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धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)

Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा

DevanagariHindipublished213 पृष्ठ

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२४।१० ] तण्हावग्गो [ १५१
उत्पन्न हुई लताको जानकर, प्रज्ञासे ( उसकी ) जड़को
काटो ।
३४१-सरितानि सिनेहितानि च सोमनस्सानि भवन्ति जन्तुनो ।
ते सोतसिता सुखेसिनो ते वे जाति-जरूपगा नरा ॥८॥
( सरितः स्निग्धाश्च सौमनस्या भवन्ति जन्तोः ।
ते स्रोतःसृताः सुखैषिणस्ते वै जातिजरोपगा नराः ॥८॥ )
अनुवाद—( यह ) ( तृष्णा रूपी ) नदियाँ स्निग्ध और प्राणियोंके
चित्तको खुश रखनेवाली होती हैं; ( जिनके कारण ) नर
स्रोतमें बँधे, सुखकी खोज करते, जन्म और जराके फेरमें
पड़ते हैं ।
३४२-तसिणाय पुरक्खता पजा परिसप्पन्ति ससो 'व बाधितो ।
संयोजनसङ्ग सत्तका दुक्खमुपेन्ति पुनप्पुनं चिराय ॥६॥
( तृष्णया पुरस्कृताः प्रजाः परिसर्पन्ति शश इव बद्धः ।
संयोजनसंगसक्तका दुःखमुपयन्ति पुनः पुनः चिराय ॥९॥)
अनुवाद—तृष्णाके पीछे पड़े प्राणी, बंधे खरगोशकी भाँति चक्कर
काटते हैं; संयोजनों (=मनके बंधनो ) में फँसे ( जन )
पुनः पुनः चिरकाल तक दुःखको पाते हैं ।
३४३-तसिणाय पुरक्खता पजा परिसप्पन्ति ससो'व बाधितो ।
तस्मा तसिनं विनोद्ये भिक्खू अकङ्क्षी विरागमत्तनो ॥ १०॥
( तृष्णया पुरस्कृताः प्रजाः
परिसर्पन्ति शश इव बद्धः ।