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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 302 में से

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पृष्ठ 179

-९ ] पराक्रम और तारतम्यज्ञानकी प्रशंसा १५९
यतः,—
'अन्यदा भूषणं पुंसां क्षमा लज्जेव योषिताम् ।
पराक्रमः परिभवे वैयात्यं सुरतेष्विव' ॥ ७ ॥
क्योंकि-रतिकालको छोड़ कर स्त्रियोंको लज्जा जैसा अलंकार है वैसाही
पराजयसे भिन्न समयमें पुरुष को क्षमा आभूषण है, और पराजयके समय,
रतिकालमें स्त्रियोंको निर्लज्जताके समान, पराक्रमही प्रशंसाके योग्य है' ॥ ७ ॥
राजा विहस्याह—
'आत्मनश्च परेषां च यः समीक्ष्य बलाबलम् ।
अन्तरं नैव जानाति स तिरस्क्रियतेऽरिभिः ॥ ८ ॥
राजा हँस कर बोला—'जो अपनी और शत्रुओंकी निर्बलता और सबलता
विचार कर, अंतर नहीं जानता है उसका शत्रु तिरस्कार ( पराजय ) करते हैं;
अर्थात् अपना और शत्रूका बलाबल जानना विद्वानको अत्यावश्यक है ॥ ८ ॥
अन्यच्च,—
सुचिरं हि चरन्नित्यं क्षेत्रे सस्यमबुद्धिमान् ।
द्वीपिचर्मपरिच्छन्नो वाग्दोषाद्गर्दभो हतः' ॥ ९ ॥
और दूसरे—जैसे अनाजके खेतमें बहुत दिन तक नित्य नाज चरता हुआ
मूर्ख गधा बाघम्बर ओढ़े हुए वाणीके दोषसे अर्थात् रेंकनेसे मारा गया' ॥ ९ ॥
बकः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । राजा कथयति —
बगुला पूछने लगा—'यह कथा कैसे है ?' राजा कहने लगा।—
कथा ३
[ बाघंबर ओढा हुआ धोबीका गधा और
खेतवालेकी कहानी ३ ]
'अस्ति हस्तिनापुरे विलासो नाम रजकः । तस्य गर्दभो-
ऽतिवाहनाद्दुर्बलो मुमूर्षुरिवाभवत् । ततस्तेन रजकेनासौ
व्याघ्रचर्मणा प्रच्छाद्यारण्यसमीपे सस्यक्षेत्रे नियुक्तः । ततो
दूरात्तमवलोक्य व्याघ्रबुद्ध्या क्षेत्रपतयः सत्वरं पलायन्ते ।
अथैकदा केनापि सस्यरक्षकेण धूसरकम्बलकृततनुत्राणेन धनुः-