कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पाण्डव और कृष्ण संवाद
३२
कवीरकृष्णगीता ।
दया क्षमा सत गहे सो पंथा । दीन दुखी पातक भगवंता ॥
गुरु साधमहैं मोकहैं देखे । घात द्रोह तज पंथ परेखे ॥
भेटो आप मृतककी नाई । प्रेत पिशाच असुर औतरई ॥
रहे जो पुण्य सो प्राणी । रामनाम भज वरतन जानी ॥
नरतन पाय जो भजे कबीरा । कवीर भेंट मिटे तनपीरा ॥
शिव तमगुणकी भक्तिजो करई । प्रेत पिशाच असुर औतरई ॥
देवि भक्त चौरासी वासा । भक्त करे तन परे यम फांसा ॥
शूकर भान गिद्ध मंजारी । परे चौरासी मांस अहारी ॥
दिन रस चेटक भूत यसाना । नामभक्त बिन यमघर थाना ॥
जाहि ज्ञान जाके मन थाका । आतम परमातम पंथ ताका ॥
परआतम सब आतम कीन्हा । बिरलेआतम परमातम चीन्हा ॥
जिन चीन्हा तिन्ह सद्गुरु सेवा । सद्गुरु सत्कवीर निज भेवा ॥
नारद मगन भये सुन वाणी । धन्य कवीरजो कीन्ह वखानी ॥
अर्जुनउवाच ।
अर्जुन पूछे सीस नवाई । अवलग्न हय नहीं पूछ गोसाई ॥
को कवीर कहवाते आये । जाकी ऐसी स्तुति लाये ॥
भक्त कवीर जो रहे एक तोरा । तुमते कौन बड़ा सुन मोरा ॥
युधिष्ठिरवचन ।
कहैं युधिष्ठिर सुनहु महिंदा । गुरु साधकर जितकर निंदा ॥
गुरुके निंदा साधुके खोटी । जुरेनसे जन वस्तर रोटी ॥
ताकर वंश होय निर्दंशा । जो साधुके निंदा परसंसा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
३३
भीम वचन ।
कहे भीम अर्जुन भल कहा । सुना कबीर जुल्हा एक रहा ॥
ताकी एतिक करे बड़ाई । तब सहदेन बोले रिस आई ॥
तुम कबीर कह सके बूझा । अबहिं तोहिं गुरुमत नहिं सुझा ॥
कबीर नाम करता आविनासी । कबीर भजे तेहि छूटे चौरासी ॥
नकुल वचन ।
कहे नकुल भक्त कहा गोसाईं । जेहि मधु तारे सो तर जाई ॥
सुनिके कृष्ण कहा सुन भीमा । अर्जुन पठे तिनहु नहिं चीन्हा ॥
दोहा—सोई कबीर तुम चीन्हहु, जेहि शिष्य घंट बजाय ॥
द्वार भक्त सुदरसन, डोम स्वपच बरणाय ॥
कबीर सोई जाको अस शिष्या। हम सब जीव कबीर घर भीषा ॥
जोलहा आद जासु जगताना । सुरझे साथ साकट अरुझाना ॥
चंदसूर जाके दोय तारा । करि गह काया बिनहि रिसारा ॥
इंगला पिंगला चले दोय घोटी । मध्य सुषुम्णा हांथ जोटी ॥
सरसों तीन साठ लग जानी । अर्ध उर्ध दोय खूँटी तानी ॥
तानी ताना भरनी सुत स्वासा । निहचल बिनहि कबीरा दासा ॥
धरती अकाश पवन औ पानी । रचा कबीर सकल रजधानी ॥
फिरहिं जगतमहँ आप छिपाये । भक्त सुक पथ इनाहिं चलाये ॥
जासे तबहिं निरंजन राई । हम तुम कौन गलीमहँ भाई ॥
संकट माहिं कबीर सहाई । बंदी छोर कबीर गोसाईं ॥
करताका कोइ अंत न पावे । तरे सोई जो भक्त कमावे ॥