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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

सूत्र १८-१९ ] अध्याय ४ ३४७

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सूत्र १८-१९ ] अध्याय ४ ३४७
यदेव विद्ययेति हि ॥ ४ । १ । १८ ॥
यत्=जो; एव=भी; विद्यया=विद्याके सहित ( किया जाता है ); इति=
इस प्रकार कथन करनेवाली श्रुति है; हि=इसलिये ( विद्या कर्मोंका अङ्ग किसी
जगह हो सकती है ) ।
व्याख्या-श्रुतिमे कहा है कि 'जो कर्म विद्या, श्रद्धा और रहस्यज्ञानके
सहित किया जाता है. वह अधिक सामर्थ्यसम्पन्न हो जाता है।' ( छा० उ०
१ । १ । १० ) यह श्रुति कर्मोंके अङ्गभूत उद्गीथ आदिकी उपासनाके
प्रकरणकी है, इसलिये इसका सम्बन्ध वैसी ही उपासनाओसे है । तथा यह
विद्या भी ब्रह्मविद्या नहीं है । अत. ज्ञानीसे या परमात्माकी प्राप्तिके लिये अभ्यास
करनेवाले अन्य उपासकोंसे इस श्रुतिका सम्बन्ध नहीं है । इसलिये यह सिद्ध
होता है कि उस प्रकारकी उपासनामे कही हुई विद्या ही उन कर्मोंका अङ्ग हो
सकती है, ब्रह्मविद्या नहीं ।
सम्बन्ध-ज्ञानीके प्रारब्ध-कर्मोंका नाश कैसे होता है ? इस जिज्ञासापर
कहते हैं-
भोगेन त्वितरे क्षपयित्वा संपद्यते ॥ ४ । १ । १९ ॥
इतरे=सञ्चित और क्रियमाणके सिवा दूसरे प्रारब्धरूप शुभाशुभ कर्मोंको;
तु=तो; भोगेन=उपभोगके द्वारा; क्षपयित्वा=क्षीण करके; संपद्यते=( वह
ज्ञानी ) परमात्माको प्राप्त हो जाता है ।
व्याख्या-ऊपर कहा जा चुका है कि विद्वानके पूर्वकृत सञ्चित
कर्म तो भस्म हो जाते हैं और क्रियमाण कर्मोंसे उसका सम्बन्ध नहीं होता; शेष
रहे शुभाशुभ प्रारब्ध कर्म, उन दोनोंका उपभोगके द्वारा नाश करके ज्ञानी पुरुष
परम पदको प्राप्त हो जाता है, यह बात श्रुतिमें कही गयी है ( छा० उ० ६ ।
१४ । २ ) ।
पहला पाद सम्पूर्ण ।

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दूसरा पाद
पहले पादमें उपासनाविषयक निर्णय करके जिन जीवन्मुक्त महापुरुषोंका
ब्रह्मलोकादिमें गमन नहीं होता, उनको किस प्रकार परमात्माकी प्राप्ति होती है,
इस विषयपर विचार किया गया। अब इस दूसरे पादमें, जो ब्रह्मविद्याके उपासक
ब्रह्मलोकमें जाते हैं, उनकी गतिका प्रकार बताया जाता है। साधारण मनुष्यों-
की और ब्रह्मविद्याके उपासककी गतिमें कहाँतक समानता है, यह स्पष्ट करनेके
लिये पहले साधारण गतिके वर्णनसे प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
वाङ्मनसि दर्शनाच्छब्दाच्च ॥ ४ । २ । १ ॥
वाक्=वाणी; मनसि=मनमे स्थित हो जाती है; दर्शनात्=प्रत्यक्ष देखनेसे;
च=और; शब्दात्=वेद-वाणीसे भी यह बात सिद्ध होती है।
व्याख्या—श्रुतिमे यह कहा गया है कि—'अस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो
वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम्।' 'इस
मनुष्यके मरकर एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जाते समय वाणी मनमे स्थित होती है,
मन प्राणमे और प्राण तेजमे तथा तेज परदेवतामे स्थित होता है।' (छा० उ०
६ । ८ । ६) इस वाक्यमे जो वाणीका मनमे स्थित होना कहा गया है, वह
वाक्-इन्द्रियका ही स्थित होना है, केवल उसकी वृत्तिमात्रका नहीं; क्योंकि यह
प्रत्यक्ष देखा जाता है कि मरणासन्न मनुष्यमे मन विद्यमान रहते हुए ही वाक्-इन्द्रिय-
का कार्य बंद हो जाता है तथा श्रुतिमे तो स्पष्ट शब्दोंमें यह बात कही ही है।
सम्बन्ध—'वाणी मनमें स्थित हो जाती है', यह कहनेके बाद वहाँ अन्य
इन्द्रियोंके विषयमें कुछ नहीं कहा गया। केवल मनकी प्राणमे स्थिति बतायी
गयी, अतः अन्य इन्द्रियोंके विषयमें क्या समझना चाहिये ? इसपर कहते हैं—
अत एव च सर्वाण्यनु ॥ ४ । २ । २ ॥
अत एव=इसीसे; च=यह भी (समझ लेना चाहिये कि); अनु=उनके
साथ-साथ; सर्वाणि=समस्त इन्द्रियाँ (मनमें स्थित हो जाती हैं)।
व्याख्या—प्रश्नोपनिषद्मे कहा है कि—'तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भव-
मिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः।' 'अर्थात् जिसके शरीरकी गरमी शान्त हो चुकी है,