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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

सूत्र १—४ ] अध्याय ४ ३४९

Page 370Permalink

सूत्र १—४ ] अध्याय ४ ३४९
ऐसा जीवात्मा मनमे स्थित हुई इन्द्रियोके सहित पुनर्जन्मको प्राप्त होता है।'
( प्र० उ० ३ । ९) इस प्रकार श्रुतिमे किसी एक इन्द्रियका मनमे स्थित होना न
कहकर समस्त इन्द्रियोकी मनमे स्थिति बतायी गयी है तथा सभी इन्द्रियोके
कर्मोंका बंद होना प्रत्यक्ष भी देखा जाता है। अतः पूर्वोक्त दोनो प्रमाणोंसे ही
यह भी सिद्ध हो जाता है कि वाक्-इन्द्रियके साथ-साथ अन्य इन्द्रियाँ भी 'मनमे
स्थित हो जाती है।
सम्बन्ध—उसके बाद क्या होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं--
तन्मनः प्राण उत्तरात् ॥ ४ । २ । ३ ॥
उत्तरात्=उसके बादके कथनसे ( यह स्पष्ट है कि ), तत्=वह ( इन्द्रियोके
सहित ); मनः=मन; प्राणे=प्राणमे ( स्थित हो जाता है ) ।
व्याख्या—पूर्वोक्त श्रुतिमे जो दूसरा वाक्य है, 'मनः प्राणे' ( छा० उ० ६ ।
८ । ६ ) उसमे यह भी स्पष्ट है कि वह मन इन्द्रियोंके साथ ही प्राणमे स्थित
हो जाता है।
सम्बन्ध—उसके बाद क्या होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
सोऽध्यक्षे तदुपगमादिभ्यः ॥ ४ । २ । ४ ॥
तदुपगमादिभ्यः=उस जीवात्माके गमन आदिके वर्णनसे यह सिद्ध होता
है कि; सः=वह प्राण, मन और इन्द्रियोंके साथ; अध्यक्षे=अपने स्वामी जीवात्मामें
( स्थित हो जाता है ) ।
व्याख्या—बृहदारण्यकमे कहा है कि 'उस समय यह आत्मा नेत्रसे या
ब्रह्मरन्ध्रसे अथवा शरीरके अन्य किसी मार्गद्वारा शरीरसे बाहर निकलता है,
उसके निकलनेपर उसीके साथ प्राण भी निकलता है और प्राणके निकलनेपर
उसके साथ सब इन्द्रियाँ निकलती है।' ( बृह० उ० ४ । ४ । २ )। श्रुतिके
इस गमनविषयक वाक्यसे यह सिद्ध हो जाता है कि इन्द्रिय और मनसहित प्राण
अपने स्वामी जीवात्मामें स्थित होता है। यद्यपि पूर्व श्रुतिमे प्राणका तेजमें स्थित
होना कहा है, किन्तु बिना जीवात्माके केवल प्राण और मनसहित इन्द्रियोंका
गमन सम्भव नहीं; इसलिये दूसरी श्रुतिमे कहे हुए जीवात्माको भी यहाँ सम्मिलित
कर लेना उचित है।