कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ५ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ६१५
अध्याय ५ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६१५
से पूर्व जो इच्छा होती है, उसे ज्ञानीजन शुभेच्छा कहते हैं। शास्त्र
तथा सज्जनोंके सम्पर्कके कारण अभ्यास और वैराग्यके साथ-
साथ जो सदाचरणकी प्रवृत्ति है, वह विचारणा कहलाती है।
विचारणा और शुभेच्छाके द्वारा इन्द्रियोंके विषयोंमें अनुरक्ति
जब क्षीणताको प्राप्त होती है, तब वह तनुमानसी अवस्था कहलाती
है। इन तीनों भूमियोंके अभ्याससे वैराग्यके वशीभूत हो जब
चित्त शुद्ध सत्त्वस्वरूपमें स्थित होता है, तब उसे सत्त्वापत्ति
कहते हैं। इन चारों भूमियोंके अभ्याससे सत्त्वारूढ होकर
चमकनेवाली जो असंगहीन कला है, वह असंसक्ति कहलाती
है। इन पाँचों भूमियोंके अभ्यासके फलस्वरूप दृढ़तापूर्वक अपने
आत्मामें ही रमण करते रहनेसे तथा आन्तर और बाह्य पदार्थोंकी
भावना नष्ट हो जानेसे जिसमें दूसरोंके द्वारा चिरकालतक प्रयत्न
करानेपर बाह्यभान होता है, वह पदार्थाभावना नामकी षष्ठ भूमिका
है। इन छ भूमियोंमें चिरकालतक अभ्यास करनेके बाद
भेदबुद्धिका अभाव हो जानेके कारण जो आत्मभावमें एकनिष्ठा
हो जाती है, वह तुर्यगा स्थिति कहलाती है। यही तुर्यावस्था
जीवन्मुक्त पुरुषकी होती है। इसके पश्चात् जो तुर्यातीत
अवस्था है, वह विदेहमुक्तिका विषय है। निदाघ ! जो महा-
भाग्यवान् पुरुष सप्तमी भूमिकाका आश्रय ले चुके हैं, वे आत्मामें
रमण करनेवाले महात्मा महान् पदको प्राप्त हो गये हैं।
जीवन्मुक्त पुरुष सुख दु खके अनुभवकी स्थितिमें नहीं पड़ते।
वे कभी कर्त्तव्य-कर्मोंमें लगे रहते हैं और कभी उनमें अलग हो
जाते हैं। अपने पासके लोगोंके द्वारा चेताये जानेपर सोकर जगे
हुएके समान उठकर, सनातन आचारोंका आचरण करने लगते
हैं। ये सात भूमिकाएँ बुद्धिमान् पुरुषोंकी ही ज्ञात होती हैं।
इन ज्ञानावस्थाओंको प्राप्तकर जो पशु, म्लेच्छ आदि हैं, वे
भी देह रहते या देह त्यागनेके बाद मुक्तिको प्राप्त करते हैं-
इसमें सन्देह नहीं है। हृदयकी गाँठोंका खुल जाना ही ज्ञान है,
और ज्ञान होनेपर ही मुक्ति होती है ॥ २२-४० ॥
'मृगतृष्णामें जलकी भ्रान्तिके समान अनात्ममे आत्मबुद्धि
आदि अविद्याकी शान्ति ही मुक्ति है, जो मोहसागरसे पार हो गये
हैं, उन्होंने ही परम पदको प्राप्त किया है। वे आत्मसाक्षात्कार-
की प्राप्तिमे लगे हुए पुरुष इन भूमिकाओंमे स्थित होते हैं।
मनकी पूर्णत शान्तिके उपायको योग कहते हैं। उस योगकी
सात भूमिकाएँ हैं और उन भूमिकाओंको ऊपर बतला
आये हैं। इन भूमिकाओंका लक्ष्य है ब्रह्मपदकी प्राप्ति-
जहाँ तू, मैं, अपने और परायेका कोई भाव नहीं रहता, न
कोई भावात्मक बुद्धि होती है और न भावाभावका चिन्तन
होता है। सब शान्त, आलम्बनशून्य, आकाशस्वरूप, शाश्वत,
शिव, दोषरहित, भासमान न होनेवाला, अनिर्वचनीय, कारण-
हीन, न सत् न असत्, न मध्य न अन्त, सम्पूर्ण नहीं और
सम्पूर्ण भी, मन और वाणीके द्वारा अग्राह्य, पूर्णसे पूर्ण,
सुखसे सुखतरस्वरूप, संवेदनमें न आनेवाला, पूर्ण शान्त,
आत्मसाक्षात्कारस्वरूप तथा व्यापक ब्रह्मका स्वरूप है।
समस्त जागतिक पदार्थोंकी सत्ता आत्मसंवेदनके अतिरिक्त
दूसरी कुछ नहीं है ॥ ४१-४७ ॥
'द्रष्टा और दृश्यका सम्बन्ध होनेपर बीचमें दृष्टिका जो
स्वरूप होता है, वह द्रष्टा, दृश्य तथा दर्शनकी त्रिपुटीसे वर्जित
साक्षात्काररूप स्थिति होती है। चित्त जब एक देशसे दूसरे
देशको जाता है, तब बीचमे जो चित्तकी स्थिति होती है, उस
जाड्यविहीन सच्चिद्रूप मननमे सदा तन्मय रहो। जाग्रत्,
स्वप्न और सुषुप्तिसे परे जो तुम्हारा सनातन स्वरूप है, उस
जड़ चेतनरहित स्थितिमे सदा तन्मय रहो। एक जड़ताको
छोड़कर - क्योंकि वह पत्थरका हृदय है, पाषाणरूपताकी प्राप्ति
है-उससे रहित जो अमनस्क स्थिति है, सदा उसमे तन्मय रहो।
चित्तको दूरसे त्यागकर जिस किसी स्थितिमे हो, उसीमें स्थिर
रहो। परमात्मतत्त्वसे पहले मन निकला। तत्पश्चात् मनसे ही
विश्वजालसे पूर्ण यह जगत् विस्तृत हुआ। हे विप्र ! शून्यसे
भी शून्य उत्पन्न होता है, जैसे आकाश शून्य है और उससे
सुन्दर लगनेवाली नीलिमा उल्लसित होती है। सङ्कल्पके नाश
हो जानेके कारण जब चित्त गलित हो जाता है, तब संसारके
मोहका कुहासा भी गल जाता है। तब शरद्के आनेपर
स्वच्छ आकाशके सदृश वह अजन्मा, सबका आदि और अनन्त
एक चिन्मात्र विभासित हो उठता है। बिना कर्ताके
और बिना रंगके आकाशमें चित्र उठ आया। बिना द्रष्टाके,
स्वानुभव, निद्राविहीन स्वप्नदर्शन हो रहा है। साक्षीस्वरूप,
समानरूपसे स्वच्छ, निर्विकल्प, दर्पण-जैसे चिदात्मामें
बिना इच्छाके तीनों जगत् प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। ब्रह्म एक
है, चिदाकाशरूप है, सर्वस्वरूप है और अखण्डित है-
चित्त चाञ्चल्यकी शान्तिके लिये यत्नपूर्वक यह भावना
करनी चाहिये। जिस प्रकार एक मोटी शिलापर रेखाएँ और
उपरेखाएँ खिंची होती हैं, उसी प्रकार त्रैलोक्यसे खचित एक
ब्रह्मको देखना चाहिये। किसी दूसरे कारणके न होनेपर यह
जगत् उत्पन्न ही नहीं हुआ। अब मैने जो जानना था, उसे जान
लिया; जो अद्भुत देखना था, उसे देख लिया। चिरकालका