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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

काण्डकी जो कुछ और जितनी भी प्रवृत्ति है, वह सब आत्मा

५० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

[बायाँ स्तम्भ]

और उसके नित्यत्व आदिका वर्णन किया गया है तथा कर्म-
काण्डकी जो कुछ और जितनी भी प्रवृत्ति है, वह सब आत्मा
और उसकी नित्यताका अवलम्बन लेकर ही है, तथापि वैदिक
कर्मकाण्ड आदिके द्वारा आत्माकी नित्य, निरतिशय, आनन्द-
मय, प्रकाशमय सर्वात्मरूपताका ज्ञान नहीं हो सकता । केवल
आत्माकी नित्यताका प्रतिपादन करनेमात्रसे कर्मकाण्डका
प्रयोजन सिद्ध हो जाता है । इसके सिवा आत्माकी सर्वात्मता
और एकताका प्रतिपादन कर्मकाण्डके विरुद्ध भी पड़ता है ।
अतएव आत्माके एकत्वका प्रतिपादन करना भेदको औपाधिक
बतलाना, जीवात्मा और परमात्मामें भी वास्तविक भेदका
अभाव बतलाना, आत्माकी अखण्ड चिदानन्दैकरसरूपताका
अनुभव कराना—आदि सब कुछ उपनिषदोंका कार्य है ।
इसीमें सारी उपनिषदोंका, विशेषतः 'ईशावास्य' से लेकर
'कैवल्य' पर्यन्त द्वादश उपनिषदोंका परम तात्पर्य है । आचार्य
शङ्कर भगवत्पादने भी अपने भाष्यमें इसी अभिप्रायको
अभिव्यक्त किया है—

सैन्धवघनवद् अनन्तरमबाह्यमेकरसं ब्रह्मेति विज्ञानं
सर्वस्वासूपनिषत्सु प्रतिपिपादयिषितोऽर्थ ।****तथा सर्व-
शाखोपनिषत्सु च ब्रह्मैकत्वविज्ञानं निश्चितोऽर्थः ।
(बृहदारण्यक० १।४।१०)

तथा—

इष्यते च सर्वोपनिषदा सर्वात्मैक्यप्रतिपादकत्वम् ।
(माण्डूक्य० १।३)

'ब्रह्म नमकके डलेके समान अन्तररहित (व्यवधानशून्य
अविच्छिन्न) है, वह बाह्यभेदसे रहित है अर्थात् बाहरसे कुछ
और भीतरसे कुछ—ऐसा नहीं है तथा सर्वदा एकरस है ।
सम्पूर्ण उपनिषद्मे इसी विज्ञानका प्रतिपादन करना अभीष्ट है।'

'इसी प्रकार सम्पूर्ण शाखाओंकी उपनिषदोंमें भी 'ब्रह्मकी
एकताका विज्ञान' ही सिद्धान्तभूत अर्थ है।'

सारी उपनिषदें सबके आत्माकी एकताका ही प्रतिपादन
करनेवाली हैं, यही मानना अभीष्ट है ।

इस भाष्यपर विवृत्ति लिखते हुए आनन्दगिरि कहते हैं—

उपक्रमोपसंहारैकरूप्यादिना सर्वासामुपनिषदां सर्वेषु
देहेषु आत्मैक्यप्रतिपादनपरत्वमिष्टम् ।

'उपक्रम और उपसंहारकी एकरूपता आदि तात्पर्य-
निर्णयके छ. हेतुओको दृष्टिमें रखते हुए यही मानना इष्ट है
कि सम्पूर्ण उपनिषदें सब देहोंमें स्थित आत्माकी एकताका
ही प्रतिपादन करनेमें तत्पर हैं।' इस विषयमें अर्थात् जीवात्मा


[दायाँ स्तम्भ]

और परमात्माकी एकता तथा सब जीवोकी परस्पर एकताके
प्रतिपादनमे और आत्मा अखण्डानन्दरूप, चिन्मय एव
एकरस है—इस तथ्यके वर्णनमे इन सभी उपनिषदोंका
कण्ठस्वर एक है । इस विषयको लेकर उनमें तनिक भी मत-
भेद नहीं है । यह बात नीचे उद्धृत किये हुए वचनोंसे
स्पष्टतः जानी जा सकती है—

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥
(ईश० ६)

'जो सब भूतोंको आत्मामे ही देखता है तथा सब भूतों-
में आत्माको ही देखता है, वह इस सर्वात्मभावके दर्शनके
कारण किसीसे भी घृणा नहीं करता।'

यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
(केन० १।४)

'जो वाणीके द्वारा अभिव्यक्त नहीं होता । जिसके द्वारा
वाणी अभिव्यक्त होती है, उसे ही तुम ब्रह्म जानो । अज्ञानी-
जन जिस देश कालादिसे परिच्छिन्न वस्तुकी उपासना करते हैं,
यह ब्रह्म नहीं है।'

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा
एकं रूपं बहुधा य. करोति ।'
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-
स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥
(कठ० २।२।१२)

'जो एक, सबको अपने वशमे रखनेवाला और सब
प्राणियोंका अन्तरात्मा है तथा जो अपने एक रूपको ही नाना
रूपोमे व्यक्त करता है—अपनी बुद्धिमे स्थित उस आत्मदेव
को जो धीर (विवेकी) पुरुष देखते हैं, उन्हींको शाश्वत
सुखकी प्राप्ति होती है, दूसरोंको नही।'

अङ्गुष्ठमात्र पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।
ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्व. ॥
(कठ० २।१।१३)

'वह पुरुष अङ्गुष्ठमात्र तथा धूमविहीन ज्योतिके समान
है । वह जो कुछ हुआ है तथा होनेवाला है, सबका शासक
है, वही आज है और वही कल भी रहेगा।'

परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरम-
लोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य । स सर्वज्ञः सर्वो
भवति ।
(प्रश्न० ४।१०)

  • उपनिषद्में ज्ञानकी पराकाष्ठा * ५१
    ‘हे सोम्य ! वह जो निश्चयपूर्वक उस तमोविहीन, शरीर- ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि
    रहित, लोहितादि गुणोंसे शून्य, शुद्ध एव अविनाशी पुरुष श्वेतकेतो। (छान्दोग्य० ६।८।७)
    (आत्मा) को जानता है, वह उस परम अक्षरब्रह्मको ही प्राप्त ‘हे श्वेतकेतु ! एतद्रूप ही यह सब कुछ है, यह सत्य है,
    होता है। वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है।’ यह आत्मा है, वह तुम हो।’
    हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम्। यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः।
    यच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥
    (मुण्डक० २।२।९) (बृहदारण्यक० ४।४।१७)
    ‘वह निर्मल तथा निष्कल (अवयवरहित) ब्रह्म हिरण्मय तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म
    (ज्योतिर्मय) परम कोशमे स्थित है। वह शुद्ध तथा समस्त सर्वानुभूः। (बृहदारण्यक० २।५।१९)
    ज्योतिर्मय पदार्थोंका भी प्रकाशक है और वही परम तत्त्व ‘जिसमें पाँच पञ्चजन (गन्धर्व, पितर, देवता, असुर
    है, जिसे आत्मज्ञानी जानते हैं।’ और राक्षस अथवा ब्राह्मणादि वर्ण और निषाद) तथा
    नान्त प्रज्ञं न वहिष्प्रज्ञ नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघन न अव्याकृत प्रकाश प्रतिष्ठित है, उस आत्माको ही मै अमृत ब्रह्म
    प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यप- मानता हूँ। उस ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ।’ ‘वह
    देश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ यह ब्रह्म पूर्व और अपर—कारण और कार्यसे रहित है, अन्तर-
    मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेय । (माण्डूक्य० ७) विजातीय द्रव्यसे शून्य है और अबाह्य है (बाह्य आदिके
    ‘वह अन्तःप्रज्ञ अर्थात् तैजसरूप नहीं है, बहिःप्रज्ञ भेदसे रहित है), यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला
    अर्थात् विश्वरूप भी नहीं है। अन्तर्बहिःप्रज्ञ अर्थात् जाग्रत् ब्रह्म है।’
    और स्वप्नकी अन्तराल-अवस्थारूप भी नहीं है, प्रज्ञानघन निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् ।
    अर्थात् सुषुप्तावस्थारूप नहीं है। प्रज्ञ अर्थात् एक साथ सब अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥
    विषयोंका प्रज्ञाता, निरा चेतनरूप नहीं है। अप्रज्ञ अर्थात् (श्वेताश्वतर० ६।१९)
    अचेतनरूप नहीं है। वह दृष्टिका विषय नहीं, व्यवहारका तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा-
    विषय नहीं, उसे हाथोंद्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥
    उसकी परिभाषा नहीं हो सकती। वह अचिन्त्य है, अनिर्वचनीय (श्वेताश्वतर० ६।१२)
    है, जाग्रदादि सभी अवस्थाओंमे एकात्म-प्रत्ययरूप है, प्रपञ्च- ‘जो कला अर्थात् अवयवरहित है, निष्क्रिय है, शान्त,
    कृत धर्मोंका वहाँ अभाव है, वह शान्त है, शिव है, अद्वैत निर्दोष और निर्लेप है, जो अमृतका सर्वोत्तम सेतु है और
    है—ऐसे उस परम तत्त्वको ज्ञानीजन परमात्माका चतुर्थ पाद जिसका ईंधन जल चुका है, उस धूमादिशून्य अग्निके समान
    मानते हैं। वही आत्मा है, वही जाननेयोग्य है।’ दीप्तिमान् है।’ ‘उसको जो धीर अपने आत्मा (अन्तःकरण)
    स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः। में स्थित देखते हैं उन्हीको शाश्वत सुखकी प्राप्ति होती है,
    (तैत्तिरीय० २।८।५) दूसरोंको नहीं।’
    ‘वह जो यह पुरुषमें (पञ्चकोशात्मक देहमें) है, और यत्पर ब्रह्म सर्वात्मा विश्वस्यायतन महत्।
    वह जो आदित्यमें है—वह एक है।’ सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नित्य स त्वमेव त्वमेव तत् ॥
    यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं (कैवल्य० १।१६)
    तत्प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा ‘जो परब्रह्म सबका आत्मा, विश्वका महान् आयतन,
    प्रज्ञान ब्रह्म। (ऐतरेय० ३।३) सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर और नित्य है, वह तुम्हीं हो, तुम्हीं
    ‘जो कुछ यह जङ्गम जीवसमुदाय है, जो पक्षी है, जो वह हो।’
    यह स्थावर जगत् है, वह प्रज्ञानेत्र है अर्थात् प्रज्ञामे दृष्ट होता यहाँ इन थोडे-से वचनोंद्वारा दिग्दर्शनमात्र कराया गया
    है। प्रज्ञानमे ही प्रतिष्ठित है। लोक प्रज्ञानेत्र है, प्रज्ञा ही है। इन उपनिषदोंमे इस प्रकारके अर्थवाले सैकड़ों वचन हैं,
    उसकी प्रतिष्ठा है। प्रज्ञान ही ब्रह्म है।’ जिनका परम तात्पर्यस्वरूप एक ही अर्थ है—‘एकरस अखण्ड

५२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

आनन्दस्वरूप ब्रह्म और आत्माकी एकताका निरूपण करना।'
उनमें ध्यानयोग उपासनादि तथा सृष्टिमें अनुप्रवेशादि अन्य
विषय भी प्रतिपादित हुए हैं, परंतु उनका मुख्यतः प्रतिपादन
नहीं हुआ है, प्रकृत अर्थको अभिव्यञ्जित करनेके लिये ही
उनका प्रतिपादन हुआ है। इनका मुख्य प्रयोजन है—भेद-
बुद्धिका निवारण करना।

यद्यपि लोकमें एक सौ आठ उपनिषदें प्रचलित हैं और
मुक्तिकोपनिषद्में भी वे नाम ले लेकर गिनी गयी हैं तथापि उनमें
उपर्युक्त बारह उपनिषदोंकी ही प्रधानता तथा सर्वापादेयता है।
इनमें बतलाये हुए अर्थका ही बहुतेरी उपनिषदें अनुवाद
करती हैं। दूसरी कुछ उपनिषदें ऐसी भी हैं जो देवता-
विशेषका नाम लेकर उसके स्वरूप-माहात्म्यादिका निरूपण
करती हैं, परंतु वे समयाचारके प्रतिपादक (साम्प्रदायिक)
ग्रन्थोंकी कोटिमें आकर सर्वत्र तथा सर्वजनोंमें आदर नहीं
प्राप्त करतीं, परंतु ये द्वादश उपनिषदें साम्प्रदायिक विषयोंमें
तनिक भी न पड़कर सबके लिये उपादेय बनती हैं। केवल
अखण्डैकरस, निर्गुण, क्रियाकारकसे शून्य, पर, एक, सर्वात्मा,
सच्चिदानन्दघनमें परम तात्पर्य रखना ही इनकी सर्वोच्चमता
और सर्वादरणीयताका मुख्य कारण है। वस्तुतः अखण्ड-
आनन्दैकरसस्वरूप ब्रह्म ही उपनिषद्-प्रतिपादित तत्त्व है,
ऐसा श्रुतिने ही कहा है। बृहदारण्यक-उपनिषद्में कथा है कि
महाराज जनकने 'कौन सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता है' यह जाननेके लिये
एक सहस्र गोदानकी शर्त की। उस समय भगवान् याज्ञवल्क्यने
उन सहस्रों गौओंको अपने अधिकारमें कर लिया, इसपर
राजसभामें बैठे हुए विद्वान् कुपित होकर उनसे अनेक प्रकारके
प्रश्न करने लगे। उनमें एक शाकल्य भी था। उसके अनेक
प्रश्नोंका उत्तर देनेके पश्चात् अन्तमें महर्षि याज्ञवल्क्यने भी
उससे पूछा—

'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि, तं चेन्मे न विवक्ष्यसि
मूर्धा ते विपतिष्यतीति।' (बृहदारण्यक० ३।९।२६)

'शाकल्य ! मैं तुमसे उस उपनिषद् प्रतिपादित पुरुषको
पूछता हूँ, यदि मुझसे उसको नहीं बतलाओगे तो तुम्हारा
सिर गिर जायगा।'

शाकल्य इसका उत्तर नहीं जानता था, अतः उससे उत्तर
न बन पड़ा, इस कारण उसका सिर गिर गया। इस आख्यायिका-
को कहकर अन्तमें औपनिषद पदके अर्थको श्रुतिने स्वय ही
खोला है।

'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम्।'
(बृहदारण्यक० ३।९।२८)

'ब्रह्म विज्ञानानन्दस्वरूप है, वह धन देनेवाले यजमानकी
परम गति है।' यहाँ भगवान् शङ्कराचार्यजी अपने भाष्यमें
कहते हैं—

"अतिक्रान्तवानुपाधिधर्म हृदयाद्यात्मस्थ स्वेनैवात्मना
व्यवस्थितो य औपनिषद पुरुष. अशनायादिवर्जित.
उपनिषत्स्वेव विज्ञेयो नान्यप्रमाणगम्य तं त्वां विद्याभिमानिनं
पुरुषं पृच्छामि इति ।"

"विज्ञानं विज्ञप्तिः विज्ञानं तच्चानन्द न विषयविज्ञानवद्
दुःखानुविद्धम् । किं तर्हि प्रसन्नं शिवमतुममनायासं
नित्यतृप्तमेकरसमित्यर्थ ।"

'हृदयादिको ही आत्मा माननेरूप जो उपाधि-धर्म
है, उसको अतिक्रान्त करनेवाला अपने आत्मरूपमे ही व्यवस्थित,
क्षुधा-पिपासा आदि धर्म.से वर्जित, उपनिषदोंमे ही जाननेयोग्य
तथा दूसरे प्रमाणोंके द्वारा जाननेमें नहीं आ सकनेवाला जो
औपनिषद पुरुष है, उस पुरुषके विषयमें मे विद्याका अभिमान
रखनेवाले तुमसे पूछता हूँ।'

'विज्ञप्ति (बोध) का ही नाम विज्ञान हे, वही आनन्द
भी है। ब्रह्म विज्ञान विषय विज्ञानकी भाँति दुःखमे व्याप्त नहीं
है। तो फिर कैसा है? प्रसन्न, कल्याणमय, अनुपम, आयास
रहित, नित्यतृप्त और एकरस हे। ऐसा इसका तात्पर्य है।'

इस सन्दर्भके द्वारा यह स्पष्टरूपसे ज्ञात होता है कि
पूर्वनिर्दिष्ट आत्मस्वरूप एकमात्र उपनिषदोंके द्वारा ही प्राप्त
होने योग्य है। अतएव उसको औपनिषद पुरुष कहते हैं।

यहाँ 'शिव' शब्द सगुणब्रह्मका वाचक नहीं है, बल्कि
माण्डूक्योपनिषद्में उल्लिखित 'शान्त शिवमद्वैत चतुर्थं
मन्यन्ते' इस वाक्यगत शिवका ही पुनः निर्देश यहाँ भाष्य
कारने किया है। वहाँ माण्डूक्योपनिषद्में 'शिवम्' पदके
द्वारा सगुणब्रह्मके उपादानकी लेशमात्र भी गन्ध नहीं है।
क्योंकि 'वह अद्वैत है' यह बात आगे स्पष्टरूपसे कही गयी
है। इसका विवरणभाष्य करते हुए कहा गया है—'शिवं
परिशुद्धं परमानन्दबोधम्' अर्थात् 'शिव'का अभिप्राय
'परिशुद्ध परम आनन्दमय बोध।'

इस प्रकार इन मुख्य मुख्य उपनिषदोंका स्वतः प्रतीत
होनेवाला अभिप्राय नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, निर्गुण, एकरस,
निरतिशय अखण्ड-आनन्दस्वरूप, अद्वैत आत्माका बोध
कराना ही है। कहीं कहीं द्वैत-सगुण आदि तथा अन्यत्र भी
जो इनकी प्रवृत्ति दीख पड़ती है, वह भी अद्वैततत्त्वके साधन
रूपमें ही ह, न कि परम तात्पर्यरूपमें । अतएव किसी
अग्रगण्य विद्वान्ने कहा है—

ॐ उपनिषद्में ज्ञानकी पराकाष्ठा ॐ ५३
'तस्माद् बहून् पश्यन्त्या बहुभिर्भाष्यमाणाया अपि पति-
व्रताया हृदयं स्वपताविव बहुभिर्वचनैरितस्ततो नीयमाना-
नामपि भगवतीनामुपनिषदां नित्यनिरतिशयाखण्डानन्द-
चिद्धनरूपामैक्य एव हृदयमवतिष्ठते' इति।
'जिस प्रकार बहुतसे पुरुषोंकी ओर देखती और बहुतोंसे
बातें करती रहनेपर भी पतिव्रता स्त्रीका हृदय अपने पतिमें ही
लीन रहता है; उसी प्रकार अनेकों वाक्योंद्वारा इधर-उधर
लगायी जानेपर भी भगवती उपनिषद्-विद्याका हृदय नित्य,
निरतिशय अखण्ड-आनन्द-चिद्धनरूप आत्मैकत्वमें ही स्थित
रहता है।' उस प्रकारकी एकात्मरूपमें जो अवस्थिति है, वही
मोक्ष है । उसीको ब्रह्मसाक्षात्कार कहते हैं । और वही
अपुनरावृत्तिरूप परम पुरुषार्थ है। उसी स्थितिको लक्ष्य करके
भगवान् वासुदेवने भी कहा है—
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन ॥
(गीता ६।२९)
'सर्वत्र समदृष्टि रखनेवाला योगयुक्त पुरुष सब भूतोंमें
आत्माको और आत्मामें सब भूतोंको देखता है।' और उसी
सर्वात्मभावमें स्थित होकर महर्षि वामदेव अपनेको सर्वरूप
देखते हैं—'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' मैं मनु हो गया और सूर्य हो
गया। न केवल एक महर्षि वामदेवको ही ऐसा ज्ञान हुआ,
बल्कि अन्य महर्षियों तथा साधारण मनुष्योंमें भी जिसको
ऐसा ज्ञान हुआ है, उसने भी अपनी सर्वात्मताका ही दर्शन
किया है। आज भी वैसा ज्ञानी पुरुष वैसी ही स्थितिमें आ
सकता है। यह बात भगवती श्रुति ही आग्रहपूर्वक कह रही है—
तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं
ब्रह्मास्मीति स इद सर्वं भवति।
(बृहदारण्यक० १।४।१०)
"इस समय भी जो इसको इस प्रकार जानता है अर्थात्
'मैं ही ब्रह्म हूँ' ऐसा जो अनुभव करता है वह यह सर्वरूप
हो जाता है।' गीताके आचार्य भगवान् श्रीकृष्ण भी कहते हैं—
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता ॥
(गीता ४।१०)
'ज्ञान और तपस्यासे पवित्र हुए बहुतेरे महात्माजन मेरे
स्वरूपको प्राप्त हो चुके हैं।' इस प्रकारके आत्मसाक्षात्कारकी
प्राप्तिसे ही पूर्वकालमें महर्षिलोग सब प्रकारकी आसक्तियोंका
त्याग करके सन्यास ग्रहण करते थे। यह श्रुति ही कहती है—
एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणा पुत्रैषणायाश्च वित्तै-
षणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति ।
(बृहदारण्यक० ३।५।१)
तमेतं वै आत्मानं स्वं तत्त्वं विदित्वा ज्ञात्वा अयमहमास्मि
परं ब्रह्म सदा सर्वसंसारविनिर्मुक्तं नित्यतृप्तम्' इति।
(शाङ्करभाष्य)
"शोक-मोह-जरा-मृत्यु-भूख-प्यास आदिसे रहित उस इस
आत्माको ही जानकर ब्राह्मणलोग पुत्रैषणा, वित्तैषणा तथा
लोकैषणासे ऊपर उठकर भिक्षाचर्यासे विचरते हैं—भिक्षाजीवी
संन्यासी हो जाते हैं उस इस आत्माको—अपने तात्त्विक
स्वरूपको सदा संपूर्ण संसार-धर्मोंसे रहित नित्यतृप्त परब्रह्मके
रूपमें जानकर 'यह मैं हूँ'—ऐसा समझकर—ऐसा 'तमात्मानं
विदित्वा' पर श्रीशङ्कर भगवत्पादका भाष्य है। भगवान्
याज्ञवल्क्यने इसी आत्मतत्त्वका उपदेश अपनी पत्नी मैत्रेयीके
किया था—
स एष नेति नेत्यात्मा, अगृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न
हि शीर्यते। असङ्गो न हि सज्यते।
तथा—
यत्र सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत्-इत्यादि।
(बृहदारण्यक० ४।७।१५)
'वह यह 'नेति-नेति' इस प्रकार निर्देश किया जानेवाला
आत्मा अगृह्य है—ग्रहण नहीं किया जा सकता। अविनाशी
है—विनष्ट नहीं हो सकता। असङ्ग है—आसक्तिमे नहीं पड़
सकता।' तथा 'जहाँ सब कुछ आत्मा ही हो गया, वहाँ
किससे किसको देखे।'
इसी आत्मतत्त्वका उपदेश भगवान् वैवस्वत धर्मराजने
अपने प्रिय शिष्य नचिकेताको साग्रह आत्मतत्त्वकी जिज्ञासाके
उत्तरमें दिया है—
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपासि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पद सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्॥
(कठ० १।२।१५)
'सम्पूर्ण वेद जिस पदका प्रतिपादन करते हैं, सारी
तपस्याओंको जिसकी प्राप्तिका साधन बताया जाता है, जिसकी
इच्छा करते हुए मुमुक्षुजन ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं, उस
पदको मैं तुमसे सङ्क्षेपमें कहता हूँ, 'ओम्' यही वह पद है।'
अत्यन्त गहन, अत्यन्त दुर्लभ, अतिनिगूढ आत्मतत्त्वका
प्रतिपादन करनेसे ही इन उपनिषदोंको रहस्यात्मक माना गया
है तथा उन-उन ग्रन्थोंमें वैसा कहा भी गया है। तात्पर्य
यह है कि रहस्यके अर्थमें 'उपनिषद्' शब्दका प्रयोग प्राय.
भिन्न-भिन्न उपनिषद्-ग्रन्थोंमें देखा गया है। उपनिषदोंमें
नाना प्रकारकी जो अनेकों आख्यायिकाएँ गुरु-शिष्य-संवादरूप-

५४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
में, विद्वानोंके पारस्परिक प्रश्नोत्तरके रूपमे तथा उपदेशरूपमे
प्राप्त होती हैं, उन सबका उद्देश्य है ब्रह्मविद्याकी सर्व-
श्रेष्ठता तथा सर्वापेक्षा अधिक उपादेयताका प्रतिपादन करना ।
अनित्य वस्तुओंकी ओरसे पुरुषोंमें वैराग्य उत्पादन कर
ब्रह्मविद्याकी ओर स्वतः उन्हें उन्मुख करना उनका लक्ष्य है।
अतएव वे आख्यायिकाएँ सत्य हैं या असत्य—इस बातका
अधिक आग्रह नहीं करना चाहिये । इसीलिये भिन्न भिन्न
स्थलोंपर कहते हैं—
आख्यायिका तु विद्याग्रहणविधिप्रदर्शनाय विधिसुत्यर्था
च राजसेवितं पानीयमितिवत् ।
तथा—
विद्याप्राप्त्युपायप्रदर्शनार्थैवाख्यायिका ।
आख्यायिका तो विद्याग्रहणकी विधि प्रदर्शित करनेके
लिये तथा विधिकी प्रशंसा करनेके लिये है। जैसे किसी जलको
श्रेष्ठ बतानेके लिये यह कह दिया जाय कि यहाँका पानी तो
राजा भी ग्रहण कर चुके हैं। इसके सिवा, विद्याकी प्राप्तिका
उपाय क्या है यह दिखलानेके लिये भी आख्यायिका दी जाती
है। इसी प्रकार उन उपनिषदोंमें पञ्चाग्नि-विद्या, दहर-विद्या,
संवर्ग विद्या, प्राणाग्निहोत्र विद्या आदि विद्याओंमें तथा मनुष्य-
से लेकर ब्रह्मतक आनन्दके तारतम्यका निर्देश, प्राण आदिकी
श्रेष्ठता और कनिष्ठताका कथन, जीवकी विश्व तैजस प्राज्ञ
इन तीन अवस्थाओंका निरूपण करना और गुरु-शिष्योके
वंश-वर्णन आदि विषयोंमे भी वही दृष्टि रखनी चाहिये ।
सर्वदा अनादि अविद्याके विलासमे विकसित तथा क्रिया,
कारक और फलादिरूपसे भासित होनेवाले इस मिथ्या
प्रपञ्चको विद्याके द्वारा तिरोहित करके नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त,
सच्चिदानन्दैकरस अद्वैत ब्रह्मके रूपमे अवस्थित होना ही परम
पुरुषार्थ है, उसकी प्राप्तिमे ही पुरुषकी कृतकृत्यता है—इसके
प्रतिपादनके लिये ही उपनिषदें प्रवृत्त होती हैं, यही निगूढ
रहस्य-तत्त्व उपनिषदोंमे वर्णित है। इस प्रकार उनमे सब
कुछ उत्तम ही-उत्तम है।
ब्रह्मविद्या
( ले०— श्रीमज्जगद्गुरु श्रीरामानुजसम्प्रदायाचार्य आचार्यपीठाधिपति श्रीराघवाचार्यजी स्वामी महाराज )
अनन्त अपौरुषेय वेदवाङ्मयका ज्ञानकाण्ड है वह
उपनिषत्साहित्य, जिसके बलपर अध्यात्मवादियोंने घोषणा
की थी—
तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये ।
कर्म वह है जो बन्धनके लिये न हो और विद्या
वह है जो बन्धनसे मुक्त कर दे। ऋषियोंने इसी विद्याके
प्रकाशमें अनन्त सच्चिदानन्द परब्रह्मका साक्षात्कार किया,
कराया और इस विद्याको ब्रह्मविद्या कहकर परमतत्त्व ( ब्रह्म )
के साथ रहनेवाले उसके सम्बन्धको भी स्पष्ट कर दिया ।
प्रतिपादनपद्धति, विशेष ज्ञातव्य, परम्परा, आदिके भेदसे
उसके अनेक रूप स्वाभाविक थे, जो विविध उपनिषदोंमें
तथा एक ही उपनिषद्के विविध भागोंमे परिगृहीत होकर
साधुकोंके लिये प्रत्यक्ष भी हुए, तथापि ब्रह्मविद्याके इन विविध
रूपोंके अन्तस्तलमें रहनेवाली स्वरूपगत एकता मिट न सकी,
प्रत्युत सुस्थिर बनी रही। इसका श्रेय था मीमांसाकी उस
पद्धतिके लिये, जिसने इन सभी ब्रह्मविद्याओंका—ब्रह्मविद्याके
विविध रूपोंका समन्वय किया था। इसी पद्धतिका आश्रय
लेकर ब्रह्मसूत्रकारने प्रमुख मानी जानेवाली बत्तीस ब्रह्मविद्याओं-
की चर्चा की और उनके सामरस्यका विवेचन किया ।
विहङ्गम दृष्टिसे अवलोकन करनेपर १—सद्विद्या
(छा०), २—आनन्दविद्या (तै०), ३-अन्तरादित्यविद्या
(छा०), ४-आकाशविद्या (छा०), ५-प्राणविद्या
(छा०), ६-गायत्री-ज्योतिर्विद्या (छा०), ७-इन्द्रप्राण-
विद्या (छा० कौ०), ८-शाण्डिल्यविद्या (छा०, बृ० अग्नि-
रहस्य), ९-नाचिकेतसविद्या (कठ०), १०-उपकोसल-
विद्या (छा०), ११-अन्तर्यामिविद्या (बृ०), १२-
अक्षरविद्या (मु०), १३—वैश्वानरविद्या (छा०),
१४-भूमविद्या (छा०), १५-गार्ग्यक्षरविद्या (बृ०),
१६-प्रणवोपास्य परमपुरुषविद्या (प्र०), १७-दहरविद्या
(छा०, बृ०, तै०), १८-अङ्गुष्ठप्रमित विद्या (क०, श्वे०),
१९-देवोपास्यज्योतिर्विद्या (बृ०), २०-मधुविद्या (छा०),
२१-संवर्गविद्या (छा०), २२-अजाशरीरकविद्या (श्वे०,
तै०), २३-बालाकिविद्या (कौ०, बृ०), २४-मैत्रेयीविद्या
(बृ०), २५-दृहिंगणब्रह्मादिशरीरकविद्या, २६-पञ्चाग्निविद्या
(छा०, बृ०), २७-आदित्यस्याह्नर्नामक विद्या (बृ०),
२८-अक्षिस्याहन्नामक विद्या (बृ०), २९-पुरुषविद्या
(छा०, तै०), ३०-ईशावास्यविद्या (ई०), ३१-उषस्ति
कहोलविद्या (बृ०) और ३२-व्याहृतिशरीरकविद्या—ये
बत्तीस विद्याएँ हैं ।
ये विद्याएँ क्रमशः बताती है कि (१) परब्रह्म अपने

  • ब्रह्मविद्या * ५५
    सङ्कल्पानुसार सबके कारण हैं, (२) वे कल्याणगुणाकर,
    वैभवसम्पन्न आनन्दमय हैं, (३) उनका रूप दिव्य है,
    (४) उपाधिरहित होकर वे सबके प्रकाशक हैं, (५) वे
    चराचरके प्राण हैं, (६) वे प्रकाशमान हैं, (७) वे इन्द्र, प्राण
    आदि चेतनाचेतनोंके आत्मा हैं, (८) प्रत्येक पदार्थकी सत्ता,
    स्थिति एवं यत्न उनके ही अधीन हैं, (९) समस्त संसारको
    लीन कर लेनेकी सामर्थ्य उनमें है, (१०) उनकी नित्य
    स्थिति नेत्रमें है, (११) जगत् उनका शरीर है, (१२)
    उनके विराट् रूपकी कल्पनामें अग्नि आदि अङ्ग बनकर रहते
    हैं, (१३) स्वर्लोक, आदित्य आदिके अङ्गी बने हुए वे
    वैश्वानर हैं, (१४) वे अनन्त ऐश्वर्यसम्पन्न हैं, (१५)
    वे नियन्ता हैं, (१६) वे मुक्त पुरुषोंके भोग्य हैं, (१७)
    वे सबके आधार हैं, (१८) वे अन्तर्यामीरूपसे सबके हृदय-
    में विराजमान हैं, (१९) वे सभी देवताओंके उपास्य हैं,
    (२०) वे वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत् और साध्योंके आत्माके
    रूपमें उपास्य हैं, (२१) अधिकारानुसार वे सभीके
    उपासनीय हैं, (२२) वे प्रकृतितत्त्वके नियन्ता हैं, (२३)
    समस्त जगत् उनका कार्य है, (२४) उनका साक्षात्कार
    कर लेना मोक्षका साधन है, (२५) ब्रह्मा, रुद्र आदि-आदि
    देवताओंके अन्तर्यामी होनेके कारण उन-उन देवताओंकी
    उपासनाके द्वारा वे प्राप्त होते हैं, (२६) संसारके बन्धन-
    से मुक्ति उनके अधीन है, (२७) वे आदित्यमण्डलस्थ हैं,
    (२८) वे पुण्डरीकाक्ष हैं, (२९) वे परम पुरुष (पुरुषोत्तम)
    हैं, (३०) वे कर्मसहित उपासनात्मक ज्ञानके द्वारा प्राप्त
    होनेवाले हैं, (३१) उनके प्राप्त करनेमें अनिवार्य होते
    हैं अन्य भोजनादिविषयक नियम भी और (३२)
    व्यावृत्तियोंकी आत्मा बनकर वे मन्त्रमय हैं।
    यह हृदयङ्गम कर लेनेपर परब्रह्मके स्वरूप, रूप, गुण,
    विभव आदिके सम्बन्धमें उठ सकनेवाली सभी शङ्काओंका
    समाधान हो जाता है। सगुण-निर्गुण, भेद-अभेद, द्वैत-अद्वैत,
    नित्यविभूति-लीलाविभूतिकी उलझनें भी सुलझ जाती हैं,
    किंतु पृथक्-पृथक् ब्रह्मविद्याओंमें परब्रह्मके पृथक् पृथक् नाम-
    करण तथा ब्रह्मविद्याओंके मौलिक स्वरूप सन्देहके कारण बन
    सकते थे, इसके लिये शेषावतार श्रीरामानुजमुनीन्द्रने ब्रह्मसूत्रके
    लिङ्गभूयस्त्वाधिकरणमें तैत्तिरीयोपनिषद्‌के नारायणानुवाकको
    उपस्थित करते हुए लिखा है—
    परविद्यासु अक्षरशिवशम्भुपरब्रह्मपरज्योतिपरतत्त्व-
    परमात्मादिशब्दनिर्दिष्टम् उपास्यं वस्तु तत्त एव शब्दै. अनुद्य
    तस्य नारायणत्वं विधीयते । (श्रीभाष्य)
    ब्रह्मविद्याओंमें जो अक्षर, शिव, शम्भु, परब्रह्म,
    परज्योति, परतत्त्व, परमात्मा आदि शब्द आये हैं, उन्हीं शब्दोंमें
    यहाँ (नारायणानुवाकमें) उपास्य परमतत्त्वका निर्देश करते
    हुए उनके नारायण होनेका विधान किया गया है। साथ
    ही—
    अतो वाक्यार्थज्ञानादन्यदेव ध्यानोपासनादिशब्द-
    वाच्यं ज्ञानं वेदान्तवाक्यैर्विधित्सितम् ।
    —लिखकर ब्रह्मविद्यासे होनेवाले ज्ञानको वाक्यार्थज्ञान-
    तक सीमित न कर उसे ध्यान, उपासना आदि शब्दोंका वाच्य
    ठहराया है। इस प्रकार निर्णय करनेमें श्रीभाष्यकारको पाञ्च-
    रात्र आगम और भगवद्गीताका समर्थन तथा सर्वश्रीबोधायन,
    टङ्क, द्रमिडाचार्यकी परम्पराका बल भी प्राप्त हुआ था।
    कहना न होगा कि जहाँ पाञ्चरात्र आगमने ज्ञानकाण्डको
    आराध्यपरक और कर्मकाण्डको आराधनपरक बताकर
    भगवदाराधनमें सम्पूर्ण वेदवाङ्मयका विनियोग किया तथा गीता-
    चार्यने ज्ञान-कर्मानुगृहीत भक्तियोगका उपदेश देकर ज्ञानकाण्डके
    उपासनात्मक स्वरूपको जाग्रत् किया, वहाँ महर्षि बोधायनकी
    परम्पराने कर्ममीमांसा, दैवतमीमांसा और ब्रह्ममीमांसाका
    सम्मेलन कर सर्वकर्मसमाराध्य सर्वदेवान्तर्यामी परब्रह्मकी
    उपासनाको परमपुरुषार्थका साधन स्थिर करके ब्रह्ममीमांसाकी
    प्रधानता स्थापित की। इस प्रकार ब्रह्मविद्याओंका जो मौलिक
    उपासनात्मक स्वरूप सामने आता है, उसको साध्यभक्ति समझ
    लेनेपर यह भी कह देना आवश्यक हो जाता है कि ब्रह्मविद्याओंके
    मौलिक स्वरूपके अन्तर्भूत सिद्धभक्तिका सन्देश भी श्रीरामानुज-
    मुनीन्द्रने दिया है। शरण्य-परमतत्त्वके माहात्म्यके रूपमें
    यद्यपि प्रत्येक ब्रह्मविद्यामें इस सिद्ध-भक्तिकी झाँकी दिखायी
    देती है, तथापि पृथक् न्यासविद्या (तै० श्वे०) के रूपमें उसे वह
    स्वतन्त्र स्थान भी मिला है, जो बत्तीसौं ब्रह्मविद्याओंसे समानता ही
    नहीं करता, अपितु विशेषता भी ग्रहण करता है। यही ‘न्यास-
    विद्या’ है। परमगुह्यतम वह शरणागति-मार्ग, जिसमें परमपुरुष-
    की कृपाके सहारे साधक कृतार्थ और कृतकृत्य हो जाता है।
    अन्य विद्याओंके रूपमें ब्रह्मविद्या ब्रह्मको प्राप्त करानेवाली
    विद्या है, परन्तु न्यासविद्याके रूपमें वह परब्रह्मकी अपनी
    दयामयी विद्या है, जो साधनकी सारी कठिनाइयोंको दूरकर
    और सारी बाधाओंको मिटाकर अकिञ्चन अनन्यगति साधक-
    को स्वय परब्रह्मतक पहुँचा देती है। उपनिषद्-अङ्कके लिये
    मङ्गलाशासन करते हुए हम शरण्य परमपुरुषसे प्रार्थना करते
    हैं कि वे अपनी करुणा-दृष्टिसे शरण देकर समस्त प्राणियोंका
    परम कल्याण करें।