कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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इंद्र सप्त दीप भुवलोके नाभी स्थानी । नामके वाम दहिने भै जानी ॥
रवर्गलोक हृदय अस्थापी । अमर लोक तन दोउ सुज दापी ॥
कंठ स्थान आहि जनलोक । हे पतलोक खिलोट विसोका ॥
कीतम सत्यलोक नर माथा । आद सतलोक अमरपुर ताका ॥
कुल अंगुष्ठ बुढ़ा पगु पाहीं । नाडि सकल सेस परवाहीं ॥
निज सुख देखहु तीनों लोका । रसना उर्ध सरम पंथ मोका ॥
रसना मृत्युलोक कोई थिर नाहीं । जिदा जग प्रगट रहाकोइ न माहीं
रसना अरध पतालके सो साता । अष्ट घात पिंजरा जिवराता ॥
निराकार प्रबल मंजारा । सत्यनाम विन तेहि दै मारा ॥
अष्टंगी मंजारी खोटी । तीन लोक जिव खायसि घोटी ॥
कहै कबीर जिन सुमरो मोही । यम सिर भंजन बचायेउ बोही ॥
चौदह यम तन जीवहि घेरा । चौदह यमका करो निवेरा ॥
प्रथमहि धर्म करे यम घाता । धर्मराय यम इस मन माता ॥
दुतिय काम त्रितय यम कोधा । चौथे लोभ पंचये भ्रम सोधा ॥
छठयै यम लक्ष बुध विकारा । सतयै परधन हर सत हारा ॥
अठयै अहंकार नौमै मोहा । दसयै दस इंद्दी सुख जोहा ॥
इकादसे आप तन पोषा । अश्यागत तज खाय न मोषा ॥
द्वादसयै लेय विश्वास घाती । त्रियदस तृष्णा लोभ जमाती ॥
चतुर्दश चिंता तन बन आगी । चिंताहि डाह कोई वैरागी ॥
चिंता सोइ जो सट्टर सेवा । सट्टर सब देवनकर देवा ॥
कृष्णवचन ।
कहै कृष्ण निरने निरवारा । सत्यकबीर औ तारनहारा ॥
हम सब मगन कबीरके पाछे । हमार निवाह कबीरकृत आछे ॥