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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

तृतीय अध्याय

ॐ
तृतीय अध्याय
कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा, येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा
गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति ॥ १ ॥
वयम्= हमलोग; उपास्महे = जिसकी उपासना करते हैं, [सः = वह,] अयम् = यह, आत्मा = आत्मा, कः इति = कौन है,
वा = अथवा, येन = जिससे, पश्यति = मनुष्य देखता है, वा = या, येन = जिससे, शृणोति = सुनता है, वा = अथवा, येन = जिससे;
गन्धान् = गन्धों को, आजिघ्रति = सूँघता है, वा = अथवा, येन = जिससे, वाचम् = वाणी को, व्याकरोति = स्पष्ट बोलता है,
वा = या, येन = जिससे, स्वादु = स्वादयुक्त, च = और, अस्वादु = स्वादहीन वस्तु को, च = भी, विजानाति = अलग-अलग जानता है,
सः = वह, आत्मा = आत्मा, कतरः = ( पिछले अध्यायोंमे कहे हुए दो आत्माओंमेंसे ) कौन है* ॥ १ ॥
व्याख्या—इस उपनिषद्के पहले और दूसरे अध्यायोंमें दो आत्माओंका वर्णन आया है—एक तो वह आत्मा
( परमात्मा ), जिसने इस सृष्टिकी रचना की और सजीव पुरुषको प्रकट करके उसका सहयोग देनेके लिये स्वय उसमे प्रविष्ट
हुआ, दूसरा वह आत्मा ( जीवात्मा ), जिसको सजीव पुरुषरूपमें उसने प्रकट किया या और जिसके जन्म जन्मान्तरकी
परम्पराका वर्णन दूसरे अध्यायमें गर्भमे आनेसे लेकर मरणपर्यन्त किया गया है । इनमेंसे उपास्य देव कौन है, वह कैसा है, उसकी
क्या पहचान है—इन बातोंका निर्णय करनेके लिये यह तीसरा अध्याय कहा गया है । मन्त्रका तात्पर्य यह है कि उस
उपास्यदेव परमात्माके तत्त्वको जाननेकी इच्छावाले कुछ मनुष्य आपसमे विचार करने लगे—'जिसकी हमलोग उपासना
करते हैं अर्थात् जिसकी उपासना करके हमें उसे प्राप्त करना चाहिये, वह आत्मा कौन है ? दूसरे शब्दोंमे जिसके सहयोगसे
मनुष्य नेत्रोंके द्वारा समस्त दृश्य देखता है, जिससे कानोंद्वारा शब्द सुनता है, जिससे घ्राणेन्द्रियके द्वारा नाना प्रकारकी
गन्ध सूँघता है, जिससे वाणीद्वारा वचन बोलता है, जिससे रसनाद्वारा स्वादयुक्त और स्वादहीन वस्तुको अलग अलग पहचान
लेता है, वह पहले और दूसरे अध्यायोंमें वर्णित दो आत्माओंमेंसे कौन है ? ॥ १ ॥
यदेतद्धृदयं मनश्चैतत् । संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धृतिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः
संकल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥ २ ॥
यत्=जो, एतत्=यह, हृदयम् = हृदय है, एतत्=यही, मनः = मन, च=भी है, संज्ञानम्=सम्यक् ज्ञान शक्ति,
आज्ञानम्= आज्ञा देनेकी शक्ति, विज्ञानम्=विभिन्न रूपसे जाननेकी शक्ति, प्रज्ञानम्=तत्काल जाननेकी शक्ति, मेधा=
धारण करनेकी शक्ति, दृष्टिः = देखनेकी शक्ति, धृतिः = धैर्य, मतिः = बुद्धि, मनीषा = मनन शक्ति, जूतिः = वेग, स्मृतिः =
स्मरण शक्ति, संकल्पः = सङ्कल्प शक्ति, क्रतुः = मनोरथ शक्ति, असुः = प्राण शक्ति, कामः = कामना शक्ति, वशः = स्त्री ससर्ग
आदिकी अभिलाषा, इति = इस प्रकार, एतानि = ये, सर्वाणि = सब के सब, प्रज्ञानस्य = स्वच्छ ज्ञानस्वरूप परमात्माके,
एव = ही, नामधेयानि = नाम अर्थात् उसकी सत्ताके बोधक लक्षण, भवन्ति = हैं ॥ २ ॥
व्याख्या—इस प्रकार विचार उपस्थित करके उन्होंने सोचा कि जो यह हृदय अर्थात् अन्तःकरण है, यही पहले
बताया हुआ मन है, इस मनकी जो यह सम्यक् प्रकारसे जाननेकी शक्ति देखनेमें आती है—अर्थात् जो दूसरोपर आज्ञाद्वारा
शासन करनेकी शक्ति, पदार्थोंका अलग-अलग विवेचन करके जाननेकी शक्ति, देखे सुने हुए पदार्थोंको तत्काल समझ लेनेकी
शक्ति, अनुभवको धारण करनेकी शक्ति, देखनेकी शक्ति, धैर्य अर्थात् विचलित न होनेकी शक्ति, बुद्धि अर्थात् निश्चय करनेकी
शक्ति, मननं करनेकी शक्ति, वेग अर्थात् क्षणभरमे कही-से कहीं चले जानेकी शक्ति, स्मरण शक्ति, सङ्कल्प शक्ति, मनोरथ शक्ति,
प्राण शक्ति, कामना शक्ति और स्त्री-सहवास आदिकी अभिलाषा—इस प्रकार जो ये शक्तियाँ है, वे सब की सब उस स्वच्छ

  • केनोपनिषद्के आरम्भकी इसके साथ बहुत अंशोंमें समानता है ।
  • ऐतरेयोपनिषद् * ३११
    ज्ञानस्वरूप परमात्माके नाम हैं अर्थात् उसकी सत्ताका बोध करानेवाले लक्षण हैं, इन सबको देखकर इन सबके रचयिता,
    संचालक और रक्षककी सर्वव्यापिनी सत्ताका ज्ञान होता है ॥ २ ॥
    एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्च महाभूतानि पृथिवी वायुराकाश
    आपो ज्योतींषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च
    स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किंचेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं
    सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥ ३ ॥
    एषः = यह, ब्रह्मा = ब्रह्मा है, एषः = यह; इन्द्रः = इन्द्र है, एषः = यही, प्रजापतिः = प्रजापति है; एते = ये,
    सर्वे = समस्त, देवाः = देवता, च = तथा, इमानि = ये, पृथिवी = पृथ्वी, वायुः = वायु, आकाशः = आकाश;
    आपः = जल, और ज्योतींषि = तेज, इति = इस प्रकार; एतानि = ये, पञ्च = पाँच, महाभूतानि = महाभूत,
    च = तथा, इमानि = ये, क्षुद्रमिश्राणि इव = छोटे-छोटे, मिले हुए से, बीजानि = बीजरूप समस्त प्राणी, च = और,
    इतराणि = इनसे भिन्न, इतराणि = दूसरे, च = भी, अण्डजानि = अंडेसे उत्पन्न होनेवाले, च = एव; जारुजानि = जेरसे
    उत्पन्न होनेवाले, च = तथा, स्वेदजानि = पसीनेसे उत्पन्न होनेवाले, च = और, उद्भिज्जानि = जमीन फोड़कर उत्पन्न होनेवाले,
    च = तथा, अश्वाः = घोड़े, गावः = गायें, हस्तिनः = हाथी, पुरुषाः = मनुष्य (ये सब-के-सब मिलकर), यत् = जो, किम् = कुछ,
    च = भी, इदम् = यह जगत् है, यत् च = जो भी कोई, पतत्रि = पाँखोंवाला, च = और, जङ्गमम् = चलने-फिरनेवाला; च =
    और, स्थावरम् = नहीं चलनेवाला, प्राणि = प्राणिसमुदाय है, तत् = वह, सर्वम् = सब, प्रज्ञानेत्रम् = प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे
    शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्यमें समर्थ होनेवाले हैं (और), प्रज्ञाने = उस प्रज्ञानस्वरूप परमात्मामें ही, प्रतिष्ठितम् = स्थित
    है लोकः = (यह समस्त) ब्रह्माण्ड, प्रज्ञानेत्रः = प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे ही ज्ञान शक्तियुक्त है, प्रज्ञा = प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा
    ही प्रतिष्ठा = इस स्थितिका आधार है, प्रज्ञानम् = यह प्रज्ञान ही, ब्रह्म = ब्रह्म है ॥ ३ ॥
    व्याख्या-इस प्रकार विचार करके उन्होंने निश्चय किया कि सबको उत्पन्न करके सब प्रकारकी शक्ति प्रदान
    करनेवाले और उनकी रक्षा करनेवाले स्वच्छ ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही उपास्यदेव हैं। ये ही ब्रह्मा हैं, ये ही पहले अध्यायमें
    वर्णित इन्द्र हैं। ये ही सबकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले समस्त प्रजाओंके स्वामी प्रजापति हैं। ये सब इन्द्रादि
    देवता, ये पाँचो महाभूत-जो पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेजके रूपमें प्रकट हैं, तथा ये छोटे-छोटे मिले हुए-से
    बीजरूपमे स्थित समस्त प्राणी; तथा उनसे भिन्न दूसरे भी-अर्थात् अंडेसे उत्पन्न होनेवाले, जेरसे उत्पन्न होनेवाले, पसीनेसे
    अर्थात् शरीरके मैलसे उत्पन्न होनेवाले और जमीन फोड़कर उत्पन्न होनेवाले तथा घोड़े, गाय, हाथी, मनुष्य-ये सब
    मिलकर जो कुछ यह जगत् है, जो भी कोई पखोंवाले तथा चलने-फिरनेवाले और नहीं चलनेवाले जीवोंके समुदाय हैं-वे
    सब-के-सब प्राणी प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्यमे समर्थ होते हैं और उन प्रज्ञानस्वरूप परमात्मामे
    ही स्थित हैं। यह समस्त ब्रह्माण्ड प्रज्ञानस्वरूप परमात्माकी शक्तिमे ही ज्ञान-शक्तियुक्त है। इसकी स्थितिके आधार प्रज्ञान-
    स्वरूप परमात्मा ही हैं। अतः जिनको पहले इन्द्र और प्रजापतिके नामसे कहा गया है, जो सबकी रचना और रक्षा करने-
    वाले तथा सबको सब प्रकारकी शक्ति देनेवाले प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा हैं, वे ही हमारे उपास्यदेव ब्रह्म हैं-यह निश्चय
    हुआ ॥ ३ ॥
    स एतेन प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन्स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वामृतः समभवत्सम-
    भवत् ॥ ४ ॥
    सः = वह, अस्मात् = इस, लोकात् = लोकसे, उत्क्रम्य = ऊपर उठकर; अमुष्मिन् = उस, स्वर्गे लोके = परम
    धाममे, एतेन = इस, प्रज्ञेन आत्मना = प्रज्ञानस्वरूप ब्रह्मके सहित, सर्वान् = सम्पूर्ण, कामान् = दिव्य भोगोको, आप्त्वा =
    प्राप्त होकर, अमृतः = अमर, समभवत् = हो गया, समभवत् = हो गया ॥ ४ ॥