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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

सूत्र १४-१६ ] अध्याय १ ५७

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सूत्र १४-१६ ] अध्याय १ ५७
३ । २) अर्थात् 'ये जीव-समुदाय प्रतिदिन सुषुप्तिकालमे इस ब्रह्मलोकको जाते हैं,
परन्तु असत्यसे आवृत रहनेके कारण उसे जानते नहीं हैं।' इस वाक्यमें
प्रतिदिन ब्रह्मलोकमे जानेके लिये कहना, तो गतिका वर्णन है और उस 'दहर'को
ब्रह्मलोक कहना उसका वाचक शब्द है । इन दोनो कारणोसे यह सिद्ध
होता है कि यहाँ 'दहर' शब्द ब्रह्मका ही बोधक है ।
इसके सिवा दूसरी जगह (६ । ८ । १ मे) भी ऐसा ही वर्णन
पाया जाता है--यथा--'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति ।' अर्थात्
'हे सोम्य ! उस सुषुप्त-अवस्थामें जीव 'सत्' नामसे कहे जानेवाले
परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होता है।' इत्यादि । तथा आगे बताये गये
अमृत, अभय आदि लक्षण भी ब्रह्ममे ही सुसंगत होते हैं । इन दोनो
कारणोंसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'दहर' नामसे परब्रह्म परमात्माका
ही वर्णन है।
सम्बन्ध-उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये दूसरा कारण बताते हैं—
धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ॥ १ । ३ । १६ ॥
धृतेः = इस 'दहर' मे समस्त लोकोको धारण करनेकी शक्ति बतायी
जानेके कारण; च=भी; (यह परब्रह्मका ही वाचक है) क्योकि अस्य =
इसकी; महिम्नः = (समस्त लोकोको धारण करनेकी सामर्थ्यरूप) महिमाका;
अस्मिन् = इस परब्रह्म परमात्मामे होना; उपलब्धेः = अन्य श्रुतियोंमे भी पाया
जाता है, इसलिये ( 'दहर' नामसे ब्रह्मका वर्णन मानना सर्वथा उचित है) ।
व्याख्या-छान्दोग्य (८ । ४ । १) में कहा गया है कि 'अथ य आत्मा स
सेतुर्विधृतिरेषां लोकानाम् ।' अर्थात् 'यह जो आत्मा है, वही इन सब लोकोको
धारण करनेवाला सेतु है।' इस प्रकार यहाँ उस 'दहर' शब्दवाच्य आत्मामे समस्त
लोकोको धारण करनेकी शक्तिका वर्णन होनेके कारण 'दहर' यहाँ परमात्माका
ही वाचक है; क्योकि दूसरी श्रुतियोंमे भी परमेश्वरमे ऐसी महिमा होनेका वर्णन
इस प्रकार उपलब्ध होता है—'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ
विधृतौ तिष्ठतः ।' (बृह० उ० ३ । ८ । ९) अर्थात् 'हे गार्गि ! इस अक्षर'
परमात्माके ही शासनमे रहकर सूर्य और चन्द्रमा भलीभाँति धारण किये हुए स्थित

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हैं।' इत्यादि। इसके सिवा यह भी कहा है कि 'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष
भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय ।' ( बृह० उ० ४ । ४ । २२ )
अर्थात् 'यह सबका ईश्वर है, यह सम्पूर्ण प्राणियोंका स्वामी है, यह सब
भूतोंका पालन-पोषण करनेवाला है, तथा यह इन समस्त लोकोंको विनाशसे
बचानेके लिये उनको धारण करनेवाला सेतु है ।' परब्रह्मके अतिरिक्त अन्य
कोई भी इन सम्पूर्ण लोकोंको धारण करनेमे समर्थ नहीं हो सकता; इसलिये
यहाँ 'दहर' नामसे परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है।
सम्बन्ध-अब दूसरा हेतु देकर उसी बातकी पुष्टि करते हैं-
प्रसिद्धेश्च ॥ १ । ३ । १७ ॥
प्रसिद्धेः=आकाश शब्द परमात्माके अर्थमे प्रसिद्ध है । इस कारण; च=
भी ( 'दहर' नाम परब्रह्मका ही है ) ।
व्याख्या-श्रुतिमे 'दहराकाश' नाम आया है । आकाश शब्द परमात्माके
अर्थमे प्रसिद्ध है। यथा-'को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न
स्यात् ।' ( तै० उ० २ । ७ । १ ) अर्थात् 'यदि यह आनन्दस्वरूप आकाश सबको
( अवकाश देनेवाला परमात्मा ) न होता तो कौन जीवित रह सकता ? कौन
प्राणोंकी क्रिया कर सकता ?" तथा-'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव
समुत्पद्यन्ते ।' ( छा० उ० १ । ९ । १) । अर्थात् 'निश्चय ही ये सब
प्राणी आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं ।' इसलिये भी 'दहर' शब्द परब्रह्म
परमात्माका ही वाचक है ।
सम्बन्ध-अब 'दहर' शब्दसे जीवात्माका ग्रहण क्यों न किया जाय-यह
शङ्का उठाकर समाधान करते हैं-
इतरपरामर्शात् स इति चेन्नासंभवात् ॥ १ । ३ । १८ ॥
चेत्=यदि कहो; इतरपरामर्शात्=दूसरे अर्थात् जीवात्माका सङ्केत होनेके
कारण; सः=वही 'दहर' नामसे कहा गया है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक
नहीं है; असंभावात्=क्योंकि वहाँ कहे हुए लक्षण जीवात्मामे सम्भव नहीं है ।
व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् ( ८ । १ । ५ ) मे इस प्रकार वर्णन आया है-
'स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन्