कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ४ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ६१३
अध्याय ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६१३
है। सम्यक् प्रज्ञावान् पुरुष नाममात्रके लिये भी कहीं अविद्या-
को अङ्गीकार नहीं करते। इस दुःख-कण्टकसे आकीर्ण
संसाररूपी भ्रमजालमें तभीतक अविद्या अपने साथ शरीरीको
निरन्तर भ्रमाती है, जबतक इसको नष्ट करनेवाली मोहनाशिनी
आत्मसाक्षात्कारकी इच्छा स्वयं उत्पन्न नहीं होती। अविद्या
जब परतत्त्वकी ओर अवलोकन करती है, तब इसका अपने-
आप विनाश हो जाता है। सर्वात्मबोध दृष्टिगत होनेपर अविद्या
स्वयं ही विलीन हो जाती है। इच्छामात्र अविद्याका स्वरूप
है, इच्छाके पूर्णतः नाशको ही मोक्ष कहते हैं और
मुनि ! इच्छाका नाश सङ्कल्परहित होनेपर ही सिद्ध होता
है ॥ १०३-११६ ॥
'चित्ताकाशमे वासनारूपी रजनीके तनिक भी क्षीण होने
पर, चेतनारूपी सूर्यके प्रकाशसे कलिरूपी तम क्षीणताको प्राप्त
हो जाता है। चित्त जब विषयोंके पीछे नहीं पड़ता तथा सामान्यतः
सर्वगामी बन जाता है, तब चित्तकी ऐसी अनिर्वचनीय अवस्था ही
आत्मा और परमेश्वरनामसे अभिहित होती है। यह सब कुछ
निश्चय ही ब्रह्म है। वह नित्य और चिद्धनस्वरूप है। वह
अव्यय है। इसके सिवा जो दूसरी मन नामकी कल्पना है, वह
कहीं है ही नहीं। केवल भ्रममात्र है। इस त्रिलोकीम न कोई
जन्मता है न मरता है। ये जो भावविकार दीख पड़ते हैं,
इनका कहीं अस्तित्व नहीं है। एकमात्र, केवल आभासरूप,
सर्वव्यापी, अव्यय और चित्तके विषयोंके पीछे न दौड़नेवाले
केवल चिन्मात्रकी ही सत्ता यहाँ है। उस नित्य, व्यापक, शुद्ध,
चिन्मात्र, उपद्रवशून्य, शान्त, शमस्वरूपमें स्थित निर्विकार
चिदात्मामें स्वयं चित् ही जो स्वभावानुसार सङ्कल्प करके
दौड़ता है, वह चैत्य अर्थात् चित्की सङ्कल्पावस्था स्वयं
दोषरहित होते हुए भी मनन करनेके कारण मन कहलाती है।
अतएव सङ्कल्पके द्वारा सिद्ध मन सङ्कल्पके द्वारा ही विनाश-
को प्राप्त होता है ॥ ११७-१२३ ॥
'मैं ब्रह्म नहीं हूँ, इस सङ्कल्पके सुदृढ हो जानेसे मन बन्धन-
में पड़ता है, तथा 'सब कुछ ब्रह्म ही है' इस सङ्कल्पके सुदृढ होने-
पर मन मुक्त हो जाता है। 'मैं दुबला हूँ, दुःखग्रस्त हूँ, मैं
हाथ-पैरवाला हूँ'—इस भावके अनुकूल व्यवहारसे जीव बन्धनमें
पड़ता है। 'मैं दुःखी नहीं हूँ, मेरा शरीर नहीं, आत्मतत्त्वमे
स्थित मुझको बन्ध कहाँ !'—इस प्रकारके व्यवहारसे लीन
मन मुक्त हो जाता है। 'मै मास नहीं, मे अस्थि नहीं, मै देहसे
परे दूसरा ही तत्त्व हूँ'—इस प्रकार का निश्चय कर लेनेपर जिसके
अन्तःकरणसे अविद्या क्षीण हो गयी है, वह मुक्तिको प्राप्त
होता है। अनात्म पदार्थमे आत्मभावना होनेसे यह अविद्या
कल्पनामात्रा है। परम पुरुषार्थ अर्थात् अभ्यास और वैराग्यका
आश्रय लेकर बहुत बुद्धिमत्तापूर्वक, यत्नसे भोगकी इच्छाका
दूरसे ही त्याग करके निर्विकल्प होकर सुखी हो जाओ। 'मेरा
पुत्र, मेरा धन, मै वह हूँ, यह हूँ, यह मेरा है'—यह सब
वासना ही इन्द्रजाल फैलाकर विविध खेल कर रही है। तुम
अज्ञ मत बनो, तुम ज्ञानी बनो, सासारिक भावनाको नष्ट कर दो।
अनात्म पदार्थमे आत्मभावना करके क्यों मूर्खकी भाँति रो
रहे हो। यह मासका पिण्ड, अपवित्र, मूक, जड शरीर तुम्हारा
कौन है, जिसके लिये बलात् दुःख सुखसे अभिभूत हो रहे
हो ? अहा ! कितने आश्चर्यकी बात हे कि जो ब्रह्म सत्य है, उसे
मनुष्योंने भुला दिया है। तुम कर्तव्य-कर्मोमे रत रहते हुए
मनको कभी उनके प्रति रागानुरञ्जित मत होने दो। अहा ! कैसी
आश्चर्यकी बात है कि कमलनालके तन्तुओंसे पर्वत बाँध दिये
गये हैं। जो अविद्या है ही नहीं, उसीके द्वारा यह विश्व अभिभूत
हो रहा है। उस अविद्याके कारण तृणके समान तुच्छ जाग्रत्
आदि तीनों जगत् वज्रवत् हो रहे हैं' ॥ १२४-१३४ ॥
॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥