कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४२६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३
४२६ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ३
हो गया था, कहा—'उसे अन्तकालमें इन तीन मन्त्रोंका जप पुरातन कारणका प्रकाश देखते हैं; यह सर्वत्र व्याप्त प्रकाश,
करना चाहिये ( १ ) तू अक्षित ( अक्षय ) है, ( २ ) अच्युत जो परब्रह्ममें स्थित परम तेज देदीप्यमान है, उसका है।
( अविनाशी ) है और ( ३ ) अति सूक्ष्म प्राण है।' तथा [ अब 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरे मन्त्रका अर्थ करते
इसके विषयमें ये दो ऋचाएँ हैं। [ 'आदित्यप्रत्नस्य रेतसः' हैं—] अज्ञानरूप अन्धकारसे अतीत उत्कृष्ट ज्योतिको देखते
यह एक मन्त्र है और 'उद्वयं तमसस्परि' इत्यादि दूसरा है। हुए तथा आत्मीय उत्कृष्ट तेजको देखते हुए हम सम्पूर्ण देवोंमें
इनमें पहला मन्त्र इस प्रकार है—'आदित्यप्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः प्रकाशवान् सर्वोत्तम ज्योतिःस्वरूप सूर्यको प्राप्त हुए ॥१-७॥
पश्यन्ति वासरम् । परो यदिध्यते दिवि' इसका अर्थ यह है—]
अष्टादश खण्ड
मन और आकाशकी ब्रह्मरूपमें उपासना
'मन ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करे । यह अध्यात्मदृष्टि ही मनोमय ब्रह्मका चौथा पाद है । वह वायुरूप ज्योतिसे
है । तथा 'आकाश ब्रह्म है' यह अधिदैवत दृष्टि है। इस प्रकाशित होता और तपता है। जो इस प्रकार जानता है वह
प्रकार अध्यात्म और अधिदैवत दोनोंका उपदेश किया गया। कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता है ।
वह यह ( मनःसञ्ज्ञक ) ब्रह्म चार पादोंवाला है। वाक् पाद चक्षु ही मनःसञ्ज्ञक ब्रह्मका चौथा पाद है। वह आदित्यरूप
है, प्राण पाद है, चक्षु पाद है और श्रोत्र पाद है। यह ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है। जो इस प्रकार जानता
अध्यात्म है। अब अधिदैवत कहते है—अग्नि पाद है, वायु है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और तपता
पाद है, आदित्य पाद है और दिशाएँ पाद हैं। इस प्रकार है। श्रोत्र ही मनोरूप ब्रह्मका चौथा पाद है। वह दिशारूप
अध्यात्म और अधिदैवत दोनोंका उपदेश किया जाता है। ज्योतिसे प्रकाशित होता और तपता है। जो इस प्रकार जानता
वाक् ही ब्रह्मका चौथा पाद है; वह अग्निरूप ज्योतिसे दीप्त है वह कीर्ति, यश और ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होता और
होता है और तपता है। जो ऐसा जानता है वह कीर्ति, यश तपता है ॥ १-६ ॥
और ब्रह्मतेजके कारण देदीप्यमान होता और तपता है। प्राण
एकोनविंश खण्ड
आदित्यकी ब्रह्मरूपमें उपासना
आदित्य ब्रह्म है—ऐसा उपदेश है, उसीकी व्याख्या की थीं, वे नदियाँ हैं तथा जो वस्तिगत जल था, वह समुद्र है।
जाती है। पहले यह असत् ही था । वह सत् ( कार्याभिमुख ) फिर उससे जो उत्पन्न हुआ, वह यह आदित्य है। उसके
हुआ। वह अङ्कुरित हुआ । वह एक अण्डेमें परिणत हो उत्पन्न होते ही बड़े जोरोंका शब्द हुआ तथा उसीसे सम्पूर्ण
गया। वह एक वर्षपर्यन्त उसी प्रकार पड़ा रहा । फिर वह प्राणी और सारे भोग हुए हैं। इसीसे उसका उदय और
फूटा; वे दोनों अण्डेके खण्ड रजत और सुवर्णरूप हो गये । अस्त होनेपर दीर्घ-शब्दयुक्त घोष उत्पन्न होते हैं तथा सम्पूर्ण
उनमे जो खण्ड रजत हुआ, वह यह पृथिवी है और जो सुवर्ण प्राणी और सारे भोग भी उत्पन्न होते हैं। वह जो इस प्रकार
हुआ, वह द्युलोक है। उस अण्डेका जो जरायु ( स्थूल जाननेवाला होकर आदित्यकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार
गर्भवेष्टन ) था [ वही ] वे पर्वत हैं, जो उल्ब ( सूक्ष्म उपासना करता है [ वह आदित्यरूप हो जाता है, तथा ]
गर्भवेष्टन ) था, वह मेघोंके सहित कुहरा है, जो धमनियां उसके समीप शीघ्र ही सुन्दर घोष आते हैं और उसे सुख देते
हैं, सुख देते हैं ॥ १-४॥
॥ तृतीय अध्याय ॥ ३ ॥
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कल्याण
यज्ञशालामें उपस्ति
रैक्व और जानश्रुति