धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० ] धम्मपदं [ २७।७
अनुवाद—जैसे जड़के दृढ़ और न कटी होनेपर कटा हुआ भी वृक्ष
फिर उग आता है, एसी प्रकार तृष्णारूपी अनुशय
(=मूल) के न नष्ट होनेपर, यह दुःख फिर फिर पैदा
होता है।
३३६—यस्स छत्तिंसती सोता मनापासवना भुसा ।
वाहा वहन्ति दुद्दिट्ठिं सङ्कप्पा रागनिस्सिता ॥६॥
(यस्य षट्त्रिंशत् स्रोतांसि मनापश्रवणानि भृयासुः ।
वाहा वहन्ति दुर्द्दृष्टिं संकल्पा रागनिःसृताः ॥६॥)
अनुवाद—जिसके, छत्तीस स्रोत' मनको अच्छी लगनेवाली (चीजों)
को ही लानेवाले हों, (उसके लिए) रागश्रित सङ्कल्प रूपी
वाहन बुरी धारणाओंको वहन करते हैं ।
३४०—सवन्ति सव्वधि सोता लता उब्भिज्ज तिट्ठति ।
तञ्च दिस्वा लतं जातं मूलं पञ्ञाय छिन्दथ ॥७॥
(स्रवन्ति सर्वतः स्रोतांसि लता उद्भिद्य तिष्ठति ।
तां च दृष्ट्वा लतां जातां, मूलं प्रज्ञया छिन्दत ॥७॥)
अनुवाद—(यह) स्रोत चारों ओर बहते हैं, (जिसके कारण)
(तृष्णा रूपी) लता अंकुरित होती है, उस