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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

सूत्र २७-२८ ] अध्याय १ ४३

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सूत्र २७-२८ ] अध्याय १ ४३
सम्बन्ध—इस प्रसङ्गमें पृथक्-पृथक् उपास्यरूपसे आये हुए 'दिव्', 'आदित्य',
'वायु,' 'आकाश', 'जल' तथा 'पृथिवी' भी वैश्वानर नहीं है; यह सिद्ध
करनेके लिये कहते हैं—
अत एव न देवता भूतं च ॥ १ । २ । २७ ॥
अतः=उपर्युक्त कारणोंसे; एव=ही ( यह भी सिद्ध होता है कि );
देवता=द्यौ, सूर्य आदि लोकोंके अधिष्ठाता देवगण; च=और; भूतम्=आकाश
आदि भूतसमुदाय ( भी ); न=वैश्वानर नहीं है।
व्याख्या—उक्त प्रकरणमे 'द्यौ' 'सूर्य' आदि लोकोकी तथा आकाश, वायु
आदि भूतसमुदायकी अपने आत्माके रूपमे उपासना करनेका प्रसङ्ग आया है।
इसलिये सूत्रकार स्पष्ट कर देते हैं कि पूर्वसूत्रमे बताये हुए कारणोसे यह भी
समझ लेना चाहिये कि उन-उन लोकोके अभिमानी देवताओ तथा आकाश
आदि भूतोंका भी 'वैश्वानर' शब्दसे ग्रहण नहीं है; क्योकि समस्त ब्रह्माण्डको
वैश्वानरका शरीर बताया गया है। यह कथन न तो देवताओके लिये सम्भव हो
सकता है और न भूतोके लिये ही। इसलिये यही मानना चाहिये कि 'जो
विश्वरूप भी है और नर ( पुरुष ) भी, वह वैश्वानर है।' इस व्युत्पत्तिके
अनुसार परब्रह्म परमेश्वरको ही वैश्वानर कहा गया है।
सम्बन्ध—पहले २६वें सूत्रमें यह बात बतायी गयी है कि शतपथब्राह्मणके
मन्त्रमे जो वैश्वानर अग्निको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्मदृष्टि
करानेके उद्देश्यसे है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शालग्राम-शिलामें विष्णुकी
उपासनाके सदृश यहाँ 'वैश्वानर' नामक जठराग्निमें परमेश्वरकी प्रतीकोपासना
बतलानेके लिये 'वैश्वानर' नामसे उस परब्रह्मका वर्णन है; अतः इसपर सूत्रकार
आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं—
साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ॥ १ । २ । २८ ॥
साक्षात्='वैश्वानर' शब्दको साक्षात् परब्रह्मका वाचक माननेमे; अपि=भी;
अविरोधम्=कोई विरोध नहीं है, ऐसा; जैमिनिः ( आह )=आचार्य जैमिनि
कहते हैं।
व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कथन है कि वैश्वानर शब्दको साक्षात् विश्वरूप
३*

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४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
परमात्माका वाचक माननेमे कोई विरोध नहीं है । अतः यहाँ जठराग्निको प्रतीक
मानकर उसके रूपमे परमात्माकी उपासना माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है ।
सम्बन्ध-उपर्युक्त सूत्रोंद्वारा यह बात सिद्ध की गयी कि 'वैश्वानर' नामसे
इस प्रकरणमें परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन किया गया है । परन्तु निर्विकार
निराकार अव्यक्त परब्रह्म परमात्माको इस प्रकार साकार विराट्‌रूपमें देशविशेषसे
सम्बद्ध बतलाना किस अभिप्रायसे है ? निर्गुण निराकारको सगुण साकार बताना
विरुद्ध-सा प्रतीत होता है । इसपर २९ वें सूत्रसे ३१ वें तक विभिन्न आचार्यों-
का मत बताते हुए अन्तमें ३२ वें सूत्रमें अपना सिद्धान्त कहकर सूत्रकार इस
दूसरे पादको समाप्त करते हैं—
अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः ॥ १ । २ । २९ ॥
अभिव्यक्तेः= (भक्तोपर अनुग्रह करनेके लिये) देश-विशेषमे ब्रह्मका
प्राकट्य होता है, इसलिये; (अविरोधः= ) कोई विरोध नहीं है; इति=ऐसा;
आश्मरथ्यः=आश्मरथ्य आचार्य मानते हैं ।
व्याख्या—आश्मरथ्य आचार्यका कहना है कि भक्तजनोपर अनुग्रह करके
उन्हें दर्शन देनेके लिये भगवान् समय-समयपर उनकी श्रद्धाके अनुसार
नाना रूपोमे प्रकट होते हैं; तथा अपने भक्तोको दर्शन, स्पर्श और प्रेमालाप
आदिके द्वारा सुख पहुँचाने, उनका उद्धार करने और जगत्‌मे अपनी कीर्ति
फैलाकर उसके कथन-मननद्वारा साधकोको परम लाभ पहुँचानेके लिये भगवान्
मनुष्य आदिके रूपमे भी समय-समयपर प्रकट होते हैं । यह बात उपनिषद्
(केन० ३।२), गीता (४।६-९) और अन्यान्य सद्ग्रन्थोसे भी
प्रमाणित है । इस कारण विराट्‌रूपमे उस परब्रह्म परमात्माको सगुण-साकार
तथा देश-विशेषसे सम्बद्ध माननेमे कोई विरोध नहीं है; क्योकि वह सर्वसमर्थ
भगवान् देश-कालातीत और देशकालसे सम्बन्ध रखनेवाला भी है। वह जिस प्रकार
निर्गुण-निराकार है, उसी प्रकार सगुण-साकार भी है । यह बात माण्डूक्यो-
पनिषद्‌में परब्रह्म परमात्माके चार पादोका वर्णन करके भलीभाँति समझायी गयी है ।
सम्बन्ध—अब इस विषयमे बादरि आचार्यका मत उपस्थित करते हैं—
अनुस्मृतेर्बादरिः ॥ १ । २ । ३० ॥