कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
ब्राह्मण ७ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४७९
ब्राह्मण ७ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४७९
फिर बाल्य और पाण्डित्यको पूर्णतया प्राप्तकर वह मुनि होता | जिस प्रकार भी हो, ऐसा ही ब्राह्मण होता है, इससे भिन्न और
है तथा अमौन और मौनका पूर्णतया सम्पादन करके ब्राह्मण | सब आर्त ( नाशवान् ) है ।' तब कौषीतकेय कहोल चुप
( कृतकृत्य ) होता है। वह किस प्रकार ब्राह्मण होता है ? | हो गया ॥ १ ॥
षष्ठ ब्राह्मण
याज्ञवल्क्य और गार्गीका संवाद
फिर इस याज्ञवल्क्यसे वचक्नुकी पुत्री गार्गीने पूछा, | 'हे गार्गि ! नक्षत्रलोकोंमें ।' [गार्गी—] 'नक्षत्रलोक किसमें
वह बोली, 'याज्ञवल्क्य ! यह जो कुछ है, सब जलमे ओतप्रोत | ओतप्रोत हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! देवलोकोंमे ।'
है, किंतु वह जल किसमे ओतप्रोत है ?' [ याज्ञवल्क्य—] | [गार्गी—] 'देवलोक किसमें ओतप्रोत है ?' [याज्ञवल्क्य—]
'हे गार्गि ! वायुमे ।' [ गार्गी—] 'वायु किसमें ओतप्रोत | 'हे गार्गि ! इन्द्रलोकोंमें ।' [ गार्गी—] 'इन्द्रलोक किसमें
है ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! अन्तरिक्षलोकोंमे ।' | ओतप्रोत है ?' [याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! प्रजापतिलोकोंमे ।'
[ गार्गी— ] 'अन्तरिक्षलोक किसमें ओतप्रोत है ?' | [गार्गी—] 'प्रजापतिलोक किसमे ओतप्रोत हैं ?' [याज्ञवल्क्य—]
[ याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! गन्धर्वलोकोंमें ।' [ गार्गी—] | 'हे गार्गि ! ब्रह्मलोकोंमें ।' [गार्गी—] 'ब्रह्मलोक किसमें
'गन्धर्वलोक किसमें ओतप्रोत है ?' [याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! | ओतप्रोत है ?' इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—'हे गार्गि ! अतिप्रश्न
आदित्यलोकोंमें ।' [ गार्गी—] 'आदित्यलोक किसमे ओत- | मत कर । तेरा मस्तक न गिर जाय ! तू, जिसके विषयमे
प्रोत ह ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'हे गार्गि ! चन्द्रलोकोंमें ।' | अतिप्रश्न नहीं करना चाहिये, उस देवताके विषयमें अतिप्रश्न
[गार्गी—] 'चन्द्रलोक किसमे ओतप्रोत हैं ?' [याज्ञवल्क्य—] | कर रही है। हे गार्गि ! तू अतिप्रश्न न कर ।' तब वचक्नुकी
पुत्री गार्गी उपरत हो गयी ॥ १ ॥
सप्तम ब्राह्मण
याज्ञवल्क्य तथा आरुणि उद्दालकका संवाद, आत्माके स्वरूपका वर्णन
फिर इस याज्ञवल्क्यसे आरुणि उद्दालकने पूछा, वह | उन (काप्य आदि) से सूत्र और अन्तर्यामीको बताया ।
बोला, 'याज्ञवल्क्य ! हम मद्रदेशमें यज्ञशास्त्रका अध्ययन करते | उसे मैं जानता हूँ । हे याज्ञवल्क्य ! यदि उस सूत्र और
हुए कपिगोत्रोत्पन्न पतञ्चलके घर रहते थे । उसकी भार्या | अन्तर्यामीको न जाननेवाले होकर ब्रह्मवेत्ताकी स्वभूत गौओंको
गन्धर्वद्वारा गृहीत थी । हमने उस (गन्धर्व) से पूछा, 'तू | ले जाओगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा ।' [याज्ञवल्क्य—]
कौन है ?' उसने कहा, 'मैं आथर्वण कबन्ध हूँ ।' उसने | 'हे गौतम ! मैं उस सूत्र और अन्तर्यामीको जानता हूँ ।'
कपिगोत्रीय पतञ्चल और उसके याज्ञिकोंसे पूछा, 'काप्य ! | [उद्दालक—] 'ऐसा तो जो कोई भी कह सकता है—'मैं
क्या तुम उस सूत्रको जानते हो, जिसके द्वारा यह लोक, | जानता हूँ, मैं जानता हूँ' [किंतु यों व्यर्थ ढोल पीटनेसे क्या
परलोक और सारे भूत ग्रथित हैं ?' तब उस काप्य पतञ्चलने | लाभ ? यदि वास्तवमें तुम्हें उसका ज्ञान है तो] जिस प्रकार
कहा, 'भगवन् ! मैं उसे नहीं जानता ।' उसने पतञ्चल काप्य | तुम जानते हो वह कहो' ॥ १ ॥
और याज्ञिकोंसे कहा, 'काप्य ! क्या तुम उस अन्तर्यामीको | उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'गौतम ! वायु ही वह सूत्र है,
जानते हो जो इस लोक, परलोक और समस्त भूतोंको | गौतम ! वायुरूप सूत्रके द्वारा ही यह लोक, परलोक और
भीतरसे नियमित करता है ?' उस पतञ्चल काप्यने कहा, | समस्त भूतसमुदाय गुथे हुए हैं। हे गौतम ! इसीसे मरे हुए
'भगवन् ! मै उसे नहीं जानता ।' उसने पतञ्चल काप्य और | पुरुषको ऐसा कहते हैं कि इसके अग विक्षस्त (विशीर्ण)
याज्ञिकोंसे कहा, 'काप्य ! जो कोई उस सूत्र और उस | हो गये हैं, क्योंकि हे गौतम ! वे वायुरूप सूत्रसे ही सग्रथित
अन्तर्यामीको जानता है, वह ब्रह्मवेत्ता है, वह लोकवेत्ता है, | होते हैं ।' [आरुणि—] 'हे याज्ञवल्क्य ! ठीक है, यह तो
वह देववेत्ता है, वह वेदवेत्ता है, वह भूतवेत्ता है, वह आत्म- | ऐसा ही है, अब तुम अन्तर्यामीका वर्णन करो' ॥ २ ॥
वेत्ता है और वह सर्ववेत्ता है ।' तथा इसके पश्चात् गन्धर्वने | जो पृथिवीमें रहनेवाला पृथिवीके भीतर है, जिसे पृथिवी
४८० * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ३
नहीं जानती जिसका पृथिवी शरीर है और जो भीतर रहकर
पृथिवीका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी
अमृत है। जो जलमें रहनेवाला जलके भीतर है, जिसे जल
नहीं जानता, जल जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर
जलका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी
अमृत है। जो अग्निमे रहनेवाला अग्निके भीतर है, जिसे अग्नि
नहीं जानता, अग्नि जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर
अग्निका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी
अमृत है। जो अन्तरिक्षमें रहनेवाला अन्तरिक्षके भीतर है,
जिसे अन्तरिक्ष नहीं जानता, अन्तरिक्ष जिसका शरीर है
और जो भीतर रहकर अन्तरिक्षका नियमन करता है, वह
तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो वायुमें रहनेवाला
वायुके भीतर है, जिसे वायु नहीं जानता, वायु जिसका
शरीर है और जो भीतर रहकर वायुका नियमन करता है,
वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो द्युलोकमें
रहनेवाला द्युलोकके भीतर है, जिसे द्युलोक नहीं जानता, द्युलोक
जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर द्युलोकका नियमन
करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो
आदित्यमें रहनेवाला आदित्यके भीतर है, जिसे आदित्य
नहीं जानता, आदित्य जिसका शरीर है और जो भीतर
रहकर आदित्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा
अन्तर्यामी अमृत है। जो दिशाओमें रहनेवाला दिशाओंके
भीतर है, जिसे दिशाएँ नहीं जानतीं, दिशाएँ जिसका शरीर
हैं और जो भीतर रहकर दिशाओंका नियमन करता है, वह
तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो चन्द्रमा और
ताराओंमें रहनेवाला चन्द्रमा और ताराओंके भीतर है, जिसे
चन्द्रमा और ताराएँ नहीं जानतीं, चन्द्रमा और ताराएँ जिसका
शरीर हैं और जो भीतर रहकर चन्द्रमा और ताराओंका
नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।
जो आकाशमें रहनेवाला आकाशके भीतर है, जिसे आकाश
नहीं जानता आकाश जिसका शरीर है और जो भीतर
रहकर आकाशका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा
अन्तर्यामी अमृत है। जो तममें रहनेवाला तमके भीतर है,
जिसे तम नहीं जानता, तम जिसका शरीर है और जो
भीतर रहकर तमका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा
अन्तर्यामी अमृत है। जो तेजमे रहनेवाला तेजके भीतर है,
जिसे तेज नहीं जानता, तेज जिसका शरीर है और जो
भीतर रहकर तेजका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा
अन्तर्यामी अमृत है। यह अधिदैवत-दर्शन हुआ, आगे
अधिभूत-दर्शन है ॥ ३-१४ ॥
जो समस्त भूतोमे स्थित रहनेवाला समस्त भूतोके भीतर
है, जिसे समस्त भूत नहीं जानते, समस्त भूत जिसके शरीर
हैं और जो भीतर रहकर समस्त भूतोका नियमन करता है,
वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। यह अधिभूतदर्शन
है, अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है। जो प्राणमें रहनेवाला
प्राणके भीतर है, जिसे प्राण नहीं जानता, प्राण जिसका शरीर
है और जो भीतर रहकर प्राणका नियमन करता है, वह
तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो वाणीमें रहनेवाला
वाणीके भीतर है, जिसे वाणी नहीं जानती, वाणी जिसका
शरीर है और जो भीतर रहकर वाणीका नियमन करता
है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो नेत्रमें रहने-
वाला नेत्रके भीतर है, जिसे नेत्र नहीं जानता, नेत्र जिसका
शरीर है और जो भीतर रहकर नेत्रका नियमन करता है,
वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो श्रोत्रमे रहने-
वाला श्रोत्रके भीतर है, जिसे श्रोत्र नहीं जानता, श्रोत्र जिसका
शरीर है और जो भीतर रहकर श्रोत्रका नियमन करता
है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो मनमें
रहनेवाला मनके भीतर है, जिसे मन नहीं जानता, मन
जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर मनका नियमन करता
है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो त्वक्में
रहनेवाला त्वक्के भीतर है, जिसे त्वक् नहीं जानती, त्वक्
जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर त्वक्का नियमन
करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। जो विज्ञान-
मे रहनेवाला विज्ञानके भीतर है, जिसे विज्ञान नही जानता,
विज्ञान जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर विज्ञानका
नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।
जो वीर्यमे रहनेवाला वीर्यके भीतर है, जिसे वीर्य नहीं जानता,
वीर्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर वीर्यका नियमन
करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। वह
दिखायी न देनेवाला किंतु देखनेवाला है, सुनायी न देनेवाला
किंतु सुननेवाला है, मननका विषय न होनेवाला किंतु मनन
करनेवाला है और विशेषतया ज्ञात न होनेवाला किंतु विशेष-
रूपसे जाननेवाला है, यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत
है। इससे भिन्न सब नाशवान् है। इसके पश्चात् अरुणका
पुत्र उद्दालक प्रश्न करनेसे निवृत्त हो गया ॥ १५-२३ ॥