नहीं जानता।' [ पिता-] 'वे कौन-से थे ?'
[ पुत्र-] 'ये ये' ऐसा कहकर उसने उन प्रश्नोंके प्रतीक
बतलाये ॥ ३ ॥
पिताने कहा, 'हे तात ! तू हमारे कथनानुसार ऐसा
समझ कि हम जो कुछ जानते थे, वह सब हमने तुझसे कह
दिया था। अब हम दोनों वहीं चलें और ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक
उसके यहाँ निवास करेंगे।' [ पुत्र-] 'आप ही जाइये।'
तब वह गौतम जहाँ जैवलि प्रवाहणकी बैठक थी, वहाँ आया।
उसके लिये आसन लाकर राजाने जल मँगवाया और उसे
अर्घ्यदान किया। फिर बोला, 'मैं पूज्य गौतमको वर देता
हूँ।' (आप जिस उद्देश्यसे यहाँ पधारे हैं, वह बतलाइये।
मैं उसकी पूर्ति करूँगा।) उसने कहा, 'आपने मुझे जो वर
देनेके लिये प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार आपने कुमारसे
जो बात पूछी थी, वह मुझसे कहिये।' उसने कहा, 'गौतम !
वह वर तो दैव वरोंमेंसे है, तुम मनुष्यसम्बन्धी वरोंमेंसे
कोई वर माँगो' ॥ ४-६ ॥
गौतमने कहा, 'आप जानते हैं, वह तो मेरे पास है।
मुझे सुवर्ण तथा गौ, अश्व, दासी, परिवार और वस्त्र
भी प्राप्त है । आप महान्, अनन्त और निःसीम धनके
दाता होकर मेरे लिये अदाता न हों।' [ राजा-]
५०४ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ६
'तो गौतम ! तुम शास्त्रोक्त विधिसे उसे पानेकी इच्छा करो।'
[ गौतम— ] 'अच्छा, मैं आपके प्रति शिष्यभावसे उपसन्न
( प्राप्त ) होता हूँ। पहले ब्राह्मणलोग वाणीसे ही क्षत्रियादिके
प्रति उपसन्न होते रहे हैं।' इस प्रकार उपसत्तिका वाणीसे
कथनमात्र करके गौतम वहाँ रहने लगा [ सेवा आदिके द्वारा
नहीं ]। उस राजाने कहा, 'गौतम ! जिस प्रकार तुम्हारे
पितामहोंने हमारे पूर्वजोंका अपराध नहीं माना, उसी प्रकार
तुम भी हमारा अपराध न मानना। इससे पूर्व यह विद्या
किसी ब्राह्मणके यहाँ नहीं रही। उसे मैं तुम्हारे ही प्रति
कहता हूँ। भला, इस प्रकार विनयपूर्वक बोलनेवाले तुमको
निषेध करनेमें (विद्या देनेसे अस्वीकार करनेमें ) कौन समर्थ
हो सकता है ?' ॥ ७-८ ॥
गौतम ! वह लोक ( द्युलोक ) ही अग्नि है। उसका
आदित्य ही समिध् ( ईंधन ) है, किरणें धूम हैं, दिन
ज्वाला है, दिशाएँ अङ्गार हे, अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग
( चिनगारियाँ ) हैं। उस इस अग्निमे देवगण श्रद्धाको हवन
करते हैं, उस आहुतिसे सोम राजा होता है। गौतम ! पर्जन्य-
देवता ही अग्नि है। उसका संवत्सर ही समिध् है, बादल धूम
हैं, विद्युत् ज्वाला है, अशनि ( इन्द्रका वज्र ) अङ्गार है, मेघ-
गर्जन विस्फुलिङ्ग है। उस इस अग्निमें देवगण सोम राजाको
हवन करते हैं। उस आहुतिसे वृष्टि होती है। गौतम ! यह
लोक ही अग्नि है। इसकी पृथिवी ही समिध् है, अग्नि धूम
है, रात्रि ज्वाला है, चन्द्रमा अङ्गार है और नक्षत्र विस्फुलिङ्ग
हैं। उस इस अग्निमें देवता वृष्टिको होमते हैं, उस आहुतिसे
अन्न होता है। गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसका खुला
हुआ मुख ही समिध् है, प्राण धूम है, वाक् ज्वाला है,
नेत्र अङ्गार हैं, श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं। उस इस अग्निमें
देवगण अन्नको होमते हैं। उस आहुतिसे वीर्य होता है।
गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उपस्थ ही उसकी समिध् है,
लोम धूम हैं, योनि ज्वाला है, जो मैथुनव्यापार है वह
अङ्गार है, आनन्दलेश विस्फुलिङ्ग है। उस इस अग्निमे
देवगण वीर्य होमते हैं। उस आहुतिसे पुरुष उत्पन्न होता है।
वह जीवित रहता है। जबतक कर्मशेष रहते हैं, वह जीवित
रहता है, और जब मरता है, तब उसे अग्निके पास ले
जाते हैं। उस ( आहुतिभूत पुरुष ) का अग्नि ही अग्नि
होता है, समिध् समिध् होती है, धूम धूम होता है, ज्वाला
ज्वाला होती है, अँगारे अङ्गार होते हैं और विस्फुलिङ्ग
विस्फुलिङ्ग होते हैं। उस इस अग्निमे देवगण पुरुषको होमते
हैं। उस आहुतिसे पुरुष अत्यन्त दीप्तिमान् हो जाता
है ॥ ९-१४ ॥
वे जो [ गृहस्थ ] इस प्रकार इस ( पञ्चाग्निविद्या ) को
जानते है तथा जो [ सन्न्यासी या वानप्रस्थ ] वनमें
श्रद्धायुक्त होकर सत्य ( सगुण ब्रह्म ) की उपासना करते
हैं, वे ज्योतिके अभिमानी देवताओको प्राप्त होते हैं,
ज्योतिके अभिमानी देवताओंसे दिनके अभिमानी देवताको,
दिनके अभिमानी देवतासे शुक्लपक्षाभिमानी देवताको और
शुक्लपक्षाभिमानी देवतासे जिन छः महीनोंमे सूर्य उत्तरकी
ओर रहकर चलता है, उन उत्तरायणके छः महीनोंके
अभिमानी देवताओंको [ प्राप्त होते हैं ]; पण्मासाभिमानी
देवताओंसे देवलोकको, देवलोकसे आदित्यको और आदित्य-
से विद्युत्सम्बन्धी देवताओंको प्राप्त होते हैं। उन वैद्युत
देवोंके पास एक मानस पुरुष आकर इन्हें ब्रह्मलोकोंमें ले जाता
है। वे उन ब्रह्मलोकोंमें अनन्त संवत्सरपर्यन्त रहकर [ भगवान्-
को प्राप्त हो जाते ] हैं। उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती ॥१५॥
और जो [ सकाम ] यज्ञ, दान, तपके द्वारा लोकोंको जीतते
हैं, वे धूम ( धूमाभिमानी देवता ) को प्राप्त होते हैं, धूमसे
रात्रिदेवताको, रात्रिसे अपक्षीयमाणपक्ष ( कृष्णपक्षाभिमानी
देवता ) को, अपक्षीयमाणपक्षसे जिन छः महीनोमे सूर्य
दक्षिणकी ओर होकर जाता है, उन छः मासके देवताओंको,
छः मासके देवताओंसे पितृलोकको और पितृलोकसे चन्द्रमाको
प्राप्त होते हैं। चन्द्रमामे पहुँचकर वे अन्न हो जाते हैं। वहाँ
जैसे ऋत्विक्गण सोम राजाको 'आप्यायस्व-अपक्षीयस्व'
ऐसा कहकर चमसे भरकर पी जाते हैं, उसी प्रकार इन्हे
देवगण भक्षण कर जाते हैं। जब उनके कर्म क्षीण हो
जाते है तो वे इस आकाशको ही प्राप्त होते हैं। आकाशसे
वायुको, वायुसे वृष्टिको और वृष्टिसे पृथिवीको प्राप्त होते हैं।
पृथिवीको प्राप्त होकर वे अन्न हो जाते हैं। फिर वे पुरुषरूप
अग्निमे हवन किये जाते हैं। उससे वे लोकके प्रति उत्थान
करनेवाले होकर स्त्रीरूप अग्निमे उत्पन्न होते हैं। वे इसी
प्रकार पुनः-पुनः परिवर्तित होते रहते हैं और जो इन दोनों
मागोंको नहीं जानते, वे कीट, पतग और डाँस मच्छर आदि
होते हे ॥ १६ ॥