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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

सूत्र २३—२५ ] अध्याय ३ ३१५

Page 336Permalink

सूत्र २३—२५ ] अध्याय ३ ३१५
तथा चैकवाक्यतोपबन्धात् ॥ ३ । ४ । २४ ॥
तथा च=इस प्रकार उन आख्यायिकाओको पारिप्लवार्थक न मानकर
विद्याका ही अङ्ग मानना चाहिये; एकवाक्यतोपबन्धात्=क्योंकि इन उपाख्यानो-
की वहाँ कही हुई विद्याओके साथ एकवाक्यता देखी जाती है ।
व्याख्या-इस प्रकार उन कथाओको पारिप्लवकर्मका अङ्ग न मानकर वहाँ
कही हुई विद्याओका ही अङ्ग मानना उचित है; क्योंकि सन्निकट होनेसे इन
विद्याओंके साथ ही इनका सम्बन्ध हो सकता है । विद्यामे रुचि उत्पन्न करने
तथा परब्रह्मके स्वरूपका तत्त्व सरलतासे समझानेके लिये ही इन कथाओका उपयोग
किया गया है । इस प्रकार इनका उन प्रकरणोमे वर्णित विद्याओके साथ एक-
वाक्यतारूप सम्बन्ध है, इसलिये ये सब आख्यान ब्रह्मविद्याके ही अङ्ग है, कर्मोंके
नहीं; ऐसा मानना ही ठीक है ।
सम्बन्ध-यहाँतक यह बात सिद्ध की गयी कि ब्रह्मविद्या यज्ञादि कर्मोंका अङ्ग
नहीं है तथा वह स्वयं बिना किसीकी सहायताके परमपुरुषार्थको सिद्ध करनेमें
समर्थ है। अब पुनः इसीका समर्थन करते हुए इस प्रकरणके अन्तमे कहते हैं—
अतएव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ॥ ३ । ४ । २५ ॥
च=तथा; अतएव=इसीलिये; अग्नीन्धनाद्यनपेक्षा=इस ब्रह्मविद्यारूप
यज्ञमें अग्नि, समिधा, घृत आदि पदार्थोंकी आवश्यकता नहीं है ।
व्याख्या-यह ब्रह्मविद्यारूप यज्ञ अपना ध्येय सिद्ध करनेमे सर्वथा समर्थ है।
यह पूर्ण होते ही स्वयं परमात्माका साक्षात्कार करा देता है । इसीलिये इस
यज्ञमे अग्नि, समिधा, घृत आदि भिन्न-भिन्न पदार्थोंका विधान न करके केवल-
मात्र एक परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका ही प्रतिपादन किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीतामें
भी भगवान् श्रीकृष्णने इस बातका समर्थन इस प्रकार किया है—
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ (४।२४)
'उस ब्रह्मचिन्तनरूप यज्ञमे भिन्न-भिन्न उपकरण और सामग्री आवश्यक
नहीं होती, किन्तु उसमे तो स्रुवा भी ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप अग्निमे
ब्रह्मरूप होताद्वारा ब्रह्मरूप हवनक्रिया की जाती है, उस ब्रह्मचिन्तनरूप कर्ममे