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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

Hitopadesha (with Hindi Translation)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पुनः कथारम्भकाले राजपुत्रा ऊचुः—‘आर्य ! राजपुत्रा

हितोपदेशः
विग्रहः
पुनः कथारम्भकाले राजपुत्रा ऊचुः—‘आर्य ! राजपुत्रा
वयम् । तद्विग्रहं श्रोतुं नः कुतूहलमस्ति ।’ विष्णुशर्मणोक्तम्—
‘यदेव भवद्भ्यो रोचते कथयामि । विग्रहः श्रूयतां यस्यायमाद्यः
श्लोकः—
फिर कथाके आरंभके समय राजपुत्रोंने कहा—‘गुरुजी ! हम राजकुमार हैं।
इसलिये विग्रह सुननेकी इच्छा है।’ विष्णुशर्माने कहा—‘जो आपको अच्छा लगे
वही कहता हूं । विग्रह सुनिये कि जिसका पहला वाक्य यह है—
हंसैः सह मयूराणां विग्रहे तुल्यविक्रमे ।
विश्वास्य वञ्चिता हंसाः काकैः स्थित्वाऽरिमन्दिरे’ ॥ १ ॥
हंसोंके साथ मोरोंके तुल्य पराक्रमके युद्धमें कौओंने शत्रुके गढ़में रह कर
और विश्वास उपजा कर हंसोंको ठगा’ ॥ १ ॥
राजपुत्रा ऊचुः—‘कथमेतत् ?’ । विष्णुशर्मा कथयति—
राजपुत्र बोले—‘यह कहानी कैसे है ?’ विष्णुशर्मा कहने लगे—
कथा १
[ राजहंस, मोर और उनके मन्त्री आदिकी कहानी १ ]
अस्ति कर्पूरद्वीपे पद्मकेलिनामधेयं सरः । तत्र हिरण्यगर्भो
नाम राजहंसः प्रतिवसति । स च सर्वैर्जलचरपक्षिभिर्मिलित्वा
पक्षिराज्येऽभिषिक्तः ।
कर्पूरद्वीपमें पद्मकेलि नाम एक सरोवर है, वहाँ हिरण्यगर्भ नाम एक राजहंस
रहता था और सब जलचारी पक्षियोंने मिल कर उसे पक्षियोंके राज्य पर राज-
तिलक किया था ।
यतः,—
यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ्नेता ततः प्रजा ।
अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव ॥ २ ॥

१५६ हितोपदेशः [ विग्रहः ३-
क्योंकि—जो संसारमें अच्छा प्रजापालक राजा न हो तो प्रजा, समुद्रमें
कर्णधार (खेवटिये) से रहित नावके समान डूब जाती है ॥ २ ॥
अपरं च,—
प्रजां संरक्षति नृपः सा वर्धयति पार्थिवम् ।
वर्धनाद्रक्षणं श्रेयस्तद्भावे सदप्यसत् ॥ ३ ॥
और दूसरे-राजा प्रजाकी रक्षा करता है और वह (प्रजा) कर आदि दे कर
राजाको बढ़ाती है, बढ़ानेसे रक्षा कल्याणकारी है, और रक्षाके बिना
सचमुच होनाभी नहीं होनेके समान है ॥ ३ ॥
एकदाऽसौ राजहंसः सुविस्तीर्णकमलपर्यङ्के सुखासीनः परि-
वारपरिवृतस्तिष्ठति । ततः कुतश्चिद्देशादागत्य दीर्घमुखो नाम
बकः प्रणम्योपविष्टः । राजोवाच-‘दीर्घमुख ! देशान्तरादागतो-
ऽसि । वार्तां कथय ।’ स ब्रूते—‘देव ! अस्ति महती वार्ता । तां वक्तुं
सत्वरमागतोऽहम् । श्रूयताम्,—अस्ति जम्बुद्वीपे विन्ध्यो नाम
गिरिः । तत्र चित्रवर्णो नाम मयूरः पक्षिराजो निवसति ।
तस्यानुचरैश्चरद्भिः पक्षिभिरहं दग्धारण्यमध्ये चरन्नवलोकितः
पृष्टश्च—‘कस्त्वम् ? कुतः समागतोऽसि ?’ तदा मयोक्तम्—
‘कर्पूरद्वीपस्य राजचक्रवर्तिनो हिरण्यगर्भस्य राजहंसस्यानुचरो-
ऽहम् । कौतुकाद्देशान्तरं द्रष्टुमागतोऽस्मि ।’ एतच्छ्रुत्वा पक्षिभि-
रुक्तम्-‘अनयोर्द्देशयोः को देशो भद्रतरो राजा च ?’ । मयोक्तम्—
‘आः ! किमेवमुच्यते ? महदन्तरम् । यतः कर्पूरद्वीपः स्वर्ग एव,
राजहंसश्च द्वितीयः स्वर्गपतिः । अत्र मरुस्थले पतिता यूयं
किं कुरुथ ? अस्मद्देशे गम्यताम् ।’ ततोऽस्मद्वचनमाकर्ण्य सर्वे
सकोपा बभूवुः ।
एक दिन वह राजहंस सुन्दर बिछे हुए कमलके आसन पर सुखसे बैठा हुआ
था और चारों तरफ उसका परिवार बैठा था । इसके बाद किसी देशसे आकर
दीर्घमुख नाम बगुला प्रणाम करके बैठ गया । राजा बोला-‘हे दीर्घमुख ! तू
कोनसे प्रदेशसे आया है ? समाचार सुना ।’ वह बोला-‘महाराज ! एक बड़ी बात
है । उसके सुनानेके लिये तुरंत मैं आया हूँ । सुनिये-जंबूद्वीपमें विंध्य नाम पहाड़
है । वहाँ चित्रवर्ण नाम मोर-पक्षियोंका राजा रहता है । उसके चुगते हुए

अनुचर पक्षियोंने मुझे दग्ध नाम वनमें चुगते देखा, और पूछा—'तू कौन है ?
कहाँसे आया है ?' तब मैंने कहा—'कर्पूरद्वीपके चक्रवर्ती राजा हिरण्यगर्भ राज-
हंसका मैं अनुचर हूँ । अभिलाषासे नये देश देखनेको आया हूँ ।' यह सुन कर
पक्षियोंने कहा—'इन दोनों देशोंमेंसे कोनसा देश तथा राजा अच्छा है ?' मैंने
कहा—'अजी ! क्यों ऐसे कहते हो ? इन दोनोंमें बड़ा अन्तर है, क्योंकि कर्पूरद्वीप
मानों स्वर्गही है, और राजहंस मानों दूसरा इन्द्र है । इस मारवाड़ देशमें पड़े
हुए तुम क्या करते हो ? हमारे देशमें चलो ।' तब मेरी बात सुन कर सब
क्रोधित हो गये ।
तथा चोक्तम्,—
पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्धनम् ।
उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये ॥ ४ ॥
जैसा कहा है कि—सांपोंको दूध पिलाना केवल जहरको बढानां है, मूर्खोंको
उपदेश करना भी क्रोध बढानेके लिये है, शान्तिके लिये नहीं; अर्थात् सांपको
दूध पिलाना जैसा विषको बढाने वाला है वैसाही मूर्खको किया हुआ उपदेश
क्रोधको बढाने वाला है; शांति करने वाला नहीं ॥ ४ ॥
अन्यच्च,—
विद्वानेवोपदेष्टव्यो नाविद्वांस्तु कदाचन ।
वानरानुपदिश्याथ स्थानभ्रष्टा ययुः खगाः' ॥ ५ ॥
और दूसरे–बुद्धिमान्‌कोही उपदेश करना चाहिये, मूर्खको कभी न करे,
जैसे पक्षी बन्दरोंको उपदेश करनेसे स्थान छोड़ कर चले गये' ॥ ५ ॥
राजोवाच—'कथमेतत् ?'। दीर्घमुखः कथयति—
राजा बोला—'यह कथा कैसे है?' दीर्घमुख कहने लगा—
कथा २
[ पक्षी और बंदरोंकी कहानी २ ]
'अस्ति नर्मदातीरे विशालः शाल्मलीतरुः । तत्र निर्मितनीड-
क्रोडे पक्षिणो निवसन्ति सुखेन । अथैकदा वर्षासु नीलपटलैरा-
वृते नभस्तले धारासारैर्महती वृष्टिर्बभूव । ततो वानरांश्च
तरुतलेऽवस्थिताञ्शीताकुलान् कम्पमानानवलोक्य कृपया
पक्षिभिरुक्तम्—'भो भो वानराः ! शृणुत,—

'नर्मदाके तीर पर एक बड़ा सेमरका वृक्ष है । उस पर पक्षी घोंसला बना कर
उसके भीतर, सुखसे रहा करते थे । फिर एक दिने बरसातमें नीले नीले बादलों
से आकाशमंडलके छा जाने पर बड़ी बड़ी बूँदोंसे मूसलधार मेघ बरसने लगा
और फिर वृक्षके नीचे बैठे हुए बन्दरोंको ठंडीके मारे थर थर काँपते हुए देख
कर पक्षियोंने दयासे विचार कहा—'अरे भाई बन्दरो ! सुनो,—

अस्माभिर्निर्मिता नीडाश्चञ्चुमात्राहृतैस्तृणैः ।
हस्तपादादिसंयुक्ता यूयं किमिति सीदथ ?' ॥ ६ ॥

हमने केवल अपनी चोंचोंसे इकट्ठे किये हुए तिनकोंसे घोंसले बनाये हैं, और
तुम तो हाथ, पाँव आदिसे युक्त हो कर फिर ऐसा दुःख क्यों भोगते हो ?' ॥

तच्छ्रुत्वा वानरैर्जातामर्षैरालोचितम्—'अहो ! निर्वातनीड-
गर्भावस्थिताः सुखिनः पक्षिणोऽस्मान्निन्दन्ति । भवतु तावद्वृष्टे-
रुपशमः ।' अनन्तरं शान्ते पानीयवर्षे तैर्वानरैर्वृक्षमारुह्य सर्वे
नीडा भग्नास्तेषामण्डानि चाधः पातितानि । अतोऽहं ब्रवीमि—
“विद्वानेवोपदेष्टव्यः” इत्यादि ।' राजोवाच-‘ततस्तैः किं कृतम् ?'
बकः कथयति—‘ततस्तैः पक्षिभिः कोपादुक्तम्—‘केनासौ राज-
हंसो राजा कृतः?' । ततो मयोपजातकोपेनोक्तम्—‘युष्मदीय-
मयूरः केन राजा कृतः ?' एतच्छ्रुत्वा ते सर्वे मां हन्तुमुद्यताः ।
ततो मयापि स्वविक्रमो दर्शितः ।

यह सुन बन्दरोंने झुँझला कर विचारा—‘अरे ! पवनरहित घोंसलोंके भीतर
बैठे हुए सुखी पक्षी हमारी निन्दा करते हैं, करने दो । जब तक वर्षा बंद हो
बाद जब पानीका बरसना बंद हो गया तब उन बन्दरोंने पेड़ पर चढ़ कर सब
घोंसले तोड़ डाले, और उन्होंने अंडे नीचे गिरा दिये, इसलिये मैं कहता हूँ-
“बुद्धिमान्‌कोही उपदेश करना चाहिये” इत्यादि ।' राजा बोला-‘तब उन्होंने क्या
किया ?' बगुला कहने लगा-फिर उन पक्षियोंने क्रोधसे कहा-‘किसने इस राज-
हंसको राजा बनाया है?' तब मैंने झुँझला कर कहा-‘तुम्हारे मोरको किसने
राजा बनाया है?' यह सुन कर वे सब मुझे मारनेको तयार हुए । तब मैंनेभी
अपना पराक्रम दिखाया ।

-९ ] पराक्रम और तारतम्यज्ञानकी प्रशंसा १५९
यतः,—
'अन्यदा भूषणं पुंसां क्षमा लज्जेव योषिताम् ।
पराक्रमः परिभवे वैयात्यं सुरतेष्विव' ॥ ७ ॥
क्योंकि-रतिकालको छोड़ कर स्त्रियोंको लज्जा जैसा अलंकार है वैसाही
पराजयसे भिन्न समयमें पुरुष को क्षमा आभूषण है, और पराजयके समय,
रतिकालमें स्त्रियोंको निर्लज्जताके समान, पराक्रमही प्रशंसाके योग्य है' ॥ ७ ॥
राजा विहस्याह—
'आत्मनश्च परेषां च यः समीक्ष्य बलाबलम् ।
अन्तरं नैव जानाति स तिरस्क्रियतेऽरिभिः ॥ ८ ॥
राजा हँस कर बोला—'जो अपनी और शत्रुओंकी निर्बलता और सबलता
विचार कर, अंतर नहीं जानता है उसका शत्रु तिरस्कार ( पराजय ) करते हैं;
अर्थात् अपना और शत्रूका बलाबल जानना विद्वानको अत्यावश्यक है ॥ ८ ॥
अन्यच्च,—
सुचिरं हि चरन्नित्यं क्षेत्रे सस्यमबुद्धिमान् ।
द्वीपिचर्मपरिच्छन्नो वाग्दोषाद्गर्दभो हतः' ॥ ९ ॥
और दूसरे—जैसे अनाजके खेतमें बहुत दिन तक नित्य नाज चरता हुआ
मूर्ख गधा बाघम्बर ओढ़े हुए वाणीके दोषसे अर्थात् रेंकनेसे मारा गया' ॥ ९ ॥
बकः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । राजा कथयति —
बगुला पूछने लगा—'यह कथा कैसे है ?' राजा कहने लगा।—
कथा ३
[ बाघंबर ओढा हुआ धोबीका गधा और
खेतवालेकी कहानी ३ ]
'अस्ति हस्तिनापुरे विलासो नाम रजकः । तस्य गर्दभो-
ऽतिवाहनाद्दुर्बलो मुमूर्षुरिवाभवत् । ततस्तेन रजकेनासौ
व्याघ्रचर्मणा प्रच्छाद्यारण्यसमीपे सस्यक्षेत्रे नियुक्तः । ततो
दूरात्तमवलोक्य व्याघ्रबुद्ध्या क्षेत्रपतयः सत्वरं पलायन्ते ।
अथैकदा केनापि सस्यरक्षकेण धूसरकम्बलकृततनुत्राणेन धनुः-

[page-header]
१६० हितोपदेशः [ विग्रहः ९-
[/page-header]

काण्डं सज्जीकृत्यानतकायेनैकान्ते स्थितम् । तं च दूराद्दृष्ट्वा
गर्दभः पुष्टाङ्गो यथेष्टसस्यभक्षणजातबलो गर्दभोऽयमिति मत्वोच्चैः
शब्दं कुर्वाणस्तदभिमुखं धावितः । सस्यरक्षकेण चीत्कारशब्दा-
न्निश्चित्य गर्दभोऽयमिति लीलयैव व्यापादितः । अतोऽहं
ब्रवीमि—"सुचिरं हि चरन्नित्यम्" इत्यादि' ॥ दीर्घमुखो ब्रूते—
ततः पक्षिभिरुक्तम्—'अरे पाप दुष्ट बक ! अस्माकं भूमौ
चरन्नस्माकं स्वामिनमधिक्षिपसि ? तन्न क्षन्तव्यमिदानीम्'
इत्युक्त्वा सर्वे मां चक्षुभिर्हत्वा सकोपा ऊचुः—'पश्य रे
मूर्ख ! स हंसस्तव राजा सर्वथा मृदुः। तस्य राज्याधिकारो
नास्ति । यत एकान्तमृदुः करतलस्थमप्यर्थं रक्षितुमक्षमः स कथं
पृथिवीं शास्ति ? राज्यं वा तस्य किम् ? किंतु त्वं च कूपमण्डूकः ।
तेन तदाश्रयमुपदिशसि ।

‘हस्तिनापुरमें एक विलास नाम धोबी रहता था । उसका गधा अधिक
बोझ ढौनेसे दुबला मरासू-सा हो गया था । फिर उस धोबीने इसे बाघकी खाल
ओढ़ा कर वनके पास नाजके खेतमें रख दिया । फिर दूरसे उसे देख कर और
बाघ समझ, खेत वाले शीघ्र भाग जाते थे । इसके अनन्तर एक दिन कोई
खेतका रखवाला धूसर रंगका कंबल ओढ़े हुए धनुष बाण चढ़ा कर शरीरको
नौढ़ा कर एकांतमें बैठ गया । उधर मन माना अन्न चरनेसे बलवान्, तथा
संड़याया हुआ गधा उसे देख कर और गधा जान कर ढेंचू ढेंचू खरसे रेंकता
हुआ उसके सामने दौड़ा । तब खेतवालेने, रेंकनेके शब्दसे इसको गधा निश्चय
करके सहजमेंही मार डाला। इसलिये मैं कहता हूँ-“बहुत काल तक चरता हुआ”
इत्यादि । दीर्घमुख बोला-फिर पक्षियोंने कहा-‘अरे पापी दुष्ट बगुले ! तू हमारी
भूमिमें चुग कर हमारेही स्वामीकी निन्दा करता है ? इसलिये अब क्षमा करनेके
योग्य नहीं है ।' यह कह कर सब मुझे चोंचोंसे मार कर क्रोधसे बोले-‘अरे मूर्ख !
देख, वह हंस तेरा राजा सब प्रकारसे भोला है, उसको राज्यका अधिकार
नहीं है । क्योंकि निरा भोला हथेली पर धरे हुए धनकीभी रक्षा नहीं कर सकता
है । वह कैसे पृथ्वीका राज्य करता है ? अथवा उसका राज्यही क्या है ? वरन
तूभी कुएका मैंडक है । इसलिये उसके आश्रयका उपदेश करता है ।