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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 302 में से

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पृष्ठ 175

हितोपदेशः
विग्रहः
पुनः कथारम्भकाले राजपुत्रा ऊचुः—‘आर्य ! राजपुत्रा
वयम् । तद्विग्रहं श्रोतुं नः कुतूहलमस्ति ।’ विष्णुशर्मणोक्तम्—
‘यदेव भवद्भ्यो रोचते कथयामि । विग्रहः श्रूयतां यस्यायमाद्यः
श्लोकः—
फिर कथाके आरंभके समय राजपुत्रोंने कहा—‘गुरुजी ! हम राजकुमार हैं।
इसलिये विग्रह सुननेकी इच्छा है।’ विष्णुशर्माने कहा—‘जो आपको अच्छा लगे
वही कहता हूं । विग्रह सुनिये कि जिसका पहला वाक्य यह है—
हंसैः सह मयूराणां विग्रहे तुल्यविक्रमे ।
विश्वास्य वञ्चिता हंसाः काकैः स्थित्वाऽरिमन्दिरे’ ॥ १ ॥
हंसोंके साथ मोरोंके तुल्य पराक्रमके युद्धमें कौओंने शत्रुके गढ़में रह कर
और विश्वास उपजा कर हंसोंको ठगा’ ॥ १ ॥
राजपुत्रा ऊचुः—‘कथमेतत् ?’ । विष्णुशर्मा कथयति—
राजपुत्र बोले—‘यह कहानी कैसे है ?’ विष्णुशर्मा कहने लगे—
कथा १
[ राजहंस, मोर और उनके मन्त्री आदिकी कहानी १ ]
अस्ति कर्पूरद्वीपे पद्मकेलिनामधेयं सरः । तत्र हिरण्यगर्भो
नाम राजहंसः प्रतिवसति । स च सर्वैर्जलचरपक्षिभिर्मिलित्वा
पक्षिराज्येऽभिषिक्तः ।
कर्पूरद्वीपमें पद्मकेलि नाम एक सरोवर है, वहाँ हिरण्यगर्भ नाम एक राजहंस
रहता था और सब जलचारी पक्षियोंने मिल कर उसे पक्षियोंके राज्य पर राज-
तिलक किया था ।
यतः,—
यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ्नेता ततः प्रजा ।
अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव ॥ २ ॥