Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages
Page 77Permalink

जाननेके लिये कहा है। वह एकदेशीय वर्णन होनेके कारण जीवपरक हो
सकता है। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त प्रकरणमें 'दहर' नामसे
कहा हुआ तत्त्व क्या है ? इसपर कहते हैं—
दहर उत्तरेभ्यः ॥ १ । ३ । १४ ॥
दहरः=उक्त प्रकरणमे 'दहर' शब्दसे जिस ज्ञेय तत्त्वका वर्णन किया गया
है, वह ब्रह्म ही है; उत्तरेभ्यः=क्योकि उसके पश्चात् आये हुए वचनोसे यही
सिद्ध होता है।
व्याख्या—छान्दोग्य ( ८ । १ । १ ) मे कहा है कि 'अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्म-
पुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्
वाव विजिज्ञासितव्यम् ।' अर्थात् 'इस ब्रह्मके नगररूप मनुष्य-शरीरमे कमलके
आकारवाला एक घर ( हृदय ) है, उसमे सूक्ष्म आकाश है। उसके भीतर
जो वस्तु है, उसको जाननेकी इच्छा करनी चाहिये।' इस वर्णनमे जिसे ज्ञातव्य बताया
गया है, वह 'दहर' शब्दका लक्ष्य परब्रह्म परमेश्वर ही है; क्योकि आगेके वर्णनमे इसीके
भीतर समस्त ब्रह्माण्डको निहित बताया है तथा उसके विषयमे यह भी कहा है
कि 'यह आत्मा, सब पापोसे रहित, जरामरणवर्जित, शोकशून्य, भूख-प्याससे
रहित, सत्यकाम तथा सत्यसंकल्प है। इत्यादि ( ८ । १ । ५ ) । तदनन्तर
आगे चलकर ( छा० उ० ८ । ३ । ४ मे ) कहा है कि 'यही आत्मा, अमृत,
अभय और ब्रह्म है । इसीका नाम सत्य है।' इससे यही सिद्ध होता है कि
यहाँ 'दहर' शब्द परब्रह्मका ही बोधक है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं—
गतिशब्दाभ्यां तथा दृष्टं लिङ्गं च ॥ १ । ३ । १५ ॥
गतिशब्दाभ्याम्=ब्रह्ममे गतिका वर्णन और ब्रह्मवाचक शब्द होनेसे;
तथा दृष्टम्=एवं दूसरी श्रुतियोमे ऐसा ही वर्णन देखा गया है; च=और;
लिङ्गम्=इस वर्णनमे आये हुए लक्षण भी ब्रह्मके हैं; इसलिये यहाँ 'दहर' नामसे
ब्रह्मका ही वर्णन हुआ है।
व्याख्या—इस प्रसङ्गमे यह बात कही गयी है कि—'इमाः सर्वाः प्रजा
अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥ ( छा० उ० ८।

सूत्र १४-१६ ] अध्याय १ ५७

Page 78Permalink

सूत्र १४-१६ ] अध्याय १ ५७
३ । २) अर्थात् 'ये जीव-समुदाय प्रतिदिन सुषुप्तिकालमे इस ब्रह्मलोकको जाते हैं,
परन्तु असत्यसे आवृत रहनेके कारण उसे जानते नहीं हैं।' इस वाक्यमें
प्रतिदिन ब्रह्मलोकमे जानेके लिये कहना, तो गतिका वर्णन है और उस 'दहर'को
ब्रह्मलोक कहना उसका वाचक शब्द है । इन दोनो कारणोसे यह सिद्ध
होता है कि यहाँ 'दहर' शब्द ब्रह्मका ही बोधक है ।
इसके सिवा दूसरी जगह (६ । ८ । १ मे) भी ऐसा ही वर्णन
पाया जाता है--यथा--'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति ।' अर्थात्
'हे सोम्य ! उस सुषुप्त-अवस्थामें जीव 'सत्' नामसे कहे जानेवाले
परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होता है।' इत्यादि । तथा आगे बताये गये
अमृत, अभय आदि लक्षण भी ब्रह्ममे ही सुसंगत होते हैं । इन दोनो
कारणोंसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'दहर' नामसे परब्रह्म परमात्माका
ही वर्णन है।
सम्बन्ध-उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये दूसरा कारण बताते हैं—
धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ॥ १ । ३ । १६ ॥
धृतेः = इस 'दहर' मे समस्त लोकोको धारण करनेकी शक्ति बतायी
जानेके कारण; च=भी; (यह परब्रह्मका ही वाचक है) क्योकि अस्य =
इसकी; महिम्नः = (समस्त लोकोको धारण करनेकी सामर्थ्यरूप) महिमाका;
अस्मिन् = इस परब्रह्म परमात्मामे होना; उपलब्धेः = अन्य श्रुतियोंमे भी पाया
जाता है, इसलिये ( 'दहर' नामसे ब्रह्मका वर्णन मानना सर्वथा उचित है) ।
व्याख्या-छान्दोग्य (८ । ४ । १) में कहा गया है कि 'अथ य आत्मा स
सेतुर्विधृतिरेषां लोकानाम् ।' अर्थात् 'यह जो आत्मा है, वही इन सब लोकोको
धारण करनेवाला सेतु है।' इस प्रकार यहाँ उस 'दहर' शब्दवाच्य आत्मामे समस्त
लोकोको धारण करनेकी शक्तिका वर्णन होनेके कारण 'दहर' यहाँ परमात्माका
ही वाचक है; क्योकि दूसरी श्रुतियोंमे भी परमेश्वरमे ऐसी महिमा होनेका वर्णन
इस प्रकार उपलब्ध होता है—'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ
विधृतौ तिष्ठतः ।' (बृह० उ० ३ । ८ । ९) अर्थात् 'हे गार्गि ! इस अक्षर'
परमात्माके ही शासनमे रहकर सूर्य और चन्द्रमा भलीभाँति धारण किये हुए स्थित

Page 79Permalink

५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
हैं।' इत्यादि। इसके सिवा यह भी कहा है कि 'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष
भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय ।' ( बृह० उ० ४ । ४ । २२ )
अर्थात् 'यह सबका ईश्वर है, यह सम्पूर्ण प्राणियोंका स्वामी है, यह सब
भूतोंका पालन-पोषण करनेवाला है, तथा यह इन समस्त लोकोंको विनाशसे
बचानेके लिये उनको धारण करनेवाला सेतु है ।' परब्रह्मके अतिरिक्त अन्य
कोई भी इन सम्पूर्ण लोकोंको धारण करनेमे समर्थ नहीं हो सकता; इसलिये
यहाँ 'दहर' नामसे परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है।
सम्बन्ध-अब दूसरा हेतु देकर उसी बातकी पुष्टि करते हैं-
प्रसिद्धेश्च ॥ १ । ३ । १७ ॥
प्रसिद्धेः=आकाश शब्द परमात्माके अर्थमे प्रसिद्ध है । इस कारण; च=
भी ( 'दहर' नाम परब्रह्मका ही है ) ।
व्याख्या-श्रुतिमे 'दहराकाश' नाम आया है । आकाश शब्द परमात्माके
अर्थमे प्रसिद्ध है। यथा-'को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न
स्यात् ।' ( तै० उ० २ । ७ । १ ) अर्थात् 'यदि यह आनन्दस्वरूप आकाश सबको
( अवकाश देनेवाला परमात्मा ) न होता तो कौन जीवित रह सकता ? कौन
प्राणोंकी क्रिया कर सकता ?" तथा-'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव
समुत्पद्यन्ते ।' ( छा० उ० १ । ९ । १) । अर्थात् 'निश्चय ही ये सब
प्राणी आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं ।' इसलिये भी 'दहर' शब्द परब्रह्म
परमात्माका ही वाचक है ।
सम्बन्ध-अब 'दहर' शब्दसे जीवात्माका ग्रहण क्यों न किया जाय-यह
शङ्का उठाकर समाधान करते हैं-
इतरपरामर्शात् स इति चेन्नासंभवात् ॥ १ । ३ । १८ ॥
चेत्=यदि कहो; इतरपरामर्शात्=दूसरे अर्थात् जीवात्माका सङ्केत होनेके
कारण; सः=वही 'दहर' नामसे कहा गया है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक
नहीं है; असंभावात्=क्योंकि वहाँ कहे हुए लक्षण जीवात्मामे सम्भव नहीं है ।
व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् ( ८ । १ । ५ ) मे इस प्रकार वर्णन आया है-
'स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन्

सूत्र १७—१९ ] अध्याय १ ५९

Page 80Permalink

सूत्र १७—१९ ] अध्याय १ ५९
कामाः समाहिता एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः
सत्यकामः सत्यसङ्कल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा
भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ।'
अर्थात् '( शिष्योंके पूछनेपर ) आचार्य इस प्रकार कहे कि 'इस
( देह ) की जरावस्थासे यह जीर्ण नहीं होता, इसके वधसे इसका नाश
नहीं होता । यह ब्रह्मपुर सत्य है । इसमे सम्पूर्ण कामनाएँ सम्यक् प्रकारसे स्थित
हैं । यह आत्मा पुण्य-पापसे रहित, जरा-मृत्युसे शून्य, शोकहीन, भूख-प्याससे
रहित, सत्यकाम तथा सत्यसङ्कल्प है । जैसे इस लोकमे प्रजा यदि राजाकी
आज्ञाका अनुसरण करती है तो वह जिस-जिस वस्तुकी कामना तथा जिस-जिस
जनपद एवं क्षेत्रभागकी अभिलाषा करती है, उसी-उसीको पाकर सुखपूर्वक
जीवन धारण करती है ।' इस मन्त्रके अनुसार 'देहकी जरावस्थासे यह जीर्ण नहीं
होता और इसके वधसे इसका नाश नहीं होता'—इस कथनसे जीवात्माको लक्ष्य
करनेवाला संकेत मिलता है । क्योंकि इसके आगेवाले मन्त्रमे कर्मफलकी
अनित्यता बतायी गयी है, और कर्मफल-भोगका सम्बन्ध जीवात्मासे ही है । इस
प्रकार जीवात्माको लक्ष्य करनेवाला संकेत होनेके कारण यहाँ 'दहर' नामसे
'जीवात्मा'का ही प्रतिपादन है, ऐसा कहा जाय तो यह ठीक नहीं है; क्योकि
पूर्वोक्त मन्त्रमें ही जो 'सत्यसङ्कल्प' आदि लक्षण बताये गये हैं, वे जीवात्मामे होने
सम्भव नहीं हैं, इसलिये यहाँ 'दहर' शब्दसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन हुआ
है, ऐसा मानना सर्वथा उचित है ।
सम्बन्ध—पूर्वोक्त मतकी ही पुष्टिके लिये पुनः शङ्का उठाकर उसका समाधान
करते हैं—
उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ॥ १ । ३ । १९ ॥
चेत् = यदि कहो; उत्तरात् = उसके बादवाले वर्णनसे भी 'दहर' शब्द
जीवात्माका ही बोधक सिद्ध होता है; तु = तो यह कथन ठीक नहीं है, ( क्योकि )
आविर्भूतस्वरूपः = उस मन्त्रमे जिसका वर्णन है, वह अपने शुद्धस्वरूपको
प्राप्त हुआ आत्मा है ।
व्याख्या—'छान्दोग्योपनिषद् ( ८ । ३ । ४ ) मे कहा है कि 'अथ
य एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत

Page 81Permalink

६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यम् ।'
अर्थात् 'यह जो संप्रसाद है, वह इस शरीरसे निकलकर परम ज्योतिको प्राप्त हो
अपने शुद्ध स्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है । यह आत्मा है, यह अमृत एवं अभय
है और यही ब्रह्म है—ऐसा आचार्यने कहा । उस इस ब्रह्मका नाम सत्य है ।'
इस मन्त्रमे 'संप्रसाद'के नामसे स्पष्ट ही जीवात्माका वर्णन है और उसके लिये भी
वे ही अमृत, अभय आदि विशेषण दिये गये हैं, जो अन्यत्र ब्रह्मके लिये आते हैं;
इसलिये इन लक्षणोंका जीवात्मामे होना असंभव नहीं है, अतएव 'दहर' शब्द-
को 'जीवात्मा'का वाचक माननेमे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये ।'' ऐसी शङ्का
उठायी जाय तो ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त मन्त्रमे अपने शुद्ध स्वरूपको प्राप्त
हुए जीवात्माके लिये वैसे विशेषण आये है । इसलिये उसके आधारपर 'दहर'
शब्दको जीवात्माका वाचक नहीं माना जा सकता ।
सम्बन्ध—यदि ऐसी बात है, तो उक्त प्रकरणमे जीवात्माको लक्ष्य करानेवाले
शब्दोंका प्रयोग क्यों किया गया है ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते है—
अन्यार्थश्च परामर्शः ॥ १ । ३ । २० ॥
परामर्शः=( उक्त प्रकरणमे ) जीवात्माको लक्ष्य करानेवाला संकेत; च=भी;
अन्यार्थः=दूसरे ही प्रयोजनके लिये है ।
व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकरणमें जो जीवात्माको लक्ष्य करानेवाले शब्दोंका प्रयोग
हुआ है, वह 'दहर' शब्दसे जीवात्माका ग्रहण करानेके लिये नहीं, अपितु दूसरे
ही प्रयोजनसे है । अर्थात् उस दहर शब्दवाच्य परमात्माके यथार्थ स्वरूपका
ज्ञान हो जानेपर जीवात्मा भी वैसे ही गुणोवाला बन जाता है, यह भाव प्रदर्शित
करनेके लिये ही वहाँ जीवात्माका उस रूपमे वर्णन है । परब्रह्मका ज्ञान हो
जानेपर बहुत-से दिव्य गुण जीवात्मामें आ जाते हैं, यह बात भगवद्गीतामे भी कही
गयी है ( १४ । २ ) । इसलिये उक्त प्रकरणमे जीवात्माका वर्णन आ जाने-
मात्रसे यह नहीं सिद्ध होता कि वहाँ 'दहर' शब्द जीवात्माका वाचक है ।
सम्बन्ध—इसी बातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार पुनः शङ्का उठाकर उसका
समाधान करते हैं—
अल्पश्रुतेरिति चेत्तदुक्तम् ॥ १ । ३ । २१ ॥
चेत्=यदि कहो; अल्पश्रुतेः=श्रुतिमे 'दहर'को बहुत छोटा बताया गया

सूत्र २०-२३ ] अध्याय १ ६१

Page 82Permalink

सूत्र २०-२३ ] अध्याय १ ६१
है, इसलिये; ( 'दहर' शब्दसे यहाँ जीवात्माका ही ग्रहण है ) इति=ऐसा मानना
चाहिये; तदुक्तम्=तो इसका उत्तर दिया जा चुका है ।
व्याख्या-‘श्रुतिमे दहराकाशको अत्यन्त अल्प ( लघु ) बताया गया है ।
इससे भी यही सिद्ध होता है कि वह जीवात्मा है; क्योकि उसीका स्वरूप ‘अणु’
माना गया है ।'' परन्तु ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योकि, इसका उत्तर पहले
( सूत्र १ । २ । ७ मे ) दिया जा चुका है । अतः वारम्बार उसीको दुहराने-
की आवश्यकता नहीं है ।
सम्बन्ध-पूर्वसूत्रमे उठायी हुई शङ्काका उत्तर प्रकारान्तरसं दिया जाता है-
अनुकृतेस्तस्य च ॥ १ । ३ । २२ ॥
तस्य=उस जीवात्माका; अनुकृतेः=अनुकरण करनेके कारण; च=भी;
( परमात्माको अल्प परिमाणवाला कहना उचित है ) ।
व्याख्या-मनुष्यके हृदयका माप अङ्गुष्ठके बराबर माना गया है; उसीमे
जीवात्माके साथ परमात्माके प्रविष्ट होनेकी बात श्रुतिमे इस प्रकार बतायी गयी है-
'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।' ( क० उ० १ । ३ । १ )
अर्थात् 'शुभ कर्मोंके फलरूप मनुष्य-शरीरमे परब्रह्मके निवास-स्थानरूप
हृदयाकाशके अन्तर्गत बुद्धिरूप गुहामे छिपे हुए सत्यका पान करनेवाले दो
( जीवात्मा और परमात्मा ) है ।' 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ।' ( तै० उ० २ । ६ )
'परमात्मा उस जड-चेतनात्मक संपूर्ण जगत्‌की रचना करके स्वयं भी
जीवात्माके साथ उसमें प्रविष्ट हो गया ।' तथा-'सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव
जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् ।' ( छा० उ० ६ । ३ । ३ )
'उस परमात्माने त्रिविध तत्त्वरूप देवता अर्थात् उनके कार्यरूप मनुष्य-
शरीरमे जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर नाम-रूपका विस्तार किया ।' इत्यादि ।
इस प्रकार उस परमात्माको जीवात्माका अनुकरण करनेवाला बताया जानेके कारण
भी उसे अल्प परिमाणवाला कहना सर्वथा उचित ही है । इसी भावको लेकर
वेदोमे जगह-जगह परमात्माका स्वरूप 'अणोरणीयान्'-छोटे-से-छोटा तथा
'महतो महीयान्'-बडे-से-बड़ा बताया गया है ।
सम्बन्ध-इस विषयमे स्मृतिका भी प्रमाण देते हैं-
अपि च स्मर्यते ॥ १ । ३ । २३ ॥

Page 83Permalink

६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
च=इसके सिवा; स्मर्यते अपि=यही बात स्मृतिमे भी कही गयी है ।
व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वर सबके हृदयमे स्थित है और वह छोटे-से भी छोटा
है—ऐसा वर्णन स्मृतियोंमें इस प्रकार आया है—'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः।'
( गीता १५। १५ ) । 'हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।' ( गीता १३। १७ ) ।
'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।' ( गीता १८। ६१ ) । 'अविभक्तं
च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।' ( गीता १३। १६ ) । 'अणोरणीयांसम्।'
( गीता ८। ९) इत्यादि। ऐसा वर्णन होनेके कारण उस सर्वव्यापी परब्रह्म परमेश्वरको
स्थानकी अपेक्षासे छोटे आकारवाला कहना उचित ही है । अतः 'दहर'
शब्दसे परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, जीवात्माका नहीं।
सम्बन्ध—उपर्युक्त विवेचन पढकर यह जिज्ञासा होती है कि कठोपनिषद्
( २। १ । १२, १३ तथा २ । ३ । १७ ) में जिसे अङ्गुष्ठके बराबर
बताया गया है, वह जीवात्मा हे या परमात्मा ? अतः इसका निर्णय करनेके
लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
शब्दादेव प्रमितः ॥ १ । ३ । २४ ॥
शब्दात्=( उक्त प्रकरणमे आये हुए ) शब्दसे; एव=ही; ( यह सिद्ध
होता है कि ) प्रमितः=अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला पुरुष ( परमात्मा ही है ) ।
व्याख्या—कठोपनिषद्मे कहा है कि 'अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि
तिष्ठति।' ( २ । १ । १२ ) तथा 'अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।
ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः ॥' ( २ । १ । १३ ) । अर्थात्
'अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला परम पुरुष शरीरके मध्यभाग ( हृदय ) में स्थित है।'
तथा अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला परम पुरुष धूमरहित ज्योतिकी भाँति एकरस
है, वह भूत, वर्तमान और भविष्यपर शासन करनेवाला है । वह आज भी
है और कल भी रहेगा; अर्थात् वह नित्य सनातन है।' इस प्रकरणमे जिसे
अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला पुरुष बताया गया है, वह परब्रह्म परमात्मा ही है;
यह बात उन्हीं मन्त्रोमे कहे हुए शब्दोंसे सिद्ध होती है । क्योंकि वहाँ उस
पुरुषको भूत, वर्तमान और भविष्यमे होनेवाली समस्त प्रजाका शासक, धूमरहित
अग्निके सदृश एकरस और सदा रहनेवाला बताया गया है तथा आगे चलकर
उसीको विशुद्ध अमृतस्वरूप जाननेके लिये कहा गया है ( २ । ३ । १७ ) ।

सूत्र २४—२६ ] अध्याय १ ६३

Page 84Permalink

सूत्र २४—२६ ] अध्याय १ ६३
सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि उस परब्रह्म परमात्माको अङ्गुष्ठके
बराबर मापवाला क्यों बताया गया है ? इसपर कहते हैं—
हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॥ १ । ३ । २५ ॥
तु=उस परमपुरुषको अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला कहना तो; हृदि=
हृदयमे स्थित बताये जानेकी; अपेक्षया=अपेक्षासे है; मनुष्याधिकारत्वात्=
क्योकि ( ब्रह्मविद्यामे ) मनुष्यका ही अधिकार है ।
व्याख्या—उपनिषदोंमे वर्णित ब्रह्मविद्याके द्वारा ब्रह्मको जाननेका अधिकार
मनुष्यको ही है । अन्य पशु-पक्षी आदि अधम योनियोंमे यह जीवात्मा उस
परब्रह्म परमात्माको नहीं जान सकता और मनुष्यके हृदयका माप अङ्गुष्ठके बराबर
माना गया है; इस कारण यहाँ मनुष्य-हृदयके मापकी अपेक्षासे उस परब्रह्म
परमेश्वरको 'अङ्गुष्ठमात्र पुरुष' कहा गया है ।
सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें अधिकारकी बात आ जानेसे प्रसङ्गवश दूसरा प्रकरण
चल पड़ा । पहले यह बताया गया है कि वेदाध्ययनपूर्वक ब्रह्मविद्याके द्वारा
ब्रह्मको प्राप्त करनेका अधिकार मनुष्योंका ही है । इसपर यह जिज्ञासा होती है
कि क्या मनुष्यको छोड़कर अन्य किसीका भी अधिकार नहीं है ? इसपर
कहते हैं—
तदुपर्यपि बादरायणः संभवात् ॥ १ । ३ । २६ ॥
बादरायणः=आचार्य बादरायण कहते है कि; तदुपरि=मनुष्यसे ऊपर
जो देवता आदि हैं, उनका; अपि=भी ( अधिकार है ), संभवात्=क्योकि
उन्हें वेद-ज्ञानपूर्वक ब्रह्मज्ञान होना संभव है ।
व्याख्या—मनुष्यसे नीचेकी योनियोमे तो वेदविद्याको पढ़ने तथा उसके
द्वारा परमात्म-ज्ञान प्राप्त करनेकी सामर्थ्य ही नहीं है, इसलिये उनका अधिकार
न बतलाना तो उचित ही है । परन्तु देवादि योनि मनुष्ययोनिसे ऊपर है ।
जो मनुष्य धर्म तथा ज्ञानमे श्रेष्ठ होते हैं, उन्हींको देवादि योनि प्राप्त होती है ।
अतः उनमे पूर्वजन्मके अभ्याससे ब्रह्मविद्याको जाननेकी सामर्थ्य होती ही है ।
अतएव साधन करनेपर उन्हे ब्रह्मका ज्ञान होना सम्भव है । इसलिये भगवान्
बादरायणका कहना है कि मनुष्योंसे ऊपरवाली योनियोंमे भी ब्रह्मज्ञान प्राप्त
करनेका अधिकार है ।

Page 85Permalink

६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद-३
सम्बन्ध—उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये ही सूत्रकार स्वयं शङ्का उठाकर
उसका समाधान करते हैं—
विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् ॥ १ । ३ । २७ ॥
चेत्=यदि कहो (देवता आदिको शरीरधारी मान लेनेसे); कर्मणि=यज्ञादि
कर्ममे; विरोधः=विरोध आता है; इति न=तो यह कथन ठीक नहीं है;
अनेकप्रतिपत्तेः=क्योकि उनके द्वारा एक ही समय अनेक रूप धारण करना
संभव है; दर्शनात्=शास्त्रमें ऐसा देखा गया है ।
व्याख्या—"यदि देवता आदिको भी मनुष्योके समान विशेष आकृतियुक्त या
शरीरधारी मान लिया जायगा तो वे एक देशमे ही रहनेवाले माने जा सकते है ।
ऐसी दशामे एक ही समय अनेक यज्ञोमें उनके निमित्त दी जानेवाली हविष्यकी
आहुतिको वे कैसे ग्रहण कर सकते हैं । अतः पृथक्-पृथक् अनेक याज्ञिकोंद्वारा
एक समय यज्ञादि कर्ममे जो उनके लिये हवि समर्पित करनेका विधान है, उसमे
विरोध आवेगा । इस विरोधकी निवृत्ति तभी हो सकती है, जब देवताओंको
एकदेशीय न मानकर व्यापक माना जाय ।' परन्तु ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये;
क्योंकि देवोमे अनेक विग्रह धारण करनेकी सहज शक्ति होती है । अतः वे
योगीकी भाँति एक ही कालमे अनेक शरीर धारण करके अनेक स्थानोमे एक
साथ उनके लिये समर्पित की हुई हविको ग्रहण कर सकते है । शास्त्रमे भी
देवताओंके सम्बन्धमे ऐसा वर्णन देखा जाता है । बृहदारण्यकोपनिषद् (३।९।१-२)
मे एक प्रसङ्ग आता है, जिसमें शाकल्य तथा याज्ञवल्क्यका संवाद है ।
शाकल्यने पूछा—'देवता कितने है ?' याज्ञवल्क्य बोले—'तीन और तीन सौ
तथा तीन और तीन सहस्र ।' फिर प्रश्न हुआ 'कितने देवता है ?' उत्तर
मिला—'तैंतीस ।' बार-बार प्रश्नोत्तर होनेपर अन्तमे याज्ञवल्क्यने कहा—'ये
सब तो इनकी महिमा हैं अर्थात् ये एक-एक ही अनेक हो जाते है । वास्तवमें
देवता तैंतीस ही है ।' इत्यादि । इस प्रकार श्रुतिने देवताओमे अनेक रूप
धारण करनेकी शक्तिका वर्णन किया है । योगियोमे भी ऐसी शक्ति देखी जाती
है; इसलिये कोई विरोध नहीं है ।
सम्बन्ध—देवताओंको शरीरधारी माननेसे उन्हे विनाशशील मानना पड़ेगा;
ऐसी दशामें वेदोंमें जिन-जिन देवताओंका वर्णन आता है, उनकी नित्यता नहीं

सूत्र २७-२८ ] अध्याय १ ६५

Page 86Permalink

सूत्र २७-२८ ] अध्याय १ ६५
सिद्ध होगी और इसीलिये वेदको भी नित्य एवं प्रमाणभूत नहीं माना जा
सकेगा; इस विरोधका परिहार कैसे हो ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—
शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ १ । ३ । २८ ॥
चेत्=यदि कहो; शब्दे=( देवताको शरीरधारी माननेपर ) वैदिक शब्दमे
विरोध आता है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; अतः प्रभवात्=क्योंकि
इस वेदोक्त शब्दसे ही देवता आदि जगत्की उत्पत्ति होती है; प्रत्यक्षानु-
मानाभ्याम्=यह बात प्रत्यक्ष ( वेद ) और अनुमान ( स्मृति ) दोनो प्रमाणोंसे
सिद्ध होती है।
व्याख्या—"देवताओमे अनेक शरीर धारण करनेकी शक्ति मान लेनेसे
कर्ममे विरोध नहीं आता, यह तो ठीक है; परन्तु ऐसा माननेसे जो वेदोक्त
शब्दोंको नित्य एवं प्रमाणभूत माना जाता है, उसमे विरोध आवेगा; क्योकि
शरीरधारी होनेपर देवताओको भी जन्म-मरणशील मानना पड़ेगा। ऐसी दशामे
वे नित्य नहीं होंगे तथा नित्य वैदिक शब्दोके साथ उनके नाम-रूपोका नित्य
सम्बन्ध भी नहीं रह सकेगा।" ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योकि जहाँ
कल्पके आदिमे देवादिकी उत्पत्तिका वर्णन आता है, वहाँ यह बताया गया है
कि 'किस रूप और ऐश्वर्यवाले देवताका क्या नाम होगा।' इस प्रकार वेदोक्त
शब्दसे ही उनके नाम, रूप और ऐश्वर्य आदिकी कल्पना की जाती है अर्थात्
पूर्वकल्पमे जितने देवता, जिस-जिस नाम, रूप तथा ऐश्वर्यवाले थे, वर्तमान
कल्पमें भी उतने ही देवता वैसे ही नाम, रूप और ऐश्वर्यसे युक्त उत्पन्न किये
जाते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि कल्पान्तरमे देवता आदिके जीव तो
बदल जाते हैं, परन्तु नाम-रूप पूर्वकल्पके अनुसार ही रहते हैं। यह बात
प्रत्यक्ष ( श्रुति ) और अनुमान ( स्मृति ) के प्रमाणसे भी सिद्ध है। श्रुतियो
और स्मृतियोमे उपर्युक्त बातका वर्णन इस प्रकार आता है—'स भूरिति
व्याहरत् स भूमिमसृजत' 'स भुवरिति व्याहरत् सोऽन्तरिक्षमसृजत।' ( तै० ब्रा० २ ।
२ । ४ । २ ) 'उसने मन-ही-मन 'भूः' का उच्चारण किया, फिर भूमिकी
सृष्टि की।' 'उसने मनमे 'भुवः' का उच्चारण किया, फिर अन्तरिक्षकी सृष्टि
की।' इत्यादि। इस वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि प्रजापतिने पहले वाचक
शब्दका स्मरण करके उसके अर्थभूत स्वरूपका निर्माण किया। इसी प्रकार
स्मृतिमे भी कहा है—
वे० द० ५—

Page 87Permalink

६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् ।
वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ॥
( मनु० १ । २१ )
'उन सृष्टिकर्ता परमात्माने पहले सृष्टिके प्रारम्भमे सबके नाम और पृथक्-
पृथक् कर्म तथा उन सबकी अलग-अलग व्यवस्थाएँ भी वेदोक्त शब्दोके अनुसार
ही बनायीं ।'
सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनको ही वेदकी नित्यतामे हेतु बतलाते हैं—
अतएव च नित्यत्वम् ॥ १ । ३ । २९ ॥
अतएव=इसीसे; नित्यत्वम्=वेदकी नित्यता; च=भी; ( सिद्ध होती है )।
व्याख्या—सृष्टिकर्त्ता परमेश्वर वैदिक शब्दोके अनुसार ही समस्त जगत्‌की
रचना करते हैं, यह कहा गया है। इससे वेदोकी नित्यता स्वतः सिद्ध हो जाती
है; क्योकि प्रत्येक कल्पमे परमेश्वरद्वारा वेदोकी भी नयी रचना की जाती है;
यह बात कहीं नहीं कही गयी है।
सम्बन्ध—प्रत्येक कल्पमें देवताओके नाम-रूप बदल जानेके कारण वेदोक्त
शब्दोंकी नित्यतामें विरोध कैसे नही आयेगा ? इस जिज्ञासापर कहते है—
समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात्
स्मृतेश्च ॥ १ । ३ । ३० ॥
च=तथा; समाननामरूपत्वात्=( कल्पान्तरमे उत्पन्न होनेवाले देवादिको-
के ) नाम-रूप पहलेके ही समान होते है, इस कारण; आवृत्तौ=पुनः आवृत्ति
होनेपर; अपि=भी; अविरोधः=किसी प्रकारका विरोध नहीं है; दर्शनात्=
क्योकि ( श्रुतिमे ) ऐसा ही वर्णन देखा गया है; च=और; स्मृतेः=स्मृतिसे
भी ( यही बात सिद्ध होती है )।
व्याख्या—वेदमें यह कहा गया है कि 'सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वम-
कल्पयत् ।' ( ऋ० १० । १९० । ३ ) अर्थात् 'जगत्-स्रष्टा परमेश्वरने सूर्य,
चन्द्रमा आदि सबको पहलेकी भाँति बनाया।' श्वेताश्वतरोपनिषद् ( ६ । १८ )
मे इस प्रकार वर्णन आता है—
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै ।
त५ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥

सूत्र २९—३१ ] अध्याय १ ६७

Page 88Permalink

सूत्र २९—३१ ] अध्याय १ ६७
'जो परमेश्वर निश्चय ही, सृष्टिकालमें सबसे पहले ब्रह्माको उत्पन्न करता है
और उन्हें समस्त वेदोंका उपदेश देता है, उस आत्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट
करनेवाले प्रसिद्ध देव परमेश्वरकी मैं मुमुक्षुभावसे शरण ग्रहण करता हूँ।' इसी
प्रकार स्मृतिमें भी कहा गया है कि—
तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्या प्रतिपेदिरे ।
तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमाना पुनः पुनः ॥ ( महा० )
'पूर्वकल्पकी सृष्टिमें जिन्होंने जिन कर्मोंको अपनाया था, बादकी सृष्टिमें
बारंबार रचे हुए वे प्राणी फिर उन्हीं कर्मोंको प्राप्त होते हैं।'
इस प्रकार श्रुतियों तथा स्मृतियोंके वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि कल्पान्तर-
में उत्पन्न होनेवाले देवादिकोंके नाम, रूप पहलेके सदृश ही वेद-वचनानुसार
रचे जाते हैं; इसलिये उनकी बार-बार आवृत्ति होती रहनेपर भी वेदोंकी नित्यता
तथा प्रामाणिकतामें किसी प्रकारका विरोध नहीं आता है।
सम्बन्ध—२६ वें सूत्रमें जो प्रसङ्गवश यह बात कही गयी थी कि ब्रह्म-
विद्यामें देवादिका भी अधिकार है, ऐसा वेदव्यासजी मानते हैं, उसीकी पुष्टि
तीसवें सूत्रतक की गयी। अब आचार्य जैमिनिके मतानुसार यह बात कही
जाती है कि ब्रह्मविद्यामें देवता आदिका अधिकार नहीं है—
मध्वादिष्वसंभवादनधिकारं जैमिनिः ॥ १ । ३ । ३१ ॥
जैमिनिः=जैमिनि नामक आचार्य; मध्वादिषु=मधु-विद्या आदिमें;
अनधिकारम् (आह) =देवता आदिका अधिकार नहीं बताते हैं; असंभवात्=
क्योंकि यह संभव नहीं है।
व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्‌के तीसरे अध्यायमें प्रथमसे लेकर ग्यारहवें
खण्डतक मधुविद्याका प्रकरण है। यहाँ 'सूर्य' को देवताओंका 'मधु' बताया गया
है। मनुष्योंके लिये साधनद्वारा प्राप्त होनेवाली वस्तु देवताओंको स्वतः प्राप्त है,
इस कारण देवताओंके लिये मधु-विद्या अनावश्यक है; अतः उस विद्यामें उनका
अधिकार मानना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार स्वर्गादि देवलोकके भोगोंकी
प्राप्तिके लिये जो वेदोंमें यज्ञादिके द्वारा देवताओंकी सकाम उपासनाका वर्णन
है, उसका अनुष्ठान भी देवताओंके लिये अनावश्यक होनेके कारण उनके द्वारा
किया जाना सम्भव नहीं है। अतएव उसमें भी उनका अधिकार नहीं है,

Page 89Permalink

६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
इसलिये यह सिद्ध होता है कि जैसे मनुष्योंके लिये यज्ञादि कर्मद्वारा स्वर्गादिकी
प्राप्ति करानेवाली वेदवर्णित विद्याओंमें देवताओंका अधिकार नहीं है, उसी प्रकार
ब्रह्मविद्यामे भी उनका अधिकार नहीं है । यों आचार्य जैमिनि कहते हैं ।
सम्बन्ध—इसी बातको पुष्ट करनेके लिये आचार्य जैमिनि दूसरी युक्ति
देते हैं—
ज्योतिषि भावाच्च ॥ १ । ३ । ३२ ॥
ज्योतिषि=ज्योतिर्मय लोकोमें; भावात्=देवताओंकी स्थिति होनेके
कारण; च=भी; ( उनका यज्ञादि कर्म और ब्रह्मविद्यामें अधिकार नहीं है ) ।
व्याख्या—वे देवता स्वभावसे ही ज्योतिर्मय देवलोकोंमें निवास करते हैं,
वहाँ उन्हें स्वभावसे ही सब प्रकारका ऐश्वर्य प्राप्त है; नये कर्मोंद्वारा उनको किसी
प्रकारका नूतन ऐश्वर्य नहीं प्राप्त करना है; अतएव उन सब लोकोंकी प्राप्तिके
लिये बताये हुए कर्मोंमें उनकी प्रवृत्ति सम्भव नहीं है; इसलिये जिस प्रकार
वेदविहित अन्य विद्याओंमें उनका अधिकार नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्मविद्यामें
भी नहीं है ।
सम्बन्ध—पूर्वोक्त दो सूत्रोंसे जैमिनिके मतानुसार पूर्वपक्षकी स्थापना की
गयी । अब उसके उत्तरमें सूत्रकार अपना निश्चित मत बतलाकर देवताओंके
अधिकारविषयक प्रकरणको समाप्त करते हैं—
भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॥ १ । ३ । ३३ ॥
तु=किन्तु; बादरायणः=बादरायण आचार्य ( यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्म-
विद्यामें ) देवता आदिके भी अधिकारका; भावम् ( मन्यते ) =भाव ( अस्तित्व )
मानते हैं; हि=क्योकि; अस्ति=श्रुतिमे ( उनके अधिकारका ) वर्णन है ।
व्याख्या—बादरायण आचार्य अपने मतका दृढ़तापूर्वक प्रतिपादन करते
हुए 'तु' इस अव्यय पदके द्वारा यह सूचित करते हैं कि पूर्वपक्षीका मत शब्द-
प्रमाणसे रहित होनेके कारण मान्य नहीं है । निश्चय ही यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्म-
विद्यामे देवताओंका भी अधिकार है; क्योकि वेदमें उनका यह अधिकार सूचित
करनेवाले वचन मिलते हैं । जैसे—'प्रजापतिरकामयत प्रजायेयेति स एतदग्नि-

सूत्र ३२-३४ ] अध्याय १ ६९

Page 90Permalink

सूत्र ३२-३४ ] अध्याय १ ६९
होत्रं मिथुनमपश्यत् । तदुदिते सूर्येऽजुहोत् ।' (तै० ब्रा० २ । १ । २ । ८ ) तथा
'देवा वै सत्रमासत ।' ( तै० सं० २ । ३ । ३ ) अर्थात् 'प्रजापतिने इच्छा की
कि मैं प्रजारूपसे उत्पन्न होऊँ' उन्होंने अग्निहोत्ररूप मिथुनपर दृष्टिपात किया
और सूर्योदय होनेपर उसका हवन किया।' तथा 'निश्चय ही देवताओने यज्ञका
अनुष्ठान किया।' इत्यादि वचनोंद्वारा देवताओका कर्माधिकार सूचित होता है।
इसी प्रकार ब्रह्मविद्यामे देवताओका अधिकार बतानेवाले वचन ये है—'तद् यो
देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् ।' ( बृह० १ । ४ । १० ) अर्थात्
'देवताओंमेंसे जिसने उस ब्रह्मको जान लिया, वही वह ब्रह्म हो गया।' इत्यादि ।
इसके सिवा, छान्दोग्योपनिषद्मे ( ८ । ७ । २ से ८ । १२ । ६ तक ) यह
प्रसङ्ग आता है कि इन्द्र और विरोचनने ब्रह्माजीकी सेवामे रहकर बहुत वर्षोंतक
ब्रह्मचर्य पालन करनेके पश्चात् ब्रह्मविद्या प्राप्त की। इन सब प्रमाणोंसे यही
सिद्ध होता है कि देवता आदिका भी कर्म और ब्रह्मविद्यामे अधिकार है।
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि क्या सभी वर्णके मनुष्योंका
वेदविद्यामें अधिकार है ? क्योंकि छान्दोग्योपनिषद्में ऐसा वर्णन मिलता है कि
रैक्वने राजा जानश्रुतिको शूद्र कहते हुए भी उन्हें ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया।
इससे तो यही सिद्ध होता है कि शूद्रका भी ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। अतः
इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात् सूच्यते हि ॥ १ । ३ । ३४ ॥
तदनादरश्रवणात् = उन हंसोंके मुखसे अपना अनादर सुनकर; अस्य=
इस राजा जानश्रुतिके मनमे; शुक् = शोक उत्पन्न हुआ; तत्=तदनन्तर;
आद्रवणात् = (जिनकी अपेक्षा अपनी तुच्छता सुनकर शोक हुआ था ) उन
रैक्वमुनिके पास वह विद्या-प्राप्तिके लिये दौड़ा गया; ( इस कारण उस रैक्वने उसे
शूद्र कहकर पुकारा ) हि=क्योकि (इससे); सूच्यते=(रैक्वमुनिकी सर्वज्ञता )
सूचित होती है।
व्याख्या—इस प्रकरणमे रैक्वने राजा जानश्रुतिको जो शूद्र कहकर संबोधित
किया, इसका यह अभिप्राय नहीं है कि वह जातिसे शूद्र था; अपि तु वह शोकसे
व्याकुल होकर दौड़ा आया था, इसलिये उसे शूद्रं कहा। यही बात उस प्रकरणकी
समालोचनासे सिद्ध होती है।
१- शुचम् आद्रवति इति शूद्रः—जो शोकके पीछे दौड़ता है, वह शूद्र है, इस
व्युत्पत्तिके अनुसार रैक्वने उसे 'शूद्र' कहा।

Page 91Permalink

७० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
छान्दोग्योपनिषद्मे ( ४ । १ । १ से ४ तक ) वह प्रकरण
इस प्रकार है—'राजा जानश्रुति श्रद्धापूर्वक बहुत दान देनेवाला था ।
वह अतिथियोंके भोजनके लिये बहुत अधिक अन्न तैयार कराकर रखता था ।
उनके ठहरनेके लिये उसने बहुत-सी विश्रामशालाएँ भी बनवा रक्खी थीं । एक
दिनकी बात है, राजा जानश्रुति रातके समय अपने महलकी छतपर बैठा था ।
उसी समय उसके ऊपरसे आकाशमे कुछ हंस उड़ते हुए जा रहे थे । उनमेसे
एक हंसने दूसरेको पुकारकर कहा—'अरे ! सावधान, इस राजा जानश्रुतिका
महान् तेज आकाशमे फैला हुआ है, कहीं भूलसे उसका स्पर्श न कर लेना,
नहीं तो वह तुझे भस्म कर देगा ।' यह सुनकर आगे जानेवाले हंसने कहा—
'अरे भाई ! तू किस महत्ताको लेकर इस राजाको इतना महान् मान रहा है,
क्या तू इसको गाड़ीवाले रैक्वके समान समझता है !' इसपर पीछेवाले हंसने
पूछा—'रैक्व कैसा है ?' अगले हंसने उत्तर दिया—'यह सारी प्रजा जो कुछ
भी शुभ कर्म करती है, वह सब उस रैक्वको प्राप्त होता है, तथा जिस तत्त्वको
रैक्व जानता है, उसे जो कोई भी जान ले, उसकी भी ऐसी ही महिमा हो जाती
है ।' इस प्रकार हसोसे अपनी तुच्छताकी बात सुनकर राजाके मनमे शोक
हुआ; फिर वह रैक्वकी खोज कराकर उनके पास विद्या-ग्रहणके लिये गया ।
रैक्व मुनि सर्वज्ञ थे, वे राजाकी मनःस्थितिको जान गये । उन्होंने उसके मनमें
जगे हुए ईर्ष्याभावको दूर करके उसमें श्रद्धाका भाव उत्पन्न करनेका विचार किया
और अपनी सर्वज्ञता सूचित करके उसे सावधान करते हुए 'शूद्र' कहकर
पुकारा । यह जानते हुए भी कि जानश्रुति क्षत्रिय है, रैक्वने उसे 'शूद्र' इसलिये
कहा कि वह शोकके वशीभूत होकर दौड़ा आया था । अतः इससे यह नहीं
सिद्ध होता कि वेदविद्यामे शूद्रका अधिकार है ।
सम्बन्ध—राजा जानश्रुतिका क्षत्रिय होना कैसे सिद्ध होता है ? इस
जिज्ञासापर कहते हैं—
क्षत्रियत्वावगतेश्चोत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् ॥ १ । ३ । ३५ ॥
क्षत्रियत्वावगतेः = जानश्रुतिका क्षत्रिय होना प्रकरणमें आये हुए लक्षणसे
जाना जाता है इससे; च = तथा; उत्तरत्र = बादमे कहे हुए; चैत्ररथेन = चैत्ररथके
सम्बन्धसे; लिङ्गात् = जो क्षत्रियत्वसूचक चिह्न या प्रमाण प्राप्त होता है, उससे
भी ( उसका क्षत्रिय होना ज्ञात होता है ) ।

सूत्र ३५-३६ ] अध्याय १ ७१

Page 92Permalink

सूत्र ३५-३६ ] अध्याय १ ७१
व्याख्या-उक्त प्रकरणमे जानश्रुतिको श्रद्धापूर्वक बहुत दान देनेवाला और
अतिथियोंके लिये ही तैयार कराकर रक्खी हुई रसोईसे प्रतिदिन उनका सत्कार
करानेवाला बताया गया है। उसके राजोचित ऐश्वर्यका .भी वर्णन है, साथ ही
यह भी कहा गया है कि राजाकी कन्याको रैकने पत्नीरूपमें ग्रहण किया। इन
सब बातोंसे यह सिद्ध होता है कि वह शूद्र नहीं, क्षत्रिय था। इसलिये यही
सिद्ध होता है कि वेद-विद्यामे जाति-शूद्रका अधिकार नहीं है। इसके सिवा,
इस प्रसङ्गके अन्तिम भागमे रैकने वायु तथा प्राणको सबका भक्षण करनेवाला
कहकर उन दोनोंकी स्तुतिके लिये एक आख्यायिका उपस्थित की है। उसमे
ऐसा कहा है कि 'शौनक और अभिप्रतारी चैत्ररथ-इन दोनोको जब भोजन
परोसा जा रहा था, उस समय एक ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी' इत्यादि। इस
आख्यायिकामे राजा जानश्रुतिके यहाँ शौनक और चैत्ररथको भोजन परोसे जाने-
की बात कही गयी है, इससे जानश्रुतिका क्षत्रिय होना सिद्ध होता है; क्योकि
शौनक ब्राह्मण और चैत्ररथ क्षत्रिय थे; वे शूद्रके यहाँ भोजन नहीं कर सकते
थे। अतः यही सिद्ध होता है कि जाति-शूद्रका वेद-विद्यामें अधिकार नहीं है।
सम्बन्ध-उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये ही दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं-
संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च ॥ १ । ३ । ३६ ॥
संस्कारपरामर्शात्=श्रुतिमे वेदविद्या ग्रहण करनेके लिये पहले उपनयन आदि
संस्कारोंका होना आवश्यक बताया गया है, इसलिये; च=तथा; तदभावाभि-
लापात्=शूद्रके लिये उन संस्कारोंका अभाव कहा गया है; इसलिये भी
( जाति-शूद्रका वेदविद्यामे अधिकार नहीं है )।
व्याख्या-उपनिषदोंमे जहाँ-जहाँ वेदविद्याके अध्ययनका प्रसङ्ग आया है,
वहाँ सब जगह यह देखा जाता है कि आचार्य पहले शिष्यका उपनयनादि
संस्कार करके ही उसे वेद-विद्याका उपदेश देते हैं। यथा-'तेषामेवैतां
ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद् यैस्तु चीर्णम् ॥' ( मु० उ० ३ । २ । १० )
अर्थात् 'उन्हींको इस ब्रह्मविद्याका उपदेश दे, जिन्होने विधिपूर्वक
उपनयनादि संस्कार कराकर ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किया हो।' 'उप त्वा नेष्ये'
('छा० उ० ४ । ४ । ५) 'तेरा उपनयन संस्कार करूँगा।' 'तꣲ होप-

Page 93Permalink

७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
निन्ये।' ( श० ब्रा० ११ । ५ । ३ । १३ ) 'उसका उपनयन-
संस्कार किया।' इत्यादि । इस प्रकार वेदविद्याके अध्ययनमें उपनयन आदि
संस्कारोंका होना परम आवश्यक माना गया है तथा शूद्रोंके लिये उन संस्कारोंका
विधान नहीं किया है; इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शूद्रोंका वेदविद्यामे
अधिकार नहीं है ।
सम्बन्ध—इसी बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा कारण बताते हैं—
तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ॥ १ । ३ । ३७ ॥
तदभावनिर्धारणे=शिष्यमे शूद्रत्वका अभाव निश्चित करनेके लिये;
प्रवृत्तेः=आचार्यकी प्रवृत्ति पायी जाती है, इससे; च=भी ( यही सिद्ध होता
है कि वेदाध्ययनमें शूद्रका अधिकार नहीं है ) ।
व्याख्या—जानश्रुति तथा रैक्वकी कथाके बाद ही सत्यकाम जावालका
प्रसङ्ग इस प्रकार आया है—'जबालाके पुत्र सत्यकामने गौतमनामक
आचार्यकी शरणमे जाकर कहा—'भगवन् ! मै ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक आपकी
सेवामे रहनेके लिये उपस्थित हुआ हूँ।' तब गौतमने उसकी जातिका
निश्चय करनेके लिये पूछा—'तेरा गोत्र क्या है ?' इसपर उसने स्पष्ट शब्दोमे
कहा—'मैं अपना गोत्र नहीं जानता । मैंने अपनी मातासे गोत्र पूछा था,
उसने कहा कि—'मुझे गोत्र नहीं मालूम है, मेरा नाम जवाला है
और तेरा नाम सत्यकाम है।' इसलिये मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि
'मैं जबालाका पुत्र सत्यकाम हूँ।' तब गुरुने कहा—'इतना स्पष्ट और सत्य
भाषण ब्राह्मण ही कर सकता है, दूसरा कोई नहीं।' इस प्रकार सत्य
भाषणरूप हेतुसे यह निश्चय करके कि सत्यकाम ब्राह्मण है, शूद्र नहीं है, उसे
आचार्य गौतमने समिधा लानेका आदेश दिया और उसका उपनयन-संस्कार
कर दिया।' ( छा० उ० ४ । ४ । ३-५ )
इस तरह इस प्रकरणमे आचार्यद्वारा पहले यह निश्चय कर लिया गया
कि 'सत्यकाम शूद्र नहीं, ब्राह्मण है, फिर उसका उपनयन-संस्कार करके
उसे विद्याध्ययनका अधिकार प्रदान किया गया; इससे यही सिद्ध होता है
कि शूद्रका वेद-विद्यामे अधिकार नहीं है ।

सूत्र ३७-३८ ] अध्याय १ ७३

Page 94Permalink

सूत्र ३७-३८ ] अध्याय १ ७३
सम्बन्ध—अब प्रमाण द्वारा शूद्रके वेद-विद्यामें अधिकारका निषेध करते हैं—
श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् स्मृतेश्च ॥ १ । ३ । ३८ ॥
श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् = शूद्रके लिये, वेदोंके श्रवण, अध्ययन तथा
अर्थज्ञानका भी निषेध किया गया है, इससे; च=तथा; स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे भी
( यही सिद्ध होता है कि वेद-विद्यामे शूद्रका अधिकार नहीं है ) ।
व्याख्या—श्रुतिमे शूद्रके लिये वेदके श्रवण, अध्ययन तथा अर्थज्ञानका भी
निषेध किया गया है । यथा—'एतच्छुश्मशानं यच्छूद्रस्तस्माच्छूद्रस्य समीपे नाध्ये-
तव्यम्।' अर्थात् 'जो शूद्र है, वह श्मशानके तुल्य है, अतः शूद्रके समीप वेदाध्ययन
नहीं करना चाहिये ।' इसके द्वारा शूद्रके वेद-श्रवणका निषेध सूचित होता है ।
जब सुनने तकका निषेध है, तब अध्ययन और अर्थज्ञानका निषेध स्वतः सिद्ध
हो जाता है । इससे तथा स्मृतिके वचनसे भी यही सिद्ध होता है कि 'शूद्रको
वेदाध्ययनका अधिकार नहीं है।' इस विषयमे पराशर-स्मृतिका वचन इस
प्रकार है—'वेदाक्षरविचारेण शूद्रः पतति तत्क्षणात् ।' ( १ । ७३ )
अर्थात् 'वेदके अक्षरोंका अर्थ समझनेके लिये विचार करनेपर शूद्र
तत्काल पतित हो जाता है।' मनुस्मृतिमें भी कहा है कि 'न शूद्राय मतिं
दद्यात्।' ( ४ । ८० ) अर्थात् 'शूद्रको वेद-विद्याका ज्ञान नहीं देना चाहिये।'
इसी प्रकार अन्य स्मृतियोंमे भी जगह-जगह शूद्रके लिये वेदके श्रवण, अध्ययन
तथा अर्थज्ञानका निषेध किया गया है । इससे यही मानना चाहिये कि वेद-
विद्यामे शूद्रका अधिकार नहीं है। इतिहासमे जो विदुर आदि शूद्रजातीय सत्पुरुषो-
को ज्ञान प्राप्त होनेकी बात पायी जाती है, उसका भाव यो समझना चाहिये
कि इतिहास-पुराणोको सुनने और पढ़नेमें चारो वर्णोंका समान रूपसे अधिकार
है । इतिहास-पुराणोके द्वारा शूद्र भी परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर सकता है ।
इस प्रकार उसे भी भक्ति एवं ज्ञानका फल प्राप्त हो सकता है । फल-प्राप्तिमे
कोई विरोध नहीं है; क्योकि भगवान्‌की भक्तिद्वारा परम गति प्राप्त करनेमे
मनुष्यमात्रका अधिकार है ( गीता ९ । ३२ ) ।
सम्बन्ध—यहाँतकके प्रकरणमें प्रसङ्गवश प्राप्त हुए अधिकारविषयक वर्णनको
पूरा करके यह सिद्धान्त स्थिर किया कि ब्रह्मविद्यामें देवादिका अधिकार
है और शूद्रका अधिकार नहीं है। अब इस विषयको यहीं समाप्त करके

प्रकरण चलता रहा। वहाँ यह बताया गया कि 'दहर' शब्द परब्रह्म परमात्मा-

Page 95Permalink

७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
पुनः पूर्वोक्त अङ्गुष्ठमात्र पुरुषके स्वरूपपर विचार किया जाता है—
कम्पनात् ॥ १ । ३ । ३९ ॥
( पूर्वोक्त अङ्गुष्ठमात्र पुरुष परब्रह्म परमात्मा ही है; ) कम्पनात्=क्योंकि
उसीमे सम्पूर्ण जगत् चेष्टा करता है और उसीके भयसे सब काँपते हैं।
व्याख्या—कठोपनिषद्के दूसरे अध्यायमे प्रथम वल्लीसे लेकर तृतीय वल्ली-
तक अङ्गुष्ठमात्र पुरुषका प्रकरण आया है। ( देखिये २ । १ । १२, १३ तथा
२ । ३ । १७ के मन्त्र ) । वहाँ अङ्गुष्ठमात्र पुरुषके रूपमें वर्णित उस परम
पुरुष परमात्माके प्रभावका वर्णन करते हुए यह बात कही गयी है कि—
यदिदं किं च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम् ।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥
( क० उ० २ । ३ । २ )
'उस परमात्मासे निकला हुआ यह जो कुछ भी सम्पूर्ण जगत् है,
वह उस प्राणस्वरूप ब्रह्ममे ही चेष्टा करता है, उस उठे हुए वज्रके समान महान्
भयानक सर्वशक्तिमान् परमेश्वरको जो जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं।' तथा—
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः ।
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥
( क० उ० २ । ३ । ३ )
'इसीके भयसे अग्नि तपता है, इसीके भयसे सूर्य तपता है, इसीके भयसे
इन्द्र, वायु तथा पाँचवें मृत्यु देवता—ये सब अपने-अपने कार्यमे दौड़ रहे हैं।'
इस वर्णनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि अङ्गुष्ठमात्र पुरुष ब्रह्म ही है;
क्योंकि सम्पूर्ण जगत् जिसमे चेष्टा करता है अथवा जिसके भयसे कम्पित होकर
सब देवता अपने-अपने कार्यम् संलग्न रहते हैं, वह न तो प्राणवायु हो सकता है
और न इन्द्र ही। वायु और इन्द्र तो स्वयं ही उसकी आज्ञाका पालन करनेके
लिये भयभीत रहते हैं। अतः यहाँ अङ्गुष्ठमात्र पुरुष ब्रह्म ही है, इसमे लेशमात्र
भी संशयके लिये स्थान नहीं है।
सम्बन्ध—इस पादके चौदहवें सूत्रसे लेकर तेईसवेंतक 'दहराकाश' का
प्रकरण चलता रहा। वहाँ यह बताया गया कि 'दहर' शब्द परब्रह्म परमात्मा-

सूत्र ३९-४० ] अध्याय १ ७५

Page 96Permalink

सूत्र ३९-४० ] अध्याय १ ७५
का वाचक है; फिर २४वें सूत्रसे कठोपनिषद्में वर्णित अङ्गुष्ठमात्र पुरुषके
स्वरूपपर विचार चल पड़ा; क्योंकि दहराकाशकी भाँति वह भी हृदयमें ही
स्थित बताया गया है। उसी प्रकरणमें देवादिके वेदविद्यामे अधिकार-सम्बन्धी
प्रासङ्गिक विषयपर विचार चल पड़ा और अड़तीसवें सूत्रमे वह प्रसङ्ग समाप्त
हुआ। फिर उनतालीसवें सूत्रमे पहलेके छोड़े हुए अङ्गुष्ठमात्र पुरुषके स्वरूपपर
विचार किया गया। इस प्रकार बीचमें आये हुए प्रसङ्गान्तरोंपर विचार करके
अब पुनः दहराकाशविषयक छूटे हुए प्रकरणपर विचार आरम्भ किया
जाता है—
ज्योतिर्दर्शनात् ॥ १ । ३ । ४० ॥
ज्योतिः = यहाँ 'ज्योति' शब्द परब्रह्मका ही वाचक है; दर्शनात् = क्योंकि
श्रुतिमे ( अनेक स्थलोपर ) ब्रह्मके अर्थमे 'ज्योतिः' शब्दका प्रयोग देखा जाता है।
व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद्के अन्तर्गत दहराकाशविषयक प्रकरणमे यह कहा
गया है कि 'य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन
रूपेणाभिनिष्पद्यते।' (८।३।४) अर्थात् 'यह जो संप्रसाद (जीवात्मा)
है, वह शरीरसे निकलकर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने स्वरूपसे सम्पन्न हो
जाता है।' इस वर्णनमे जो 'ज्योतिः' शब्द आया है, वह परब्रह्म परमात्माका
ही वाचक है; क्योंकि श्रुतिमे अनेक स्थलोपर ब्रह्मके अर्थमें 'ज्योतिः' शब्दका
प्रयोग देखा जाता है। उदाहरणके लिये यह श्रुति उद्धृत की जाती है—
'अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते।' (छा० उ० ३। १३।७) अर्थात्
'इस द्युलोकसे परे जो परम ज्योति प्रकाशित हो रही है।' इसमे 'ज्योतिः' पद
परमात्माके ही अर्थमे है; इसका निर्णय पहले भी किया जा चुका है। ऊपर
दी हुई (८।३।४) श्रुतिमे 'ज्योतिः' पदका 'परम्' विशेषण आया है;
इससे भी यही सिद्ध होता है कि परब्रह्मको ही यहाँ 'परम ज्योति' कहा गया है।
सम्बन्ध—उपर्युक्त सूत्रमें 'दहर'के प्रकरणमें आये हुए 'ज्योतिः' पदको
परब्रह्मका वाचक बताकर उस प्रसङ्गको वहीं समाप्त कर दिया गया। अब यह
जिज्ञासा होती है कि 'दहराकाश'के प्रकरणमें आया हुआ 'आकाश' शब्द
परब्रह्मका वाचक हो, परन्तु छा० उ० (८।१४।१) मे जो 'आकाश' शब्द आया है,
वह किस अर्थमे है? अतः इसका निर्णय करनेके लिये आगेका सूत्र प्रारम्भ करते हैं--