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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

सूत्रकार कहते हैं—

Page 169Permalink

१४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
अनुस्मृतेः = पहलेके अनुभवोंका बारम्बार स्मरण होता है, ( इसलिये अनुभव
करनेवाला आत्मा क्षणिक नहीं है ) इस युक्तिसे; च = भी ( बौद्धमत असङ्गत
सिद्ध होता है ) ।
व्याख्या-सभी मनुष्योंको अपने पहले किये हुए अनुभवोंका बारम्बार स्मरण
होता है। जैसे 'मैंने अमुक दिन अमुक ग्राममें अमुक वस्तु देखी थी, मै बालक-
पनमें अमुक खेल खेला करता था। मैंने आजसे बीस वर्ष पहले जिसे देखा था,
वही यह है।' इत्यादि। इस प्रकार पूर्व अनुभवोंका जो बारम्बार स्मरण होता है,
उसे 'अनुस्मृति' कहते हैं। यह तभी हो सकती है, जब कि अनुभव करनेवाला
आत्मा नित्य माना जाय। उसे क्षणिक माननेसे यह स्मरण नहीं बन सकता;
क्योकि एक क्षण पहले जो अनुभव करनेवाला था, वह दूसरे क्षणमें नहीं रहता।
बहुत वर्षोंमे तो असंख्य क्षणोंके भीतर असंख्य बार आत्माका परिवर्तन हो जायगा।
अतः उक्त अनुस्मृति होनेके कारण यही सिद्ध होता है कि आत्मा क्षणिक नहीं,
किन्तु नित्य है। इसीलिये बौद्धोंका क्षणिकवाद सर्वथा अनुपपन्न है।
सम्बन्ध-बौद्धोंका यह कथन है कि 'जब बोया हुआ बीज स्वयं नष्ट होता
है, तभी उससे अङ्कुर उत्पन्न होता है। दूधको मिटाकर दही बनता है; इसी
प्रकार कारण स्वयं नष्ट होकर ही कार्य उत्पन्न करता है।' इस तरह अभावसे
ही भावकी उत्पत्ति होती है। उनकी इस धारणाका खण्डन करनेके लिये
सूत्रकार कहते हैं—
नासतोऽदृष्टत्वात् ॥ २ । २ । २६ ॥
असतः = असत्‌से ( कार्यकी उत्पत्ति ); न = नहीं हो सकती; अदृष्टत्वात् =
क्योकि ऐसा देखा नहीं गया है।
व्याख्या-खरगोशके सींग, आकाशके फूल और वन्ध्या-पुत्र आदि केवल
वाणीसे ही कहे जाते हैं, वास्तवमें हैं नहीं; तथा आकाशमे नीलापन और तिरविरे
आदि बिना हुए ही प्रतीत होते हैं; ऐसे असत् पदार्थोंसे किसी कार्यकी उत्पत्ति
या सिद्धि नहीं देखी जाती है। उनसे विपरीत जो मिट्टी, जल आदि सत् पदार्थ
हैं, उनसे घट और बर्फ आदि कार्योंकी उत्पत्ति प्रत्यक्ष देखी जाती है। इससे
यही सिद्ध होता है कि जो वास्तवमे नहीं है, केवल वाणीसे जिसका कथनमात्र
होता है, अथवा जो बिना हुए ही प्रतीत हो रहा है, उससे कार्यकी उत्पत्ति नहीं