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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

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Devanagarihipublished250 pages

About this granth

Ichhanusar Santan (इच्छानुसार सन्तान), 'children as you wish', is a Hindi book by Virendra Gupta, subtitled as putting control over procreation in the reader's hands. The title page carries Om, a creation-era date, Dayanandabda 185 and Vikram Samvat 2065, marking both its Arya Samaj outlook and its publication around 2008. It was published by Virendra Nath Ashwini Kumar, Prakashan Mandir, Moradabad.

Much of the book is about daily health discipline. Its chapters cover the human being and health, the seasons and seasonal diet, early rising, drinking water at dawn, elimination, cleaning the teeth, care of the eyes, oil massage, exercise, bathing, sandhya worship, pranayama, food, sleep, the preservation of vital fluid and celibacy, before turning to conception and offspring. It opens with an introduction, a short note and an account of the author.

The book presents a traditional view drawn from Ayurvedic routine and Vedic samskaras; its health advice reflects the author's views rather than modern medical guidance. The 250-page copy is from the Mumukshu Bhawan collection, Varanasi, digitised by eGangotri.

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उपयोगी है। शहद में बलानुसार प्रयोग करें। या रात के भीगे बादाम की मींग ५ ग्राम को बारी पीसकर उसमें ५ ग्राम मक्खन और १० ग्राम शहद मिलाकर औषधि का सेवन करने से अधिक लाभ होता है।

१००-ज्योतिषपति तेल- इसे मालकांगनी का तेल भी कहते हैं। इसका तेल नित्य १-२ बूँद खाण्ड के बताशे में अथवा खाली कपूल में डालकर सेवन करें, २ बताशे और खा लें। इनके सेवन से स्मृति बढ़ती है, बुद्धि स्थिर होती है। एक बूँद तेल दोनों हाथ की हथेलियों पर लगाकर अंगूठे से २ मिनट तक मलते रहने से आँखों की ज्योति बढ़ती है। इसका सेवन गर्म प्रकृति के और बच्चों को नहीं कराना चाहिये। यह हलका रेचक होता है। जिन बच्चों की नेत्र ज्योति कम है उनकी हथेलियों पर मल सकते हैं, नेत्र ठीक बने रहते हैं।

१०१-कैन्सर के लिये उत्तम प्रयोग- हीरा भस्म इसे वज्रभस्म भी कहते हैं। ११ रत्नी, सुवर्ण भस्म, मुक्तापिष्टी और अघ्रक भस्म सी पुटी २-२ माशा सबको मिलाकर ४८ पुड़ियाँ बनालें। प्रतिदिन प्रातः १ पुड़िया मलाई मिश्री के साथ देने से कर्कस्फोट अर्थात् कैन्सर आदि की प्रस्थियाँ गलकर नष्ट हो जाती हैं। देह के भीतर होने वाले पुष्पशत, अबुर्द, कर्कस्फोट कैन्सर पिलपिला, ग्रन्थीदार, चारों ओर फैलने वाला, रक्त कैन्सर, गुल्म आदि सब पर सफलता सहित कार्य करता है। हीरा भस्म के अभाव में वैक्रान्त भस्म ली जा सकती है।

१०२-कांचनार गुग्गुल- के प्रयोग से कण्ठमाला, अपची, अबुर्द, कर्कस्फोट (कैन्सर) ग्रन्थी व्रण, गुल्म, कुष्ठ, भगन्दर आदि उग्र रोगों में अतिलाभदायक है। इसका सेवन ३-४ मास तक निरन्तर करना चाहिये। २ गोली खदिररिष्ट या त्रिफला क्वाथ से लें।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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१०३-माजूम उशबा- इसके सेवन से जीर्णलीन, विषको जलाने और स्वेद अर्थात् पसीने द्वारा विष को बाहर निकालने के लिये प्रयोजित होता है। जीर्ण फिर्ग, जीर्ण सुजाक, नाड़ी ब्रण, विस्फोटक आदि लीन विष से उत्पन्न रक्त विकार चर्मरोग कण्डु, अर्श, संधि स्थानों की वेदना आदि को दूर करता है। अबुर्द, कैन्सर और ट्यूमर अन्तर्विद्रधि अर्थात् आंत का बढ़ना आदि लीनविष को गलाने में उपयोगी है। सेवन दिन में एक बार प्रातः या रात्रि को सेवन करें। अनुकूल रहे तो गोदुध का सेवन करें।

१०४-सूर्य गुणी औषधि- इन्दिरा गुप्ता, वेद कृति १३, राम बिहार कालोनी, जिला सहकारी बैंक के पीछे मुरादाबाद से प्राप्त हो सकती है। इसका सेवन गर्भावस्था के ८१ से ८५ दिन के मध्य में सेवन कराने से पुत्र की प्राप्ति होती है।

१०५-संख्या चूर्ण नं०१- शुद्ध सफेद संख्या १ग्राम, वंशलोचन असली १०ग्राम, दानेदार चीनी १०ग्राम इन तीनों में से पहले खरल में डाल कर संख्या को घोटें, पश्चात् वंशलोचन डालकर घोटें, उसके पश्चात् चीनी डालकर खूब घोटें कम से कम ६ घन्टे की घुटाई होनी चाहिये। संख्या चूर्ण नम्बर १ तैयार है। मात्रा १२ती मक्खान या मलाई में मिलाकर चाटें। भोजन के एक घन्टे पश्चात्।

इसके सेवन से प्रत्येक रोग की उग्रता के कारण बनी निर्बलता को शीघ्र दूर करता है। इसके साथ घी देसी और दूध का अधिक सेवन करें। यह श्वास तथा कास खाँसी आदि में अतिहितकर है। हस्त मैथुन के रोगियों को तत्काल लाभ करती है। रक्तवर्धक है। ठण्ड को दूर करती है।

१०६-संख्या चूर्ण नं२- संख्याचूर्ण नं१ १०ग्राम, वंशलोचन २० ग्राम, चीनी (खाण्ड) २०ग्राम। इन तीनों को खूब बारीक खरल कर के रख लें।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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गायत्री मन्त्र

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यह हृदय रोग पर भी अच्छा लाभ करती है।
१०७-संख्या चूर्ण नं३- संख्याचूर्ण नं१ १०ग्राम, वंशलोचन ३५ग्राम,
चीनी (खाण्ड) ३५ ग्राम सबको खरल में डालकर बारीक
करें।

यह प्रयोग असीम लाभप्रद है, इसमें एक मात्रा में संख्या
१०२५वीं भाग आता है, जो नितान्त हानिरहित है। आमाशय
की दुर्बलता तथा रक्त दोषों में असीम लाभदायक है। यह
भी हृदय की दुर्बलता में लाभप्रद है। यह बच्चों को भी दिया
जा सकता है, बच्चों के लिये १चावल की मात्रा देनी चाहिये।
यह अतिसार, विशुचिका आदि में बहुत उत्तम लाभ करता है।
यह अत्यन्त रक्तवर्धक है।

संख्ये का शोधन- संख्या की डली को एक सप्ताह कले
के मूसल के रस में भिगोने से शुद्ध हो जाता है।

१०८- शुद्ध सफेद संख्या १ग्राम को खरल में डालकर खूब घोंटे।
रात को १५ बादाम की मींग निकालकर पानी में भिगोये, प्रातः
छील कर, एक-एक मींग खरल में डालकर घोंटे। इसी प्रकार
सात दिन तक रात को बादाम की मींग पानी में भिगोकर
अगले दिल छीलकर खरल में डालकर घोंटे अर्थात् १०५ बादाम
की मींगें १ग्राम संख्ये में डालकर घोटनी हैं। जब खूब बारीक
हो जाये तो उसकी एक हजार गोलियाँ बनालें। छाया में
सुखाकर रख लें।

एक गोली नित्य प्रातः भोजन के पश्चात् सेवन करें।
इसके सेवन से शरीर पुष्ट होकर अस्थियाँ सुदृढ़ बनती हैं।
इसके निरन्तर ५अथवा ६ वर्ष तक सेवन से आयुश्य वृद्धि
होती है। यह प्रयोग कफ और वात पर अमृततुल्य है। पित्त
प्रकृति के व्यक्ति इसके साथ पूर्वाकित ठण्डक का चूर्ण एक
ग्राम के साथ प्रयोग करना चाहिये।

१०९- अबलेह- १०ग्राम शिलाजीत, ५०ग्राम दक्षिणी मिर्च, १००ग्राम
इच्छानुसार सन्तान २३० वीरेन्द्र गुप्तः

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वादाम की मींग, १००ग्राम देसी घी, २००ग्राम शहद। पहले शिलाजीत और दक्षणी मिर्च को बारीक कटुलें, पश्चात् वादाम की मींग डालकर कटें। जब खूब बारीक हो जाय तो शहद और घी को मिला कर उसमें मिला लें। अबलेह तैयार है। नित्य ५ग्राम सेवन करें।

११०- भुंगराज जिसे भाँगरा भी कहते हैं। इसके पंचांग का चूर्ण और बराबर का औवला चूर्ण मिलाकर बलानुसार ४ग्राम की मात्रा में मधु अथवा दूध से सेवन करने से, रसायन रूप है। इसमें यकृति की क्रिया को सुधारने का परम गुण है। जिसके कारण कामला, यकृत वृद्धि, प्लीहा वृद्धि, अर्श, उदर रोग आदि विकार नष्ट होते हैं। स्वास्थ्थ ठीक होता है। परिणामतः बल वीर्य की वृद्धि होती है।

यह नेत्रों की ज्योति को बढ़ाता है, दांतों को रोगों को दूर करता है, केशों को काला बनाता है। कृष्ठ तथा रक्त शोधक है। कैंसर पर भी प्रभावकारी है।

यकृत और प्लीहा की निर्वलता के कारण जो श्लेष्मा शरीर में संचित हो जाता है, जिस कारण रक्त दूषित होकर अनेक विकार उत्पन्न हो जाते हैं, उन सब को भाँगरा निर्मूल कर देता है।

★★★

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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गायत्री मन्त्र

ओ३म् भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो
देवस्य धीमहि। धियो योः प्रचोदयात्॥

हे! सर्व रक्षक 'ओ३म्' तुम को बार-बार प्रणाम है।
प्राण प्रिय 'भू' दुःख विनाशक, 'भुवः' तुहारा नाम है।
सत् चित्त 'स्वः' आनन्द कन्द मंगल मूल तुम सुख रूप हो।
हम हैं प्रजा सब आपकी, तुम ही हमारे भूप हो।
माता पिता सविता विधाता, 'देव' दिव्य प्रकाश हो।
हम ग्रहण करते हैं 'वरेण्य', भक्त जन की आस हो।
शुभ गुण-सदन विज्ञान सागर, 'भर्ग' प्रिय भुवनेश हो।
हम हैं उपासक आपके, तुम ज्ञान गम्य गणेश हो।
मानस-भवन में आपका हम, ध्यान नित्य धरते रहें।
प्रेरित करो बुद्धि: हमारी, दुरित सब हरते रहें॥
हो भव्य-भावों से भरा भगवान! यह घर आपका।
निशि दिन, सुमंगल गान हो, दर्शन न होवे पाप का।।
स्व- केवलानन्द जी

जिन परिवारों में स्त्रियाँ नित्य नियमित रूप से झाड़ू लगाते समय, आटा छानते तथा गूँथते समय, भोजन बनाते समय तथा पति, पुत्र, पुत्री आदि परिवारजनों को भोजन परोसते समय गायत्री मन्त्र का जाप करती रहती हैं अर्थात् हर समय गायत्री मन्त्र का मानसिक जाप करती हैं तो उनके परिवार में कभी अमंगल नहीं होता परन्तु वह परिवार सदैव धन-धान्य से पूरित होकर सुख और शान्ति के साथ जीवन-यापन करता हुआ यश को प्राप्त होता है।

यदि आपकी इच्छा है कि हमारा बालक विद्या और बुद्धि में अद्वितीय विद्वान हो तो उसके लिये तीन वर्ष तक गायत्री मन्त्र

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वीरेन्द्र गुप्तः

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का जाप ऐसा काम करेगा जैसा 'सोने पर सुहागा'। इसलिये निश्चित समय तथा निश्चित स्थान पर नित्य एक घण्टा गायत्री मन्त्र का जाप तीन वर्ष तक बच्चे से करायें। प्रत्येक आयु के व्यक्ति इस साधना से लाभ उठा सकते हैं।

गर्भवती स्त्री प्रातः सूर्योदय से पूर्व एवं सूर्यास्त के पश्चात् गायत्री मन्त्र का मानसिक जाप करे तो उस गर्भ से उत्पन्न बालक तेजस्वी, चतुर, बुद्धिमान, विद्वान्, यशस्वी तथा दीर्घजीवी होगा।

आलसी, रोगी, चिड़चिड़ें और कुबुद्धि बालकों को माता अपनी गोद में बैठाकर मन ही मन में गायत्री मन्त्र का जाप करें। यदि बालक छोटा हो तो माता अपना दूध बालक को पिलाती रहें और यदि बालक बड़ा हो तो उसके सिर तथा समस्त शरीर पर हाथ फेरती रहें। इस प्रकार गायत्री मन्त्र के जाप से बालक पर आश्चर्य जनक प्रभाव पड़ता है और समस्त व्याधियों से शीघ्र मुक्त होकर बुद्धिमान और चतुर हो जाता है।

। इति ।।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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कुछ पत्र

डा० देव शर्मा वेदालंकार रोहिणी देहली से ८/११/२००३ को लिखते हैं- 'इच्छानुसार सन्तान' मेरी सम्मति में सर्वश्रेष्ठ कृति है। आपने क्यों? कैसे? इस विषय को छुआ। यह तो मिलकर ही जान पायेंगे, परन्तु विद्वानों व आचार्यों की दृष्टि १२८ वर्षों में इधर नहीं पड़ी और न महर्षि दयानन्द के पश्चात् इसकी आवश्यकता ही महसूस की गयी। जिसका दुष्परिणाम हृदय को उद्वेलित कर देता है।


जयपुर से पत्र- मेरे पति आफिसर ग्रेड की सर्वित में हैं, दो मास की ट्रेनिंग के लिये यहाँ पर आये हैं। एक अन्य अधिकारी के यहाँ रात्रि का भोज था। हम सब जाने गये। मेरे पास दो पुत्रियाँ हैं। उनको देखकर उनकी पत्नी ने मेरी पत्नी से कहा- क्या आपके पुत्र नहीं है? मैंने कहा 'हाँ'। उन्होंने अपने पुस्तकालय में से आपकी पुस्तक 'इच्छानुसार-सन्तान' निकाल कर मुझे दी। मैंने घर आकर उसे रात्रि को ही पूरा पढ़ लिया और मन में विचार आया जो इस समय गर्भ है उसकी सफाई कराकर इस विधि से गर्भ धारण करूँ। आगे एक स्थान पर मैंने पुत्र की कामना हेतु 'सूर्यगुण' औषधि के सेवन का सुझाव दिया है, उसे देखकर औषधि। मंगवाने को पत्र लिखा औषधि गई और जन्मू कश्मीर से पुत्र के जन्म की सूचना मिली।


मोरिशस के ट्रायोलेट निवासी श्री विष्णुदत्त देमकाह ना लिखते हैं सोभाग्यवश पुराने आर्य मित्र में पढ़ा 'इच्छानुसार सन्तान' कैसे हो सकती है। २३/३/२००५ को पत्र द्वारा 'इच्छानुसार सन्तान' पुस्तक मंगवाई। १८/४/२००५ को दूसरे पत्र में लिखा वर्षों की

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वीरेन्द्र गुप्तः

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खोज के पश्चात् मुझे 'इच्छानुसार सन्तान' पुस्तक मिली।


श्री महेश्वरपाल आर्य इन्जीनियर मुजफ्फरनगर से ३०/६/२००५ को लिखते हैं- 'इच्छानुसार सन्तान' तथा ईश महिमा' पुस्तकें पढ़ीं, अति उत्तम पुस्तकें हैं। इस विषय पर केवल यही पुस्तकें अभी तक उपलब्ध थीं। मुझे बड़ा अफसोस है कि आपकी लिखी पुस्तकें अब पढ़ने को मिलीं जबकि मैं १९५० से पुस्तकें पढ़ता आ रहा हूँ। अब वेद दर्शन पढ़ना शुरू किया है। पुस्तक अति उपयोगी है।


श्री रघुराज सिंह आर्य मन्त्री आर्य समाज गोण्डा अलीगढ़ उ०प्र० से १३/१०/०५ को पत्र द्वारा लिखते हैं। मैंने आपका अधिकांश साहित्य पढ़ा है तथा दूसरों को भी उपलब्ध कराया है। आपके अनुभव सभी के लिये जीवोपयोगी हैं। आपके द्वारा तैयार 'सूर्यगुणी' औषधि ने कई महिलाओं के निराश जीवन को जीवन्त प्रसन्नता प्रदान की है।


आचार्य काशी प्रसाद गुप्ता जी, उपडाकपाल (डी.पै.एम.) डाकघर नौबस्ता लेखनक २२६००३ ता० २/११/२००५ को पत्र द्वारा लिखते हैं- पुत्र प्राप्ति का साथ पुस्तक पढ़कर मैं लेखक श्री वीरेन्द्र गुप्त: से प्रभावित हुआ, इसलिये उपलब्ध सभी पुस्तकें पढ़ने एवं पढ़ाने हेतु भेजने की कृपा करें।


श्रीमती सुमन कादियानी, पत्नी श्री रघुवीर सिंह कादियानी मकान नं०७ सैक्टर एक रोहतक, हरियाणा से १९/१२/२००५ को पत्र द्वारा लिखते हैं- हम नवम्बर में रोज़ (आर्यवन) गये थे, वहाँ

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वीरेन्द्र गुप्त:

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पर हमें प्रसाद रूप में 'ईश-महिमा' पुस्तक पढ़ने को मिली, इसे पढ़कर रचनाकाल, रचना से पूर्व आदि सभी विषयों के बारे में जाना और सन्तुष्ट हुई। बहुत ही सुन्दर ढंग से समझाया है। 'इच्छानुसार सन्तान' पुस्तक पढ़ना चाहती हूँ। मेरी पुत्री जो लन्दन में रहती है, उसे दो बार गर्भ गिर गया है। उसका समाधान करने की कृपा करें।


सार्जेन्ट एन.एस.दीक्षित एस.एन.क्यू. ६७६/२ (सुपरन्यू) एयरफोर्स स्टेशन जामनगर गुजरात ३६१००३ पत्र द्वारा १/१२/२००६ को लिखते हैं, आपके द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'पुत्र प्राप्ति का साधन' का हमने आद्योपान्त अध्ययन किया है। आपके द्वारा दिशानिर्देशित मार्ग दर्शन को जितनी प्रशंसा की जाय वह कम ही है। सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय को भावना से ओत-प्रोत है। आपने एक देवदूत का कार्य किया है, आपको हमारा कोटि-कोटि प्रणाम स्वीकार हो।


आर्य श्रेष्ठ महात्मा चैतन्य मुनि जी, वैदिक वरिष्ठ आश्रम (महर्षि दयानन्द धाम) ८१एस४ सुन्दर नगर कालोनी जिला मण्डी (हि.प्र.) से पत्र मिला ३/१/२००७ का आप लिखते हैं- मुरादाबाद में आकर आपसे मिलना हमारे लिये विशेष सौभाग्य रहा। आप जिस प्रकार से साहित्य साधना में लगे हुए हैं वह अत्यधिक सहानोय व अनुपम है। मैंने कुछ पुस्तकों को देखा है, आपका चिन्तन मौलिक तथा व्यवहारिकता से परिपूर्ण है।


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वीरेन्द्र गुप्तः

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श्री वीरेन्द्र गुप्तः

संदर्भ जाति के उन्नायक

(गुप्तः, अब तो उजागर हैं, 'गुप्तः' की परिधि सीमा से बाहर)

भूषण कुल के कुल भूषण तुम

तुमने वह दीप जलाया है

जिसके प्रकाश में स्वजाति ने

निर्मल गौरव पाया है।

तुम धन्य हुए हम सुखी हुए

साहित्य तुम्हारा पढ़ करके।

जीवन क्या हो, यह कैसा हो,

यह सब है, अपने हाथों में

परिवार की वृद्धि कैसी हो

विस्तार सहित बतलाया है।

संतान हमारी कैसी हो

वह देव बने या दनुज बने

तन स्वस्थ रहे मन रहे निर्मल

अविरल गंगा की धार बने।

परमार्थी हो शुचि जीवन भी

स्व कर्म रूप दर्शाया है।

सुकुमार हृदय का नमन 'वीर'

स्वीकारो तुम, मैं धन्य बन्ने,

तेरे पथ पर ही चलने को

मन को अपने समझाया है।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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भूषण कुल के मणि भूषण हो
पावन वह दीप जलाया है,
जगमग प्रकाश की आभा में
जाति ने नाम कमाया है।

हे कर्मवीर छाया तेरी
मिलती रहे, भविष्य में भी,
बस यही विनय है ईश्वर से
उर की अभिलाषा हम सबकी।

आशीष तुम्हारा पा करके
खिल उठे हमारा यह जीवन,
हम रहें धर्म निष्ठा में भरत
हो प्रेम-पूर्ण व्यवहारी मन।

— ‘सुकुमार’

दीनदयाल नगर, एम.डी.ए., मुरादाबाद।

ज्योतिष एक विद्या (विज्ञान) है, गणित है।

इसके द्वारा विवाह, व्यापार, सन्तान, रोग आदि के विषय में जाना जा सकता है। यदि आप के पास जन्म-समय, तिथि, स्थान आदि हो तो अपनी समस्याओं के निदान हेतु आप इस पते पर सम्पर्क करें।

विजय कुमार ‘दिव्य’

(ज्योतिर्विद एवं आयुर्वेद रत्न)

ज्योतिष धाम

राजोगली, बर्तन बाजार, मुरादाबाद - २४४००१

दूरभाष - 9412247197, 9897694593

Email : [email protected]

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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स्वस्थ
एवम्
सुसंस्कृत
बच्चे
राष्ट्र की निधि हैं
और
वही
राष्ट्र के निर्माता हैं।

जिनके मुख मण्डल पर आभा, शरीर
में बल, मन में प्रचण्ड इच्छाशक्ति और
अपार उत्साह, बुद्धि में वेद का पाण्डित्य,
जीवन में स्वावलम्बन और हृदय में
ऋषि गाथायें अंकित हों, जिन्हें देखकर
महापुरुषों की स्मृतियाँ झंकृत हो उठें।

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वेद दर्शनमूल्य१००/-
हिन्दी टीका सहित अनुपम ग्रन्थ।
इच्छानुसार सन्तानमूल्य१३०/-
मनचाही पुत्र-पुत्री, धर्मात्मा, जितेन्द्रिय
सन्तान प्राप्त करना।
पुत्र प्राप्ति का साधनमूल्य१०/-
पुत्र प्राप्ति के लिये मार्ग दर्शन।
नीव के पत्थरमूल्य१००/-
कहानियाँ
गर्भावस्था की उपासनामूल्य१/-
गर्भित बालक के संस्कार बनाना।
दस नियममूल्य७/-
आर्य समाज के नियमों की सरल भाषा
में विस्तार से व्यवस्था।
दैनिक पंच महायज्ञमूल्य१०/-
नित्य कर्म विधि
HOW TO BEGET A SONमूल्य२५/-
गायत्री साधनमूल्य१०/-

सूर्य गुणी

पुत्र दाता औषधि

इस प्रभावयुक्त द्विषौषधि का गर्भावस्था के ८१ से ८५ दिन के मध्य में सेवन कराने से पुत्र ही प्राप्त होता है।

वीरेन्द्र नाथ अश्विनी कुमार

प्रकाशन मन्दिर, मण्डी चौक, मुरादाबाद - २४४००१

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A small, bright yellow circular sticker is affixed to the left margin of the page, positioned roughly in the middle vertically.

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A painting of an elderly man with a mustache, wearing a white cap and a light-colored long-sleeved shirt. He is seated at a desk, holding a red pen and writing on a piece of paper. In the upper left corner, there is a portrait of a woman wearing a red turban. The background shows a window with a view of green trees.

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