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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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Page 80

सूत्र १७—१९ ] अध्याय १ ५९
कामाः समाहिता एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः
सत्यकामः सत्यसङ्कल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा
भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ।'
अर्थात् '( शिष्योंके पूछनेपर ) आचार्य इस प्रकार कहे कि 'इस
( देह ) की जरावस्थासे यह जीर्ण नहीं होता, इसके वधसे इसका नाश
नहीं होता । यह ब्रह्मपुर सत्य है । इसमे सम्पूर्ण कामनाएँ सम्यक् प्रकारसे स्थित
हैं । यह आत्मा पुण्य-पापसे रहित, जरा-मृत्युसे शून्य, शोकहीन, भूख-प्याससे
रहित, सत्यकाम तथा सत्यसङ्कल्प है । जैसे इस लोकमे प्रजा यदि राजाकी
आज्ञाका अनुसरण करती है तो वह जिस-जिस वस्तुकी कामना तथा जिस-जिस
जनपद एवं क्षेत्रभागकी अभिलाषा करती है, उसी-उसीको पाकर सुखपूर्वक
जीवन धारण करती है ।' इस मन्त्रके अनुसार 'देहकी जरावस्थासे यह जीर्ण नहीं
होता और इसके वधसे इसका नाश नहीं होता'—इस कथनसे जीवात्माको लक्ष्य
करनेवाला संकेत मिलता है । क्योंकि इसके आगेवाले मन्त्रमे कर्मफलकी
अनित्यता बतायी गयी है, और कर्मफल-भोगका सम्बन्ध जीवात्मासे ही है । इस
प्रकार जीवात्माको लक्ष्य करनेवाला संकेत होनेके कारण यहाँ 'दहर' नामसे
'जीवात्मा'का ही प्रतिपादन है, ऐसा कहा जाय तो यह ठीक नहीं है; क्योकि
पूर्वोक्त मन्त्रमें ही जो 'सत्यसङ्कल्प' आदि लक्षण बताये गये हैं, वे जीवात्मामे होने
सम्भव नहीं हैं, इसलिये यहाँ 'दहर' शब्दसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन हुआ
है, ऐसा मानना सर्वथा उचित है ।
सम्बन्ध—पूर्वोक्त मतकी ही पुष्टिके लिये पुनः शङ्का उठाकर उसका समाधान
करते हैं—
उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ॥ १ । ३ । १९ ॥
चेत् = यदि कहो; उत्तरात् = उसके बादवाले वर्णनसे भी 'दहर' शब्द
जीवात्माका ही बोधक सिद्ध होता है; तु = तो यह कथन ठीक नहीं है, ( क्योकि )
आविर्भूतस्वरूपः = उस मन्त्रमे जिसका वर्णन है, वह अपने शुद्धस्वरूपको
प्राप्त हुआ आत्मा है ।
व्याख्या—'छान्दोग्योपनिषद् ( ८ । ३ । ४ ) मे कहा है कि 'अथ
य एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत