कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
'कबीरकृष्णगीता' कबीरपन्थी परम्परा का एक ग्रन्थ है, जिसमें श्रीकृष्ण और अन्य पौराणिक पात्रों के मुख से कबीर साहब और सत्यनाम की महिमा कही गई है। मुखपृष्ठ के अनुसार यह 'कबीरदर्शन ग्रन्थमाला' की पहली भाषिका है, जिसे कबीरपन्थी ग्रन्थों के जीर्णोद्धारक, कबीरधर्मनगर के हजूरी महन्त श्री युगलदास जी से जुड़े भारत-पथिक स्वामी श्री युगलानन्द विहारी ने संगृहीत किया।
ग्रन्थ के प्रसंगों में धर्मराज की सभा, सत्यनाम की महिमा, राजा छत्रजीत की कथा, नारद-कृष्ण संवाद, यमदूत और कृष्ण का कबीर के भक्त के विषय में वार्तालाप, सत्यलोक, जीव और निरञ्जन का वर्णन, काल-लीला और काल से बचने का मार्ग, निरञ्जन और विष्णु का संवाद, शुकदेव के अनेक जन्मों का वृत्तान्त, राजा निर्मोह की कथा, गुरु की महिमा और सच्चे गुरु की पहचान, पाण्डव-कृष्ण संवाद, कपिल मुनि का वृत्तान्त, व्यास का कबीर से सत्यलोक दिखाने की प्रार्थना और कलियुग में तरने का मार्ग जैसे विषय आते हैं।
यह खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेङ्कटेश्वर प्रेस, मुम्बई का प्रकाशन है और स्कैन की गई प्रति सितम्बर २०१५ (संवत् २०७२) के संस्करण की है। १६८ पृष्ठों का यह ग्रन्थ कबीरपन्थ की पौराणिक कथाओं और उसके सृष्टि-विचार को समझने के लिए उपयोगी है।
सत्य भक्ति तथा योग भोगका वर्णन
कबीरकृष्णगीता ।
१४९
एक २ रोम वैष्णव सतोगुण । रज तम देवी पंथहै दुर्जन ॥
यह सब तन वैष्णव तन दूजा । रज तम देवी पंथ अरुझा ॥
जो नहिं संतहि माने भाई । झूठहिं थाप नरकमें जाई ॥
जन्मे घरे सो क्रीतम झूठा । अजर स्वास जिव संतन दूठा ॥
सत्यकबीर अजर अविनाशी । सत्यकबीर जो करे हुलासी ॥
दुलह कबीर अमर सुखरासी । दुलहिन जीव अमरघरवासी ॥
देह धरे भौ जिव चकलागा । खसम विसार जार मन वागा ॥
धगरा मनमत त्रिगुण निरंजन । खसम कबीर काल सिरभंजन ॥
जै जै स्वामी सत्य कबीर । स्तुति करें त्रिय देव सो धीर ॥
तीनों कहे हम तरे तुव दाय। मुक्त परवाना कबीर सिरवाया ॥
अगले हंसन वाट चिन्हाई । सर्व शास्त्र दाय। फरमाई ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण यह निश्चय जानी । मुक्ति कबीर चरण लपटानी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो सब कोई । सांची भक्ति विना गत खोई ॥
सांच भक्ति गुरु साध विश्वास। भैरों भूत देवी यमफांसा ॥
कहैं कबीर सुन वृषभ सवारी । प्रच्छेहु प्रथम सो लेहु निरवारी ॥
सब योनिन तत गुण क्रीत विवरण । पांचतीन एक मिलनर जोहतन
पिंडज चार तत्त नभ त्यागी । और सकल नभहि ते लागी ॥
अबूज तीनते पृथ्वी वाई । उषमज दोय तत्त तेज औवाई ॥
एक तत्त अंकुर दलको थेका । पांच तत्त नर शब्द विवेका ॥
चार खान रचि त्रिगुण अछंगी । एक जीव तनका चित्रभंगी ॥
जोग भोग दोउ रोग समाना । नाम भक्त चहुँ युग निरवाना ॥
विशदका स्वरूप कथन
१५०
कबीरकृष्णगीता ।
पांच तीन बस तन अघखानी । सट्टरु सेव हंस पिल जानी ॥
तन विदेह विन घरको भवन है । पांच तत्त यन कहांसोरंगहै ॥
यथयम कहेउं पंच सैल ततुरंगा । सुन भूलेहु तुम खाहु बहु भंगा ॥
योगी सोहंग तन सिंगी बजावे । सहज आसन तन विभूत रभावे ॥
हटताई दिब्बी अमीगत ठपना । सबे विगाना सट्टरु अपना ॥
चावल प्रीत चेतन दिल दाला । ब्रह्म अगिन कमल परजाला ॥
निरगुण नाम निमक सो सब रस। तेज पात विश्वास सो अदरख ॥
प्रेम सुचित सो घीव जीवन । काया क्षीर यथे कोई गुरुजन ॥
पारस पान प्रसाद चढाये । अमी नीर कबीर पियाये ॥
दया दही गऊ घृत सुच दूधा । खोवा काम क्रोध घर सोधा ॥
गरस प्रसाद विरान सुरत सेवक । शुभ आशिष देहिं गुरुदेवक ॥
अजर अमर घर वर मिल आशिष । पिया रूपरस जगमें अतिसुन ॥
पिष हिय पैठि सेवककेरा । जन्म मरनका करे नवेरा ॥
भया निवेरा सो कस हूवा । पांच पचीस त्रिगुन तन जूवा ॥
अजर अमर अविचल सो काया । अमर लोक सबे सुख पाया ॥
कहैं कबीर छूटेउ सब संसा । तरे इकोतर पिछले वंसा ॥
सट्टरु शरण हाथिगत पुरुषा । खसम कबीरहिं लखेन न सुरखा ॥
कहैं कबीर तन भुवन चतुर्दश । चौदह संग चालक जीव सर्वसा ॥
चौदह संग जब बाहर होई । सत कहे सट्टरु शरण समोई ॥
अजरलोक पगु अधर बखाना । निज पगु अरध चितल परजाना ॥
तीन लोक उरध तेह ताको । लोक तलातल जंघ अस्थापो ॥
लोक माहिं तल इंदुकी वारी । मलस्थान रसातल खारी ॥
कटि पताललोक विस्तारा । सान दीप नभ अधर उचारा ॥
चौदह यमका वर्णन व ग्रंथसमाप्ति
कबीरकृष्णगीता ।
१५१
इंद्र सप्त दीप भुवलोके नाभी स्थानी । नामके वाम दहिने भै जानी ॥
रवर्गलोक हृदय अस्थापी । अमर लोक तन दोउ सुज दापी ॥
कंठ स्थान आहि जनलोक । हे पतलोक खिलोट विसोका ॥
कीतम सत्यलोक नर माथा । आद सतलोक अमरपुर ताका ॥
कुल अंगुष्ठ बुढ़ा पगु पाहीं । नाडि सकल सेस परवाहीं ॥
निज सुख देखहु तीनों लोका । रसना उर्ध सरम पंथ मोका ॥
रसना मृत्युलोक कोई थिर नाहीं । जिदा जग प्रगट रहाकोइ न माहीं
रसना अरध पतालके सो साता । अष्ट घात पिंजरा जिवराता ॥
निराकार प्रबल मंजारा । सत्यनाम विन तेहि दै मारा ॥
अष्टंगी मंजारी खोटी । तीन लोक जिव खायसि घोटी ॥
कहै कबीर जिन सुमरो मोही । यम सिर भंजन बचायेउ बोही ॥
चौदह यम तन जीवहि घेरा । चौदह यमका करो निवेरा ॥
प्रथमहि धर्म करे यम घाता । धर्मराय यम इस मन माता ॥
दुतिय काम त्रितय यम कोधा । चौथे लोभ पंचये भ्रम सोधा ॥
छठयै यम लक्ष बुध विकारा । सतयै परधन हर सत हारा ॥
अठयै अहंकार नौमै मोहा । दसयै दस इंद्दी सुख जोहा ॥
इकादसे आप तन पोषा । अश्यागत तज खाय न मोषा ॥
द्वादसयै लेय विश्वास घाती । त्रियदस तृष्णा लोभ जमाती ॥
चतुर्दश चिंता तन बन आगी । चिंताहि डाह कोई वैरागी ॥
चिंता सोइ जो सट्टर सेवा । सट्टर सब देवनकर देवा ॥
कृष्णवचन ।
कहै कृष्ण निरने निरवारा । सत्यकबीर औ तारनहारा ॥
हम सब मगन कबीरके पाछे । हमार निवाह कबीरकृत आछे ॥
१५२
कबीरकृष्णगीता ।
चारों युग कबीर मोहि रासा । कहैं कृष्ण व्यास सत भाषा ॥
पूछहिं तारा अकाश घर स्वामी । कहैं सदुरु नखत निधायी ॥
केतिक तारा आहिं अकाश । कौन वरण तारागण भाषा ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर तारा यम रोवा । प्रबल निरंजन यम जिव हुवा ॥
उतरो याही यमकी काया । दिये छिटकाय रैन नम याया ॥
होत प्रात फिर सुन्य समाई । सात तबकके पार सो जाई ॥
सुन्य समाय रहा धर ध्याना । दिन गत बहुरि रैन प्रगटना ॥
रैन निरंजन दिवस कबीरं । सूर निरंजन शशि सत धीरं ॥
अनंत कोट उडगण तनवारा । चौदह योजन गोछ निराकार ॥
गोछ वीर जीवहिं दे सूरि । कबीरके भक्त करे भौभूरी ॥
दोहा-श्रीकृष्ण त्रिय देव मिल, स्तुति कराहिं अपार ।
सुखदेव व्यास सब विनवहीं, जै जै कबीर विचार ॥
कबीर काल सिर भंजन, और मुक्त देहिं जीव ।
विष्णु व्यास सत कहत हैं, सत्यकबीर निज पीव ।
इति श्रीकबीरकृष्णगीता समाप्ता ।
रिक्त पृष्ठ
हमारे प्रकाशनों की अधिक जानकारी व खरीद के लिये हमारे निजी स्थान :
खेमराज श्रीकृष्णदास
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
११/१०९, खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,
७ वी खेतवाडी बॅक रोड कार्नर,
मुंबई - ४०० ००४.
दूरभाष/फैक्स-०२२-२३८५७४५६.
खेमराज श्रीकृष्णदास
६६, हडपसर इण्डस्ट्रियल इस्टेट,
पुणे - ४११ ०१३.
दूरभाष-०२०-२६८७१,०२५,
फैक्स -०२०-२६८७४९,०७.
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,
लक्ष्मी वेंकटेश्वर प्रेस व बुक डिपो
श्रीलक्ष्मीवेंकटेश्वर प्रेस विल्डिंग,
जुना छापाखाना गली, अहिल्याबाई चौक,
कल्याण, जि. ठाणे, महाराष्ट्र - ४२१ ३०१
दूरभाष/फैक्स-०२५१-२२०९०६१.
खेमराज श्रीकृष्णदास
चौक, वाराणसी (उ.प्र.) २२१ ००१.
दूरभाष - ०५४२-२४२००७८
KHEMRAJ SHRIKRISHNADASS