ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextजाननेके लिये कहा है। वह एकदेशीय वर्णन होनेके कारण जीवपरक हो
सकता है। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त प्रकरणमें 'दहर' नामसे
कहा हुआ तत्त्व क्या है ? इसपर कहते हैं—
दहर उत्तरेभ्यः ॥ १ । ३ । १४ ॥
दहरः=उक्त प्रकरणमे 'दहर' शब्दसे जिस ज्ञेय तत्त्वका वर्णन किया गया
है, वह ब्रह्म ही है; उत्तरेभ्यः=क्योकि उसके पश्चात् आये हुए वचनोसे यही
सिद्ध होता है।
व्याख्या—छान्दोग्य ( ८ । १ । १ ) मे कहा है कि 'अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्म-
पुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्
वाव विजिज्ञासितव्यम् ।' अर्थात् 'इस ब्रह्मके नगररूप मनुष्य-शरीरमे कमलके
आकारवाला एक घर ( हृदय ) है, उसमे सूक्ष्म आकाश है। उसके भीतर
जो वस्तु है, उसको जाननेकी इच्छा करनी चाहिये।' इस वर्णनमे जिसे ज्ञातव्य बताया
गया है, वह 'दहर' शब्दका लक्ष्य परब्रह्म परमेश्वर ही है; क्योकि आगेके वर्णनमे इसीके
भीतर समस्त ब्रह्माण्डको निहित बताया है तथा उसके विषयमे यह भी कहा है
कि 'यह आत्मा, सब पापोसे रहित, जरामरणवर्जित, शोकशून्य, भूख-प्याससे
रहित, सत्यकाम तथा सत्यसंकल्प है। इत्यादि ( ८ । १ । ५ ) । तदनन्तर
आगे चलकर ( छा० उ० ८ । ३ । ४ मे ) कहा है कि 'यही आत्मा, अमृत,
अभय और ब्रह्म है । इसीका नाम सत्य है।' इससे यही सिद्ध होता है कि
यहाँ 'दहर' शब्द परब्रह्मका ही बोधक है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं—
गतिशब्दाभ्यां तथा दृष्टं लिङ्गं च ॥ १ । ३ । १५ ॥
गतिशब्दाभ्याम्=ब्रह्ममे गतिका वर्णन और ब्रह्मवाचक शब्द होनेसे;
तथा दृष्टम्=एवं दूसरी श्रुतियोमे ऐसा ही वर्णन देखा गया है; च=और;
लिङ्गम्=इस वर्णनमे आये हुए लक्षण भी ब्रह्मके हैं; इसलिये यहाँ 'दहर' नामसे
ब्रह्मका ही वर्णन हुआ है।
व्याख्या—इस प्रसङ्गमे यह बात कही गयी है कि—'इमाः सर्वाः प्रजा
अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥ ( छा० उ० ८।