ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
हैं।' इत्यादि। इसके सिवा यह भी कहा है कि 'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष
भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय ।' ( बृह० उ० ४ । ४ । २२ )
अर्थात् 'यह सबका ईश्वर है, यह सम्पूर्ण प्राणियोंका स्वामी है, यह सब
भूतोंका पालन-पोषण करनेवाला है, तथा यह इन समस्त लोकोंको विनाशसे
बचानेके लिये उनको धारण करनेवाला सेतु है ।' परब्रह्मके अतिरिक्त अन्य
कोई भी इन सम्पूर्ण लोकोंको धारण करनेमे समर्थ नहीं हो सकता; इसलिये
यहाँ 'दहर' नामसे परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है।
सम्बन्ध-अब दूसरा हेतु देकर उसी बातकी पुष्टि करते हैं-
प्रसिद्धेश्च ॥ १ । ३ । १७ ॥
प्रसिद्धेः=आकाश शब्द परमात्माके अर्थमे प्रसिद्ध है । इस कारण; च=
भी ( 'दहर' नाम परब्रह्मका ही है ) ।
व्याख्या-श्रुतिमे 'दहराकाश' नाम आया है । आकाश शब्द परमात्माके
अर्थमे प्रसिद्ध है। यथा-'को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न
स्यात् ।' ( तै० उ० २ । ७ । १ ) अर्थात् 'यदि यह आनन्दस्वरूप आकाश सबको
( अवकाश देनेवाला परमात्मा ) न होता तो कौन जीवित रह सकता ? कौन
प्राणोंकी क्रिया कर सकता ?" तथा-'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव
समुत्पद्यन्ते ।' ( छा० उ० १ । ९ । १) । अर्थात् 'निश्चय ही ये सब
प्राणी आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं ।' इसलिये भी 'दहर' शब्द परब्रह्म
परमात्माका ही वाचक है ।
सम्बन्ध-अब 'दहर' शब्दसे जीवात्माका ग्रहण क्यों न किया जाय-यह
शङ्का उठाकर समाधान करते हैं-
इतरपरामर्शात् स इति चेन्नासंभवात् ॥ १ । ३ । १८ ॥
चेत्=यदि कहो; इतरपरामर्शात्=दूसरे अर्थात् जीवात्माका सङ्केत होनेके
कारण; सः=वही 'दहर' नामसे कहा गया है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक
नहीं है; असंभावात्=क्योंकि वहाँ कहे हुए लक्षण जीवात्मामे सम्भव नहीं है ।
व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् ( ८ । १ । ५ ) मे इस प्रकार वर्णन आया है-
'स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन्