कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५५८ - छान्दोग्योपनिषद् - [ अध्याय ८
५५८ - छान्दोग्योपनिषद् - [ अध्याय ८
वह भी आत्मा है, उसके श्रवण करनेके लिये श्रोत्रेन्द्रिय है । और करता है । इस आत्माकी देवगण उपासना करते हैं । इसीसे
जो यह जानता है कि मैं मनन करूँ, वह आत्मा है। मन उसका उन्हें सम्पूर्ण लोक और समस्त भोग प्राप्त हैं। जो उस आत्मा-
दिव्य नेत्र है, वह यह आत्मा इस दिव्य चक्षुके द्वारा भोगोंको को जान और आचार्यके उपदेशानुसार जानकर साक्षात्
देखता हुआ रमण करता है ॥ ४-५ ॥ रूपसे अनुभव करता है, वह सम्पूर्ण लोक और समस्त भोगोंको
जो ये भोग इस ब्रह्मलोकमें हैं उन्हें यह देखता हुआ रमण प्राप्त कर लेता है। ऐसा प्रजापतिने कहा, प्रजापतिने कहा ॥ ६ ॥
त्रयोदश खण्ड
श्याम ब्रह्मसे शबल ब्रह्मकी प्राप्तिका उपदेश
मैं श्याम ( हृदयस्थ ) ब्रह्मसे शबल ब्रह्मको प्राप्त होऊँ तथा राहुके मुखसे निकले हुए चन्द्रमाके समान शरीरको
और शबलसे श्यामको प्राप्त होऊँ । अश्व जिस प्रकार रोएँ त्यागकर कृतकृत्य हो अकृत (नित्य) ब्रह्मलोकको प्राप्त होता
झाड़कर निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार मैं पापोंको झाड़कर हूँ, ब्रह्मलोकको प्राप्त होता हूँ ॥ १ ॥
चतुर्दश खण्ड
आकाश नामक ब्रह्मका उपदेश
आकाश नामसे प्रसिद्ध आत्मा नाम और रूपका निर्वाह के यश, क्षत्रियोंके यश और वैश्योंके यश (यश स्वरूप आत्मा)
करनेवाला है । वे (नाम और रूप) जिसके अन्तर्गत हैं, को प्राप्त होना चाहता हूँ । वह मैं यशोंका यश हूँ, मैं बिना
वह ब्रह्म है, वह अमृत है, वही आत्मा है । मैं प्रजापतिके दाँतोंके भक्षण करनेवाले लोहितवर्ण पिच्छिल स्त्री-चिह्नको प्राप्त
सभागृहको प्राप्त होता हूँ, मैं यश संज्ञक आत्मा हूँ, मैं ब्राह्मणों- न होऊँ, प्राप्त न होऊँ ॥ १ ॥
पञ्चदश खण्ड
आत्मज्ञानकी परम्परा, नियम और उसका फल
इस पूर्वोक्त आत्मज्ञानका ब्रह्माने प्रजापतिके प्रति वर्णन किया, धार्मिक बनाकर, सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अन्तःकरणमें स्थापित
प्रजापतिने मनुसे कहा, मनुने प्रजावर्गको सुनाया । नियमानुसार कर शास्त्रकी आज्ञासे अन्यत्र प्राणियोंकी हिंसा न करता
गुरुके कर्तव्यकर्मोंको समाप्त करता हुआ वेदका अध्ययन करके हुआ और आयुकी समाप्तिपर्यन्त इस प्रकार वर्तता हुआ
आचार्यकुलसे लौटकर गृहस्थाश्रममें स्थित होता है, फिर [ अन्तमें ] वह निश्चय ही ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है, और
पवित्र स्थानमें स्वाध्याय करता हुआ [ पुत्र एव शिष्यादिको ] फिर नहीं लौटता, फिर नहीं लौटता ॥ १ ॥
॥ अष्टम अध्याय समाप्त ॥ ८ ॥
॥ सामवेदीय छान्दोग्योपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं
माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोद निराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु
धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ।
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
इसका अर्थ केनोपनिषद्के आरम्भमें दिया जा चुका है ।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
बृहदारण्यकोपनिषद्
बृहदारण्यक उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेदकी काण्वी शाखाके वाजसनेयि ब्राह्मणके अन्तर्गत है। आकारमें यह सबसे
बृहत् (बड़ी) है एव अरण्य (वनमे) अध्ययन की जानेसे इसे आरण्यक कहा जाता है। इस प्रकार 'बृहत्' और 'आरण्यक'
होनेके कारण इसका 'बृहदारण्यक' नाम हो गया।
शान्तिपाठ
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
इसका अर्थ ईशावास्योपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है।
प्रथम अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
यज्ञकी अश्वके रूपमें कल्पना
ॐ उषा (ब्राह्ममुहूर्त्त) यज्ञसम्बन्धी अश्वका सिर है, सूर्य कटिसे नीचेका भाग है। उसका जमुहाई लेना बिजलीका
सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, वैश्वानर'अग्नि खुला हुआ मुख है चमकना है और शरीर हिलाना मेघका गर्जन है। वह जो
और संवत्सर यज्ञिय अश्वका आत्मा है। द्युलोक उसका पीठ मूत्र त्याग करता है वही वर्षा है और हिनहिनाना ही उसकी
है, अन्तरिक्ष उदर है, पृथिवी पैर रखनेका स्थान है, दिशाएँ वाणी है ॥ १ ॥
पार्श्वभाग हैं, अवान्तर दिशाएँ पसलियाँ हैं, ऋतुएँ अङ्ग हैं, अश्वके सामने महिमारूपसे दिन प्रकट हुआ, उसकी
मास और अर्द्धमास पर्व (सन्धिस्थान) हैं, दिन और रात्रि पूर्वसमुद्र योनि है। रात्रि इसके पीछे महिमारूपसे प्रकट हुई;
प्रतिष्ठा (पाद) हैं, नक्षत्र अस्थियाँ हैं, आकाश (आकाश- उसकी अपर (पश्चिम—) समुद्र योनि है। ये ही दोनों इस
स्थित मेघ) मांस हैं, वात ऊवध्य (उदरस्थित अर्धजीर्ण अश्वके आगे-पीछेके महिमासंज्ञक ग्रह हुए। इसने हय होकर
अन्न) है, नदियाँ गुदा-नाड़ियाँ हैं, पर्वत यकृत् और देवताओंको, वाजी होकर गन्धर्वोंको, अर्वा होकर असुरोंको
हृद्गत मांसखण्ड हैं, ओषधि और वनस्पतियाँ रोम हैं, उदय और अश्व होकर मनुष्योंको वहन किया है। समुद्र ही इसका
होता हुआ सूर्य नाभिसे ऊपरका भाग और अस्त होता हुआ बन्धु है और समुद्र ही उद्गमस्थान है ॥ २ ॥
द्वितीय ब्राह्मण
प्रलयके अनन्तर सृष्टिकी उत्पत्ति
पहले यहाँ कुछ भी नहीं था। यह सब मृत्युसे-प्रलयसे हुए आचरण किया। उसके अर्चन करनेसे आप (सूक्ष्म जल)
ही आवृत था। यह अशनाया (क्षुधा) से आवृत था। हुआ। अर्चन करते हुए मेरे लिये क (जल) प्राप्त हुआ
अशनाया ही मृत्यु है। उसने 'मैं आत्मा (मन) से युक्त है; अतः यही अर्कको अर्कत्व है। जो इस प्रकार अर्कके इस
होऊँ' ऐसा मन-संकल्प किया। उसने अर्चन (पूजन) करते अर्कत्वको जानता है उसे निश्चय क (सुख) होता है ॥ १ ॥
१ 'अर्चते कम् अर्कम्' अर्थात् जिनके अर्चन करनेवालेको क (जल या सुख) हो उनका नाम अर्क है। इस व्युत्पत्तिसे 'अर्क' अग्निको कहते हैं।
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