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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

by गीताप्रेस

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished832 pages

अध्याय ४ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ५२९

Page 567Permalink

अध्याय ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५२९

वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले— 'यह जो छाया-
मय पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह
सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं-नहीं,
इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह मृत्युरूप है—निश्चय
ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह
भी, जो इसकी इस रूपमें उपासना करता है, न तो स्वय
ही समयसे ( मनुष्यके लिये सामान्यतः नियत आयुसे ) पहले
मृत्युको प्राप्त होता है और न उसकी सन्तान ही समयसे
पहले जीवनसे हाथ धोती है' ॥ १४ ॥

उन सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्यने कहा—'यह जो
शरीरान्तर्वर्ती पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता
हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—
'नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह प्रजापति-
रूप है—निश्चय ही इस भावसे ही मैं इसकी उपासना करता
हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इसकी इस रूपमें उपासना
करता है, प्रजा और पशुओंसे सम्पन्न होता है' ॥ १५ ॥

वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले— 'यह जो प्रज्ञासे
नित्य संयुक्त प्राणरूप आत्मा है, जिससे एकताको प्राप्त होकर
यह सोया हुआ पुरुष स्वप्नमार्गसे विचरता है ( नाना प्रकार-
के स्वप्नोंका अनुभव करता है ), उसीकी मैं ब्रह्मरूपसे
उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजात-
शत्रुने कहा—'नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न
करें। यह य$^३$ राजा है—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी
उपासना करता हूँ। इसी प्रकार जो इसकी इस रूपमें उपासना
करता है, उस उपासककी श्रेष्ठताके लिये यह सारा जगत्
नियमपूर्वक चेष्टा करता है' ॥ १६ ॥

उन सुप्रसिद्धबलाकानन्दन गार्ग्यने कहा—'यह जो दाहिने
नेत्रमें पुरुष है, उसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।'
यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं-
नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह नामका
आत्मा, अग्निका आत्मा तथा ज्योतिका आत्मा है—निश्चय
ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह
भी, जो इसकी इस रूपमे उपासना करता है, इन सबका
आत्मा होता है' ॥ १७ ॥

वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले— 'यह जो बायें
नेत्रमे पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।'
यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं-
नहीं, इसके विषयमे आप सवाद न करें। यह सत्यका
आत्मा, विद्युत्का आत्मा और तेजका आत्मा है—निश्चय ही
इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह
भी, जो इसकी इस रूपमे उपासना करता है, इन सबका
आत्मा होता है' ॥ १८ ॥

उसके बाद बलाकानन्दन गार्ग्य चुप हो गये। तब उनसे
प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा— 'बालाके ! बस, क्या इतना
ही आपका ब्रह्मज्ञान है ?' इस प्रश्नपर बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—
'हाँ, इतना ही है।' तब उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने
कहा—'तब तो व्यर्थ ही आपने मेरे साथ यह संवाद किया था
कि मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करूँगा । बलाकानन्दन ! अवश्य
ही जो आपके बताये हुए इन सभी सोपाधिक पुरुषोंका कर्ता है
अथवा ये सभी जिसके कर्म हैं, वही जाननेयोग्य है।'

राजाके यह कहनेपर वे प्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य हाथमें
समिधा लेकर उनके पास गये और बोले—'मैं आपको गुरु
बनानेके लिये समीप आता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध
राजा अजातशत्रुने कहा—'यह विपरीत बात हो जायगी, यदि
क्षत्रिय ब्राह्मणको शिष्य बनानेके लिये अपने समीप बुलाये ।
इसलिये आइये ( एकान्तमें चलें ), वहाँ आपको मैं अवश्य
ब्रह्मका ज्ञान कराऊँगा।' यों कहकर राजाने बालाकि गार्ग्यका
हाथ पकड़ लिया और वहाँसे चल दिये। वे दोनों एक सोये
हुए पुरुषके पास चले आये। वहाँ प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने
उस सोये हुए पुरुषको पुकारा—'ओ बृहन् ! हे पाण्डरवासा !
हे सोम राजन् !' इस प्रकार सम्बोधन करनेपर भी वह पुरुष
चुपचाप सोया ही रहा। तब राजाने उस पुरुषके शरीरपर
छड़ीसे आघात किया। वह सोया हुआ पुरुष छड़ीकी चोट
लगते ही उठकर खड़ा हो गया। तब बालाकि गार्ग्यसे राजा
अजातशत्रुने कहा—'बालाके ! यह पुरुष इस प्रकार अचेत-सा
होकर कहाँ सोता था ? किस प्रदेशमें इसका शयन हुआ था ?
और इस जाग्रत्-अवस्थाके प्रति यह कहाँसे चला आया ?'


१. छाया अन्धकारका ही स्वरूप है। बाहरका अन्धकार और भीतरका अज्ञान—ये दोनों मृत्युरूप हैं।
२ सन्तानके उत्पादन और पालन-पोषणमें संलग्न रहनेसे यहाँ शरीरस्थित पुरुषको 'प्रजापति' कहा गया है।
३. प्राण ही यम-नियमका हेतु है तथा वह राजाकी भाँति सर्वत्र विशेष स्थान रखता है, अतएव वह 'यम राजा' कहा गया है।
१-२. नेत्र तैजस इन्द्रिय है, नेत्रसे ही नाम-रूपावली वस्तुओंका प्रकाशन होता है, अत इसे नाम, सत्य, ज्योति, विद्युत्, अग्नि और तेजका आत्मा बताना ठीक ही है।

उ० अ० ६७—