धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
२०. मग्गवग्गो (मार्ग वर्ग)
१४४ ] धम्मपदं [ २३।९
अनुवाद—यह (मेरा) चित्त पहिले यथेच्छ=यथाकाम, जैसे सुख
मालूम हुआ वैसे विचरनेवाला था; सो आज महावत जैसे
मत्तवाले हाथीको (पकड़ता है, वैसे) मैं उसे जड़से
पकड़ूँगा।
जेतवन कोसलराजका पावेय्यक नामक हाथी
३२७-अप्पमादरता होथ स-चित्तमनुरक्खथ ।
दुग्गा उद्धरथ'त्तानं पङ्के सत्तो'व कुञ्जरो ॥८॥
(अप्रमादरता भवत स्वचित्तमनुरक्षत ।
दुर्गादुद्धरताऽऽत्मानं पंके सक्त इव कुंजरः ॥८॥)
अनुवाद—अप्रमाद (=सावधानता) में रत होओ, अपने मनकी रक्षा
करो, पंकमें फँसे हाथीकी तरह (राग आदिमें फँसे) अपने
को ऊपर निकालो।
पारिलेय्यक बहुतसे भिक्षु
३२८-सचे लभेथ निपकं सहायं
सद्धिं चरं साधुविहारिधीरं ।
अभिभुय्य सव्वानि परिस्सयानि
चरेय्य तेन'त्तमनो सतीमा ॥६॥
(स चेत् लभेत निपकं सहायं
सार्द्धं चरन्तं साधुविहारिणं धीरम्।
अभिभूय सर्वान् परिश्रयान्
चरेत् तेनाऽऽत्तमनाः स्मृतिमान् ॥९॥)
२३।११ ] नागवग्गो [ १४५
अनुवाद—यदि परिपक्व (– बुद्धि ) बुद्धिमान् साथमें विहरनेवाला
(= शिष्य ) सहचर मित्र मिले, तो सभी परिश्रयों
(= विघ्नों) को हटाकर सचेत प्रसन्नचित्त हो उसके साथ
विहार करे ।
३२९-नो चे लभेथ निपकं सहायं
सद्धिं चरं साधुविहारिधीरं ।
राजा 'व रट्ठं विजितं पहाय
एको चरे मातङ्ग रञ्जेव नागो ॥१०॥
( न चेत् लभेत निपकं सहायं
सार्द्ध चरन्तं साधुविहारिणं धीरम् ।
राजेव राष्ट्रं विजितं प्रहाय,
एकश्चरेत् मातंगोऽरण्य इव नागः ॥१०॥ )
अनुवाद—यदि परिपक्व, बुद्धिमान् साथमें विहरनेवाला सहचर
मित्र न मिले, तो राजाकी भाँति पराजित राष्ट्रको छोड़
गजराज हाथीकी तरह अकेला विचरे ।
३३०-एकस्स चरितं सेय्यो नत्थि बाले सहायता ।
एको चरे न च पापानि कयिरा
अप्पोस्सुको मातङ्ग 'रञ्जे'व नागो ॥११॥
( एकस्य चरितं श्रेयो नाऽस्ति बाले सहायता ।
एकश्चरेत् न च पापानि कुर्याद्
अल्पोत्सुको मातंगोऽरण्य इव नागः ॥११॥ )
१०
१४६ ] धम्मपद [ २३।१३
अनुवाद—अकेला विचरना उत्तम है, (किन्तु) मूढ़की मित्रता
अच्छी नहीं, मातंगराज हाथीकी भांति अनासक्त हो अकेला
विचरे और पाप न करे।
हिमवत्-प्रदेश मार
३३१-अत्थम्हि जातम्हि सुखा सहाया
तुट्ठी सुखा या इतरीतरेन ।
पुञ्ञं सुखं जीवितसंङ्खयम्हि
सब्बस्स दुक्खस्स सुखं पहाणं ॥१२॥
(अर्थे जाते सुखाः सहायाः, तुष्टिः सुखा येतरेतरेण।
पुण्यं सुखं जीवितसंक्षये
सर्वस्य दुःखस्य सुखं प्रहाणम् ॥ १२॥)
अनुवाद—काम पड़नेपर मित्र सुखद (लगते हैं), परस्पर सन्तोष
हो (यह भी) सुखद (वस्तु) है, जीवनके क्षय होने
पर (किया हुआ) पुण्य सुखद (होता है); सारे
दुःखोंका विनाश (=अर्हत् होना) (यह सबसे अधिक)
सुखद है।
३३२-सुखा मत्तेय्यता लोके अथो पेत्तेय्यता सुखा ।
सुखा सामञ्ञता लोके अथो ब्रह्मञ्ञता सुखा ॥१३॥
(सुखा मात्रीयता लोकेऽथ पित्रोयता सुखा।
सुखा श्रमणता लोकेऽथ ब्राह्मणता सुखा ॥ १३॥)
अनुवाद—लोकमें माताकी सेवा सुखकर है, और पिताकी सेवा
२३।१४ ] नागवग्गो [ १४७
(भी) सुखकर है, श्रमणभाव (=संन्यास) लोकमें
सुखकर है, और ब्राह्मणपन (=निष्पाप होना) सुखकर है।
३३३-सुखं याव जरा सीलं सुखा सद्धा पतिट्ठिता ।
सुखो पञ्ञाय पटिलाभो पापानं अकरणं सुखं ॥१४॥
(सुखं यावद् जरां शीलं सुखा श्रद्धा प्रतिष्ठिता ।
सुखः प्रज्ञायाः प्रतिलाभः पापानां अकरणं सुखम् ॥१४॥)
अनुवाद—बुढ़ापेनक आचारका पालन करना सुखकर है, और स्थिर
श्रद्धा (सत्यमें विश्वास) सुखकर है, प्रज्ञाका लाभ सुख-
कर है, और पापोंका न करना सुखकर है।
२३-नागवर्ग समाप्त
२४ तण्हावग्गो
जेतवन कपिलमच्छ
३३४-मनुजस्स पमत्तचारिनो तण्हा वड्ढति मालुवा विय ।
सो पलवती हुराहुं फलमिच्छं 'व वनस्मिं वानरो ॥१॥
( मनुजस्य प्रमत्तचारिणः तृष्णा वर्द्धते मालुवेव ।
स प्लवतेऽहरहः फलमिच्छन् इव वने वानरः ॥ १ ॥ )
अनुवाद—प्रमत्त होकर आचरण करनेवाले मनुष्यकी तृष्णा मालुवा
(लता) की भाँति बढ़ती है, वनमें 'वानरकी भाँति
फलकी इच्छा करते दिनोंदिन वह भटकता रहता है।
३३५-यं एसा सहती जम्मी तण्हा लोके विसत्तिका ।
सोका तस्स पवड्ढन्ति अभिवड्डं 'व वीरणं ॥२॥
( यं एषा साहयति जन्मिनी तृष्णा लोके विषात्मिका ।
शोकास्तस्य प्रवर्द्धन्तेऽभिवर्द्धमानं इव वीरणम् ॥ २ ॥ )
अनुवाद—यह ( बराबर ) जनमते रहनेवाली विषरूपी तृष्णा
जिसको पकड़ती है, वर्द्धनशील वीरण ( =चटाई बनानेका
एक तृण ) की भाँति उसके शोक बढ़ते हैं।
१४८ ]
२४५ ] तण्हावग्गो [ १४९
३३६-यो चेतं सहती जम्मिं तण्हं लोके दुरच्चयं ।
सोका तम्हा पपतन्ति उदबिन्दू 'व पोक्खरा ॥३॥
(यश्चैतां साहयति जम्मिनीं तृष्णां लोके दुरत्ययाम् ।
शोकाः तस्मात् प्रपतन्त्युदबिन्दुरिव पुष्करात् ॥ ३ ॥)
अनुवाद—इस परापर जनमते रहनेवाली, दुस्त्याज्य तृष्णाको जो
लोकमें परास्त करता है, उससे शोक (वैसेही) गिर जाते
हैं, जैसे कमल(-पत्र) से जलका विन्दु ।
३३७-तं वो वदामि भद्दं वो यावन्तेत्थ समागता ।
तण्हाय मूलं खणथ उसीरत्थो 'व वीरगं ॥४॥
(तद् वो वदामि भद्रं वो यावन्त इह समागताः ।
तृष्णाया मूलं खनतोशीरार्थीव वीरगम् ॥ ४ ॥)
अनुवाद—इसलिये तुम्हें कहता हूँ, जितने यहाँ आये हो, तुम्हारा
सबका मंगल हो, जैसे खसके लिये लोग उसीरको खोदते हैं,
वैसे ही तुम तृष्णाकी जड़को खोदो।
जेतवन गूथ-सूकर-पोतिक
३३८-यथापि मूले अनुपद्दवे दळ्हे
छिन्नोपि रुक्खो पुनरेव रूहति ।
एवम्पि तण्हानुसये अनूहते
निब्बत्तति दुक्खमिदं पुनप्पुनं ॥५॥
(यथाऽपि मूलेऽनुपद्रवे दृढे छिन्नोऽपि वृक्षः पुनरेव रोहति ।
एवमपि तृष्णाऽनुशयेऽनिहते निर्वर्तते दुःखमिदं पुनः पुनर्भावा)
१५० ] धम्मपदं [ २७।७
अनुवाद—जैसे जड़के दृढ़ और न कटी होनेपर कटा हुआ भी वृक्ष
फिर उग आता है, एसी प्रकार तृष्णारूपी अनुशय
(=मूल) के न नष्ट होनेपर, यह दुःख फिर फिर पैदा
होता है।
३३६—यस्स छत्तिंसती सोता मनापासवना भुसा ।
वाहा वहन्ति दुद्दिट्ठिं सङ्कप्पा रागनिस्सिता ॥६॥
(यस्य षट्त्रिंशत् स्रोतांसि मनापश्रवणानि भृयासुः ।
वाहा वहन्ति दुर्द्दृष्टिं संकल्पा रागनिःसृताः ॥६॥)
अनुवाद—जिसके, छत्तीस स्रोत' मनको अच्छी लगनेवाली (चीजों)
को ही लानेवाले हों, (उसके लिए) रागश्रित सङ्कल्प रूपी
वाहन बुरी धारणाओंको वहन करते हैं ।
३४०—सवन्ति सव्वधि सोता लता उब्भिज्ज तिट्ठति ।
तञ्च दिस्वा लतं जातं मूलं पञ्ञाय छिन्दथ ॥७॥
(स्रवन्ति सर्वतः स्रोतांसि लता उद्भिद्य तिष्ठति ।
तां च दृष्ट्वा लतां जातां, मूलं प्रज्ञया छिन्दत ॥७॥)
अनुवाद—(यह) स्रोत चारों ओर बहते हैं, (जिसके कारण)
(तृष्णा रूपी) लता अंकुरित होती है, उस
२४।१० ] तण्हावग्गो [ १५१
उत्पन्न हुई लताको जानकर, प्रज्ञासे ( उसकी ) जड़को
काटो ।
३४१-सरितानि सिनेहितानि च सोमनस्सानि भवन्ति जन्तुनो ।
ते सोतसिता सुखेसिनो ते वे जाति-जरूपगा नरा ॥८॥
( सरितः स्निग्धाश्च सौमनस्या भवन्ति जन्तोः ।
ते स्रोतःसृताः सुखैषिणस्ते वै जातिजरोपगा नराः ॥८॥ )
अनुवाद—( यह ) ( तृष्णा रूपी ) नदियाँ स्निग्ध और प्राणियोंके
चित्तको खुश रखनेवाली होती हैं; ( जिनके कारण ) नर
स्रोतमें बँधे, सुखकी खोज करते, जन्म और जराके फेरमें
पड़ते हैं ।
३४२-तसिणाय पुरक्खता पजा परिसप्पन्ति ससो 'व बाधितो ।
संयोजनसङ्ग सत्तका दुक्खमुपेन्ति पुनप्पुनं चिराय ॥६॥
( तृष्णया पुरस्कृताः प्रजाः परिसर्पन्ति शश इव बद्धः ।
संयोजनसंगसक्तका दुःखमुपयन्ति पुनः पुनः चिराय ॥९॥)
अनुवाद—तृष्णाके पीछे पड़े प्राणी, बंधे खरगोशकी भाँति चक्कर
काटते हैं; संयोजनों (=मनके बंधनो ) में फँसे ( जन )
पुनः पुनः चिरकाल तक दुःखको पाते हैं ।
३४३-तसिणाय पुरक्खता पजा परिसप्पन्ति ससो'व बाधितो ।
तस्मा तसिनं विनोद्ये भिक्खू अकङ्क्षी विरागमत्तनो ॥ १०॥
( तृष्णया पुरस्कृताः प्रजाः
परिसर्पन्ति शश इव बद्धः ।