ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र २७-२८ ] अध्याय १ ६५
सिद्ध होगी और इसीलिये वेदको भी नित्य एवं प्रमाणभूत नहीं माना जा
सकेगा; इस विरोधका परिहार कैसे हो ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—
शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ १ । ३ । २८ ॥
चेत्=यदि कहो; शब्दे=( देवताको शरीरधारी माननेपर ) वैदिक शब्दमे
विरोध आता है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; अतः प्रभवात्=क्योंकि
इस वेदोक्त शब्दसे ही देवता आदि जगत्की उत्पत्ति होती है; प्रत्यक्षानु-
मानाभ्याम्=यह बात प्रत्यक्ष ( वेद ) और अनुमान ( स्मृति ) दोनो प्रमाणोंसे
सिद्ध होती है।
व्याख्या—"देवताओमे अनेक शरीर धारण करनेकी शक्ति मान लेनेसे
कर्ममे विरोध नहीं आता, यह तो ठीक है; परन्तु ऐसा माननेसे जो वेदोक्त
शब्दोंको नित्य एवं प्रमाणभूत माना जाता है, उसमे विरोध आवेगा; क्योकि
शरीरधारी होनेपर देवताओको भी जन्म-मरणशील मानना पड़ेगा। ऐसी दशामे
वे नित्य नहीं होंगे तथा नित्य वैदिक शब्दोके साथ उनके नाम-रूपोका नित्य
सम्बन्ध भी नहीं रह सकेगा।" ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योकि जहाँ
कल्पके आदिमे देवादिकी उत्पत्तिका वर्णन आता है, वहाँ यह बताया गया है
कि 'किस रूप और ऐश्वर्यवाले देवताका क्या नाम होगा।' इस प्रकार वेदोक्त
शब्दसे ही उनके नाम, रूप और ऐश्वर्य आदिकी कल्पना की जाती है अर्थात्
पूर्वकल्पमे जितने देवता, जिस-जिस नाम, रूप तथा ऐश्वर्यवाले थे, वर्तमान
कल्पमें भी उतने ही देवता वैसे ही नाम, रूप और ऐश्वर्यसे युक्त उत्पन्न किये
जाते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि कल्पान्तरमे देवता आदिके जीव तो
बदल जाते हैं, परन्तु नाम-रूप पूर्वकल्पके अनुसार ही रहते हैं। यह बात
प्रत्यक्ष ( श्रुति ) और अनुमान ( स्मृति ) के प्रमाणसे भी सिद्ध है। श्रुतियो
और स्मृतियोमे उपर्युक्त बातका वर्णन इस प्रकार आता है—'स भूरिति
व्याहरत् स भूमिमसृजत' 'स भुवरिति व्याहरत् सोऽन्तरिक्षमसृजत।' ( तै० ब्रा० २ ।
२ । ४ । २ ) 'उसने मन-ही-मन 'भूः' का उच्चारण किया, फिर भूमिकी
सृष्टि की।' 'उसने मनमे 'भुवः' का उच्चारण किया, फिर अन्तरिक्षकी सृष्टि
की।' इत्यादि। इस वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि प्रजापतिने पहले वाचक
शब्दका स्मरण करके उसके अर्थभूत स्वरूपका निर्माण किया। इसी प्रकार
स्मृतिमे भी कहा है—
वे० द० ५—