अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.
The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.
The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.
उभा समुद्रौ रुच्या व्यापिथ देवो देवासि महिषः स्वर्जित्.. (३०)
हे सूर्य देव! तुम स्वर्ग में, अंतरिक्ष में, पृथ्वी पर तथा जल में दमकते हो. तुम अपने तेज
से पूर्व और पश्चिम सागरों को व्याप्त कर लेते हो. (३०)
अर्वाङ् परस्तात् प्रयतो व्यध्व आशुर्विपश्चित् पतयन् पतङ्गः.
विष्णुर्विचित्तः शवसाधितिष्ठन् प्र केतुना सहते विश्वमेजत्.. (३१)
दक्षिण की ओर जाते हुए सूर्य अपना मार्ग शीघ्र ही पूरा कर लेते हैं. ये व्यापक देव परम
ज्ञानी हैं. ये अपनी शक्ति से अधिष्ठित होते हैं. ये अपने ज्ञान के बल से समस्त विश्व को अपने
वश में कर लेते हैं. (३१)
चित्रश्चिकित्वान् महिषः सुपर्ण आरोचयन् रोदसी अन्तरिक्षम्.
अहोरात्रे परि सूर्यं वसाने प्रास्य विश्वा तिरतो वीर्याणि.. (३२)
महिमामय सूर्य ज्ञानवान एवं पूज्य हैं. सूर्य देव शोभन मार्ग से गमन करते हैं. सूर्य देव
आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष को दमकाते हुए दिवस और रात्रि को आश्रय देते हैं. सूर्य देव के
बल से ही सब पार होते हैं. (३२)
तिग्मो विभ्राजन् तन्वं १ शिशानो ऽ रंगमासः प्रवतो रराणः.
ज्योतिष्मान् पक्षी महिषो वयोधा विश्वा आस्थात् प्रदिशः कल्पमानः..
(३३)
सूर्य देव अपनी किरणें दमकाते हुए अपने शरीर को तपाते हैं. ये सुंदर गति वाले,
ज्योतिमान, महिमाशाली तथा अन्न को पुष्ट करने वाले हैं. (३३)
चित्रं देवानां केतुरनीकं ज्योतिष्मान् प्रदिशः सूर्य उद्यन्.
दिवाकरो ऽ ति द्युम्नैस्तमांसि विश्वातारीद् दुरितानि शुक्रः.. (३४)
देवताओं की ध्वजा रूप सूर्य सब के दर्शनीय हैं. ये उदय हो कर दिशाओं को प्रकाशित
करते हैं तथा सभी प्रकार के अंधकार को मिटाते हुए अपने प्रकाश से दिन को प्रकट करते हैं.
सूर्य देव पापों को दूर करते हैं. (३४)
चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः.
आप्राद् द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च.. (३५)
रश्मियों का प्रशंसनीय समूह मित्रावरुण के चक्षु के समान है. सूर्य देव भी प्राणियों के
आत्मा रूप हैं. सभी प्राणियों में प्रवेश करने वाले सूर्य, आकाश, अंतरिक्ष और पृथ्वी को
व्याप्त किए हुए हैं. (३५)
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उच्चा पतन्तमरुणं सुपर्णं मध्ये दिवस्तरणिं भ्राजमानम्.
पश्याम त्वा सवितारं यमाहुरजस्रं ज्योतिर्यदविन्ददत्रिः.. (३६)
ऊर्ध्वगामी, अरुण वर्ण वाले एवं शुभ गति वाले सूर्य के हम सदा तभी दर्शन करें, जब वे
आकाश में गमन कर रहे हों. (३६)
दिवस्पृष्ठे धावमानं सुपर्णमदित्याः पुत्रं नाथकाम उप यामि भीतः.
स नः सूर्य प्र तिर दीर्घमायुर्मा रिषाम सुमतौ ते स्याम.. (३७)
मैं भयभीत हो कर आकाश में द्रुत गमन करते हुए सूर्य की स्तुति करता हुआ उन का
आश्रय प्राप्त करता हूं. हे सूर्य! हम तुम्हारी शोभन कृपा दृष्टि में रहें तथा हिंसा को प्राप्त न
हों. तुम हमें दीर्घ जीवन प्रदान करो. (३७)
सहस्राह्ण्यं वियतावस्य पक्षौ हरेर्हंसस्य पततः स्वर्गम्.
स देवान्त्सर्वानुरस्युपदद्य संपश्यन् याति भुवनानि विश्वा.. (३८)
हम पापों के नाशक, सुंदर गमन वाले तथा स्वर्गगामी सूर्य देव के दोनों अर्थात् उत्तरायण
व दक्षिणायन तथा सहस्रों दिनों तक नियम में रहते हैं. ये सूर्य देव सभी देवों को अपने में लीन
कर के सभी भूतों अर्थात् प्राणियों को देखते हुए चलते हैं. (३८)
रोहितः कालो अभवद् रोहितो ऽ ग्रे प्रजापतिः.
रोहितो यज्ञानां मुखं रोहितः स्व १ राभरत्.. (३९)
रोहित काल में ये प्रजापति थे. ये यज्ञों के मूल रूप हैं तथा ये ही रोहित अब स्वर्ग का
पोषण करते हैं. (३९)
रोहितो लोको अभवद् रोहितो ऽ त्यतपद् दिवम्.
रोहितो रश्मिभिर्भूमिं समुद्रमनु सं चरत्.. (४०)
स्वर्ग में रहने वाले रोहित अपनी रश्मियों से सागर और पृथ्वी में विचरते हैं. ऐसे रोहित
दर्शन करने योग्य हैं. (४०)
सर्वा दिशः समचरद् रोहितो ऽ धिपतिर्दिवः.
दिवं समुद्रमाद् भूमिं सर्वं भूतं विरक्षति.. (४१)
स्वर्ग के अधिपति रोहित सब दिशाओं में भ्रमण करते तथा स्वर्ग सागर में जाते हैं. ये
सभी जीवों के साथसाथ पृथ्वी की रक्षा करते हैं. (४१)
आरोहंछुक्रो बृहतीरतन्द्रो द्वे रूपे कृणुते रोचमानः.
चित्रश्चिकित्वान् महिषो वातमाया यावतो लोकानभि यद् विभाति.. (४२)
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ये रोहित सूर्य रथ पर और अश्वों पर अपने दो रूप बनाते हैं. ये पूज्य महत्त्वशाली और
प्रकाशमान हैं. सुंदर गमन वाले सूर्य सभी लोकों को प्रकाशित करते हैं. (४२)
अभ्य १ न्येदेति पर्यन्यदस्यते ऽ होरात्राभ्यां महिषः कल्पमानः.
सूर्य वयं रजसि क्षियन्तं गातुविदं हवामहे नाथमानाः.. (४३)
दिनों तथा रात्रियों के द्वारा सूर्य का एक रूप सामने आता है. उन का दूसरा रूप
गमनशील है. स्वर्ग के मार्ग में चलने वाले एवं अंतरिक्षगामी सूर्य का हम आह्वान करते हैं.
(४३)
पृथिवीप्रो महिषो नाथमानस्य गातुरदब्धचक्षुः परि विश्वं बभूव.
विश्वं संपश्यन्त्सुविद्रत्रो यजत्र इदं शृणोतु यदहं ब्रवीमि.. (४४)
जिन की दृष्टि कभी हीन नहीं होती जो पृथ्वी के पालनकर्ता और महिमाशाली हैं, वे सूर्य
संसार के सभी ओर व्याप्त हैं. वे जगत् के द्रष्टा, अत्यधिक ज्ञानी और पूज्य हैं. ऐसे सूर्य मेरे
वचन सुनें. (४४)
पर्यस्य महिमा पृथिवीं समुद्रं ज्योतिषा विभ्राजन् परि द्यामन्तरिक्षम्.
सर्वं संपश्यन्त्सुविद्रत्रो यजत्र इदं शृणोतु यदहं ब्रवीमि.. (४५)
सूर्य अपनी ज्योति के द्वारा व्याप्त हो कर पृथ्वी, सागर और अंतरिक्ष में अपनी ज्योति
के द्वारा व्याप्त हैं. सब के कर्मों को देखने वाले सूर्य की महिमा अंतरिक्ष में फैली हुई है. सूर्य
शोभना विद्या वाले तथा पूज्य हैं. (४५)
अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषासम्.
यह्वा इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सिस्रते नाकमच्छ.. (४६)
गौ के समान आने वाली उषा के अग्नि देव मनुष्य की सुविधाओं के द्वारा जाने जाते हैं.
उन की ऊर्ध्वगामी रश्मियां स्वर्ग की ओर शीघ्र जाती हैं. मैं सूर्य का आश्रय प्राप्त करता हूं.
(४६)
सूक्त-३ देवता—अध्यात्म रोहित
य इमे द्यावापृथिवी जजान यो द्रापिं कृत्वा भुवनानि वस्ते.
यस्मिन् क्षियन्ति प्रदिशः षडुर्वीर्याः पतङ्गो अनु विचाकशीति.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१)
इस आकाश और पृथ्वी को उन्होंने प्रकट किया जो सभी लोकों को आच्छादित करते
हैं, जिन में छह उर्वियां और दिशाएं निवास करती हैं. जिन दिशाओं को वे ही प्रकाशित करते
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हैं, उन क्रोधपूर्ण सूर्य का जो अपमान करता है अथवा विद्वान् ब्राह्मण की हिंसा करता है
अथवा कष्ट देता है, हे रोहित देव! तुम उस को कंपित करो तथा उसे क्षीण करते हुए बंधन में
डाल दो. (१)
यस्माद् वाता ऋतुथा पवन्ते यस्मात् समुद्रा अधि विक्षरन्ति.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२)
जिस देवता के प्रभाव से वायु ऋतुओं के अनुसार चलती है तथा समुद्र प्रभावित होते हैं,
क्रोध में भरे हुए सूर्य का जो अपमान करता है अथवा विद्वान् ब्राह्मण की हिंसा करता है, हे
रोहित देव! उस ब्रह्मघाती को कंपित करते हुए क्षीण करो और बंधन में डाल दो. (२)
यो मारयति प्राणयति यस्मात् प्राणन्ति भुवनानि विश्वा.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (३)
जो मनुष्य में प्राण भरते हैं, जो मनुष्य की हिंसा करते हैं, उन के द्वारा सभी प्राणी श्वास
लेते और प्रश्वास के रूप में छोड़ते हैं, क्रोध में भरे उस देवता का जो अपमान करता है अथवा
विद्वान् ब्राह्मण की हिंसा करता है, उस ब्रह्मघाती को कंपित करते हुए हे रोहित देव! क्षीण
करो एवं बंधन में डालो. (३)
यः प्राणेन द्यावापृथिवी तर्पयत्यपानेन समुद्रस्य जठरं यः पिपर्ति.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (४)
जो देवता प्राण, आकाश और पृथ्वी को तृप्त करता है तथा अपमान से समुद्र के पेट
को पालता है, क्रोध में भरे उस के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव
कंपित करते हुए क्षीण बनाओ एवं बंधन में डालो. (४)
यस्मिन् विराट् परमेष्ठी प्रजापतिरग्निर्वैश्वानरः सह पङ्क्त्या श्रितः.
यः परस्य प्राणं परमस्य तेज आददे.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (५)
जिस में विराट् परमेष्ठी वैश्वानर पंक्ति, प्रजा और अग्नि सहित निवास करते हैं, जिस ने
उत्कृष्ट प्राण के महान तेज को धारण किया है, उन क्रोधवंत देवता के अपराधी तथा विद्वान्
ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण करो तथा अपने बंधन में बांध
लो. (५)
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यस्मिन् षडुर्वीः पञ्च दिशो अधि श्रिताश्चतस्र आपो यज्ञस्य त्रयो ऽ क्षराः.
यो अन्तरा रोदसी क्रुद्धश्चक्षुषैक्षत.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (६)
पांच दिशाएं, छह उर्वियां, चार जलों तथा यज्ञ के तीन अक्षर जिस में आश्रित हैं, जो
आकाश और पृथ्वी के मध्य अपने क्रोधपूर्ण नेत्र से देखता है, उस क्रोधवान देवता के
अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ
और अपने पाश में बांध लो. (६)
यो अन्नादो अन्नपतिर्बभूव ब्रह्मणस्पतिरुत यः.
भूतो भविष्यद् भुवनस्य यस्पतिः.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (७)
जो ब्रह्मणस्पति हैं, जो अन्न के पालक और भक्षक हैं, जो भूत, भविष्य और लोक के
स्वामी हैं, उन क्रोधयुक्त देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव!
कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों में बांध लो. (७)
अहोरात्रैर्विमितं त्रिंशदङ्गं त्रयोदशं मासं योनिर्मिमीति.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (८)
जिन्होंने तीन दिनरात्रि का समूह बना कर तेरहवें अधिक मास का निर्माण किया, ऐसे
क्रोधयुक्त देव के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए
क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों में बांध लो. (८)
कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत् पतन्ति.
त आववृत्रन्त्सद्नादृतस्य.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (९)
सूर्य की सुंदर रश्मियां जल को सोख कर स्वर्ग में जाती हैं तथा दक्षिणायन में जल
स्थान से लौटती हैं, उन क्रोध वाले देव के अपराधी एवं विद्वान् ब्राह्मणों के हिंसक को हे
रोहितदेव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों में बांध लो. (९)
यत् ते चन्द्रं कश्यप रोचनावद् यत् संहितं पुष्कलं चित्रभानु.
यस्मिन्त्सूर्या आर्पिताः सप्त साकम्.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
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उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१०)
हे कश्यप! तुम्हारे रोचमान चित्रभानु में सात सूर्य एक साथ रहते हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के
अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ
और अपने पाशों में बांध लो. (१०)
बृहदेनमनु वस्ते पुरस्ताद् रथन्तरं प्रति गृह्णाति पश्चात्.
ज्योतिर्वसाने सदमप्रमादम्.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (११)
जिस के अनुकूल रह कर बृहत् आच्छादन करता और रथंतर उसे धारण करता है, वे
दोनों ही जातियों से सदैव ढके रहते हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी एवं विद्वान् ब्राह्मण के
हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ अपने पाशों से बांध दो. (११)
बृहदन्यतः पक्ष आसीद् रथन्तरमन्यतः सबले सध्रीची.
यद् रोहितमजनयन्त देवाः.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१२)
देवताओं द्वारा रोहित को उत्पन्न करने के समय बृहत् एक ओर तथा रथंतर दूसरी ओर
हुए. ये दोनों ही शक्तिशाली और साथ रहने वाले पक्ष हैं. इस क्रोधवंत देव के अपराधी और
विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने बंधन
में बांध लो. (१२)
स वरुणः सायमग्निर्भवति स मित्रो भवति प्रातरुद्यन्.
स सविता भूत्वान्तरिक्षेण याति स इन्द्रो भूत्वा तपति मध्यतो दिवम्.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१३)
वे वरुण देव सायं समय अग्नि होते हैं और प्रातःकाल उदित होते हुए मित्र बन जाते हैं.
वे सविता के रूप से अंतरिक्ष में तथा इंद्र के रूप में स्वर्ग में स्थित रहते हैं. ऐसे क्रोधवंत देव
का जो अपराध करता है और विद्वान् ब्राह्मण की हिंसा करता है, उसे हे रोहित देव! तुम
कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों में बांध लो. (१३)
सहस्राह्ण्यं वियतावस्य पक्षौ हरेर्हंसस्य पततः स्वर्गम्.
स देवान्त्सर्वानुरस्युपदद्य संपश्यन् याति भुवनानि विश्वा.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१४)
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इन पापनाशक और स्वर्गगामी सूर्य से दोनों अयन अर्थात् उत्तरायण और दक्षिणायन
सहस्रों दिवसों में नियमपूर्वक बंधे रहते हैं. ये सब देवताओं को अपने में लीन कर के सभी
जीवों को देखते हुए चलते हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक
को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों के बंधन में डालो.
(१४)
अयं स देवो अप्स्व १ न्तः सहस्रमूलः पुरुशाको अत्रिः.
य इदं विश्वं भुवनं जजान.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१५)
सभी लोकों को जिन्होंने प्रकाशित किया वे देव जल में वास करते हैं. वे ही सहस्रों के
मूल रूप तथा तीनों तापों अर्थात् दैहिक, दैविक भौतिक से रहित अग्नि हैं. इस क्रोधवंत देव
के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण
बनाओ और अपने पाशों में बांध लो. (१५)
शुक्रं वहन्ति हरयो रघुष्यदो देवं दिवि वर्चसा भ्राजमानम्.
यस्योर्ध्वा दिवं तन्व १ स्तपन्त्यर्वाङ् सुवर्णैः पटरैर्वि भाति.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१६)
स्वर्ग में अपने तेज से चमकते हुए सूर्य को उन की द्रुतगामी रश्मियां निर्मल रस प्राप्त
कराती हैं उन की देह के ऊर्ध्व भाग रूप रश्मियां स्वर्ग को संतप्त करती हैं. जो स्वर्णिम
रश्मियों द्वारा प्रकाश फैलाते हैं, उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक
को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों से बांध दो. (१६)
येनादित्यान् हरितः संवहन्ति येन यज्ञेन बहवो यन्ति प्रजानन्तः.
यदेकं ज्योतिर्बहुधा विभाति.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१७)
जिन के प्रभाव से सूर्य के अश्व सूर्य को वहन करते हैं तथा जिन के प्रभाव से विज्ञ पुरुष
यज्ञ आदि कर्मों को प्राप्त होते हैं, जो एक ज्योति होते हुए भी अनेक रूप से प्रकाशमान हैं,
ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित
करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांधो. (१७)
सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा.
त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वा भुवनाधि तस्थुः.
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तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१८)
फैलने वाली किरणें अन्य जातियों को निस्तेज कर के चक्र वाले सूर्य के रथ में युक्त
होती हैं. ये सूर्य सप्तऋषियों द्वारा किए हुए नमस्कार को स्वीकार कर के घूमते हैं. ये ग्रीष्म,
वर्षा और हेमंत—इन तीन ऋतुओं वाले वर्ष को बनाते हैं. सब लोक इस काल के आश्रित हैं.
ऐसे क्रोधवंत देवता के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित
करते हुए क्षीण बनाओ और उसे अपने पाशों से बांध लो. (१८)
अष्टधा युक्तो वहति वह्निरुग्रः पिता देवानां जनिता मतीनाम्.
ऋतस्य तन्तुं मनसा मिमानः सर्वा दिशः पवते मातरिश्वा.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१९)
आठ प्रकार से बहने वाले अग्नि उग्र हैं. वे देवों के पालक तथा बुद्धियों को उत्पन्न करने
वाले हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम
कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांध दो. (१९)
सम्यञ्चं तन्तुं प्रदिशो ऽ नु सर्वा अन्तर्गायत्र्याममृतस्य गर्भे.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२०)
गायत्री में, अमृत के गर्भ में तथा सभी दिशाओं में पूजनीय जलतंतु को वायु पवित्र
करते हैं. उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम
कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांध दो. (२०)
निमुचस्तिस्रो व्युषो ह तिस्रस्त्रीणि रजांसि दिवो अङ्ग तिस्रः.
विद्मा ते अग्ने त्रेधा जनित्रं त्रेधा देवानां जनिमानि विद्म.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२१)
हे अग्नि! हम तुम्हारी तीनों उत्पत्तियों को जानते हैं. तुम्हारी तीनों गतियां भस्म करने
वाली हैं. हम तीन लोकों तथा स्वर्ग में तीन भेदों को भी जानते हैं. ऐसे उन क्रोधवंत देव के
अपराधी को तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहितदेव! तुम कंपित करते हुए क्षीण
बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांध लो. (२१)
वि य और्णोत् पृथिवीं जायमान आ समुद्रमदधादन्तरिक्षे.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२२)
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जो उत्पन्न हो कर भूमि को आच्छादित करता है तथा जल को अंतरिक्ष में स्थिर करता
है, ऐसे उस क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम
कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों से बांध लो. (२२)
त्वमग्ने ऋतुभिः केतुभिर्हितो ३ र्कः समिद्ध उदरोचथा दिवि.
किमभ्यार्चन्मरुतः पृश्निमातरो यद् रोहितमजनयन्त देवाः.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२३)
हे अग्नि! तुम ऋतु संबंधी दशों में प्रदीप्त किए जाते हो तथा स्वर्ग में अर्चना के साधन
रूप बनते हो. क्या पश्चिमाताओं के पुत्र मरुद्गण ने तुम्हारी पूजा की थी जो देवता रोहित देव
से मिले थे. उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव!
तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों से बांध लो. (२३)
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः.
यो ३ स्येशे द्विपदो यश्चतुष्पदः.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२४)
शारीरिक बल के प्रदाता आत्मिक बल के प्रेरक, जिन के बल की देवता आराधना करते
हैं तथा जो प्राणिमात्र के स्वामी हैं, ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के
हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों से बांध लो.
(२४)
एकपाद् द्विपदो भूयो वि चक्रमे द्विपात् त्रिपादमभ्येति पश्चात्.
चतुष्पाच्चक्रे द्विपदामभिश्वरे संपश्यन् पङ्क्तिमुपतिष्ठ मानः.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२५)
यह देव एक पैर वाला होने पर भी दो पैर वालों से तेज दौड़ता है, दो पैरों वाला तीन
पैरों वालों के पीछे चलता है. चार पैरों वाला दो पैरों वालों तथा एक स्वर में रहने वालों की
पंक्ति में देखता हुआ उन से सेवा लेता है. ऐसे उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान्
ब्राह्मण के हिंसक ब्रह्मघाती को हे रोहितदेव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और उसे
अपने दृढ़ पाशों से बांध लो. (२५)
कृष्णायाः पुत्रो अर्जुनो रात्र्या वत्सो ऽ जायत.
स ह द्यामध रोहति रुहो रुरोह रोहितः.. (२६)
काले रंग की रात्रि का पुत्र प्रकाशमान सूर्य हुआ है. लाल रंग वाला वह वृद्धि करने वाले
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सूक्त-४ देवता—अध्यात्म
सब से ऊपर चढ़ा है. वही निश्चित रूप से द्युलोक पर चढ़ता है. (२६)
सूक्त-४ देवता—अध्यात्म
स एति सविता स्वर्दिवस्पृष्ठे ऽ वचाकशतू.. (१)
वे सूर्य आकाश की पीठ पर चमकते हुए आते हैं. (१)
रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (२)
सूर्य ने अपनी रश्मियों से आकाश को ढक दिया है. सूर्य रश्मियों से युक्त हैं. (२)
स धाता स विधर्ता स वायुर्नभ उच्छ्रितम्.
रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (३)
वह धाता है, विधाता है तथा वही वायु है, जिस ने आकाश को ऊंचा बनाया है. (३)
सो ऽ र्यमा स वरुणः स रुद्रः स महादेवः.
रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (४)
वही अर्यमा, वही वरुण, वही रुद्र और वही महादेव है. (४)
सो अग्निः स उ सूर्यः स उ एव महायमः.
रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (५)
वही अग्नि, वे ही सूर्य तथा वे ही महान यम हैं. (५)
तं वत्सा उप तिष्ठन्त्येकशीर्षाणो युता दश.
रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (६)
एक शीश वाले दस वत्स उन्हीं की आराधना करते हैं. (६)
पश्चात् प्राञ्च आ तन्वन्ति यदुदेति वि भासति.
रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (७)
वे उदय होते ही चमकने लगते हैं तथा उन के पीछे उन की पूजनीय रश्मियां उन के चारों
ओर छा जाती हैं. (७)
तस्यैष मारुतो गणः स एति शिक्याकृतः.. (८)
छींके के आकार वाला उन का ही एक गण मारुत उनके पीछे आ रहा है. (८)
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रश्मिभिर्नभ आभृतं महेन्द्र एत्यावृतः.. (९)
उन्होंने अपनी रश्मियों से आकाश को ढक लिया है. ये महान इंद्र के द्वारा किरणों से
ढके हुए चले आ रहे हैं. (९)
तस्येमे नव कोशा विष्टम्भा नवधा हिताः.. (१०)
उस के नौ कोष विविध रूप धारण किए हुए हैं. (१०)
स प्रजाभ्यो वि पश्यति यच्च प्राणति यच्च न.. (११)
वे स्थावर और जंगम सभी प्रजाओं के द्रष्टा और सभी के साक्षी हैं. (११)
तमिदं निगतं सहः स एष एक एकवृदेक एव.. (१२)
यह सब उसी को प्राप्त होता है. वह अकेला ही एकवृत है. (१२)
एते अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति.. (१३)
सब देवता इस एक का ही वरण करते हैं. (१३)
सूक्त-५ देवता—अध्यात्म
कीर्तिश्च यशश्चाम्भश्च नभश्च बाह्मणवर्चसं चान्नं चान्नाद्यं च
य एतं देवमेकवृतं वेद.. (१)
कीर्ति, यश, आकाश, जल, ब्रह्मवर्चस् अर्थात् ब्रह्म तेज अन्न और अन्न को पचाने की
क्रिया उसे ही प्राप्त होती है, जो इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता है. (१)
न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (२)
इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता द्वितीय, तृतीय चतुर्थ नहीं कहलाता. (२)
न पञ्चमो न षष्ठः सप्तमो नाप्युच्यते. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (३)
इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता पंचम, षष्ठ अथवा सप्तम नहीं कहलाता है. (३)
नाष्टमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (४)
जो इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता है वह अष्टम, नवम नहीं कहलाता है. (४)
स सर्वस्मै वि पश्यति यच्च प्राणति यच्च न. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (५)
इन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता स्थावर और जंगम सभी को देखने वाला होता है.
(५)
तमिदं निगतं सहः स एष एक एकवृदेक एव. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (६)
वह असाधारण एकवृत अर्थात् ब्रह्म ही है, यह सब उसे ही प्राप्त होता है. (६)
सर्वे अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति.
य एतं देवमेकवृतं वेद... (७)
ये सब देव उस ब्रह्म में एक रूप होते हैं, जो एक व्रत को जानता है. (७)
सूक्त-६ देवता—अध्यात्म
ब्रह्म च तपश्च कीर्तिश्च यशश्चाम्भश्च नभश्च ब्राह्मणवर्चसं चान्नं चान्नाद्यं च. य एतं
देवमेकवृतं वेद.. (१)
भूतं च भव्यं च श्रद्धा च रुचिश्च स्वर्गश्च स्वधा च.. (२)
य एतं देवमेकवृतं वेद.. (३)
ब्रह्म, तप, कीर्ति, यश, जल, आकाश, ब्रह्मचर्य, अन्न और अन्न को पचाने की शक्ति व
भूत, भविष्य, श्रद्धा, रुचि, स्वर्ग और स्वधा—ये सभी उस एक वृत अर्थात् ब्रह्म के ज्ञाता को
प्राप्त होते हैं. (१-३)
य एव मृत्युः सो ३ मृतं सो ३ भ्वं १ स रक्षः. (४)
वे ही मृत्यु, अमृत, अभ्व हैं तथा वही राक्षस हैं. (४)
स रुद्रो वसुवनिर्वसुदेये नमोवाके वषट्कारो ऽ नु संहितः.. (५)
वही रुद्र धनदान के समय धन प्राप्त करने वाले तथा वही नमस्कार यज्ञ में उत्तम रीति
से बोला गया वष्टकार है. (५)
तस्येमे सर्वे यातव उप प्रशिषमासते.. (६)
ये सब राक्षस आदि उस की आज्ञा में रहते हैं. (६)
तस्यामू सर्वा नक्षत्रा वशे चन्द्रमसा सह.. (७)
ये सब नक्षत्र चंद्रमा के साथ उस के वश में रहते हैं. (७)
सूक्त-७ देवता—अध्यात्म
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स वा अह्नो ऽ जायत तस्मादहरजायत.. (१)
उस से दिन प्रकट हुआ और वह दिन से प्रकट हुआ. (१)
स वै रात्र्या अजायत तस्माद् रात्रिरजायत.. (२)
रात्रि उन्हीं ब्रह्म से प्रकट हुई और वे रात्रि से उत्पन्न हुए. (२)
स वा अन्तरिक्षादजायत तस्मादन्तरिक्षमजायत.. (३)
अंतरिक्ष उन से प्रकट हुआ और वे अंतरिक्ष से प्रकट हुए. (३)
स वै वायोरजायत तस्माद् वायुरजायत.. (४)
वायु उन से प्रकट हुई और वे वायु से प्रकट हुए. (४)
स वै दिवो ऽ जायत तस्माद् द्यौरध्यजायत.. (५)
आकाश उन से प्रकट हुआ और वे आकाश से प्रकट हुए. (५)
स वै दिग्भ्यो ऽ जायत तस्माद् दिशो ऽ जायन्त.. (६)
दिशाएं उन से प्रकट हुईं और वे दिशाओं से प्रकट हुए. (६)
स वै भूमेरजायत तस्माद् भूमिरजायत.. (७)
पृथ्वी उन से प्रकट हुईं और वे पृथ्वी से प्रकट हुए. (७)
स वा अग्नेरजायत तस्मादग्निरजायत.. (८)
अग्नि उन से प्रकट हुई और वे अग्नि से प्रकट हुए. (८)
स वा अद्भयो ऽ जायत तस्मादापो ऽ जायन्त.. (९)
जल उन से प्रकट हुआ और वे जल से प्रकट हुए. (९)
स वा ऋग्भ्यो ऽ जायत तस्मादृचो ऽ जायन्त.. (१०)
ऋचाएं उन से प्रकट हुईं और वे ऋचाओं से प्रकट हुए. (१०)
स वै यज्ञादजायत तस्माद् यज्ञो ऽ जायत.. (११)
यज्ञ उन से प्रकट हुआ और वे यज्ञ से प्रकट हुए. (११)
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स यज्ञस्तस्य यज्ञः स यज्ञस्य शिरस्कृतम्.. (१२)
यज्ञ उन का है और वे यज्ञ के हैं एवं यज्ञ के शीर्ष रूप हैं. (१२)
स स्तनयति स वि द्योतते स उ अश्मानमस्यति.. (१३)
वे ही दमकते और कड़कते हैं वे ही उपल गिराते है. (१३)
पापाय वा भद्राय वा पुरुषायसुराय वा.. (१४)
तुम पापियों को, कल्याणकारी पुरुष को, असुर को और ओषधियों को उत्पन्न करते हो.
(१४)
यद्वा कृणोष्वोषधीर्यद्वा वर्षसि भद्रया यद्वा जन्यमवीवृधः.. (१५)
कल्याणमयी वृष्टि के रूप में तुम रसते हो तथा उत्पन्न हुओं को बढ़ाते हो. (१५)
तावांस्ते मघवन् महिमोपो ते तन्वः शतम्.. (१६)
तुम मघवन अर्थात् इंद्र हो. तुम सैकड़ों देवों से युक्त हो और महिमा के द्वारा महान हो.
(१६)
उपो ते बध्वे बद्धानि यदि वासि न्यर्बुदम्.. (१७)
तुम सैकड़ों बांधे हुओं के बांधने वाले और अंत रहित हो. (१७)
सूक्त-८ देवता—अध्यात्म रोहित
भूयानिन्द्रो नमुराद् भूयानिन्द्रासि मृत्युभ्यः.. (१)
वे इंद्र नमुर से श्रेष्ठ हैं. हे इंद्र! तुम मृत्यु के कारणों से भी उत्कृष्ट हो. (१)
भूयानरात्याः शच्याः पतिस्त्वमिन्द्रासि विभूः प्रभूरिति त्वोपास्महे वयम्..
(२)
हे इंद्र! तुम शत्रुओं की अपेक्षा महान हो. तुम शक्ति के पति हो, तुम व्यापक और स्वामी
हो. इस प्रकार के तुम्हारी हम उपासना करते हैं. (२)
नमस्ते अस्तु पश्यत पश्य मा पश्यत.. (३)
हे दर्शनीय! तुम्हारे लिए नमस्कार है. हे शोभन! तुम मुझे देखो. (३)
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अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्चसेन.. (४)
तुम मुझे खानपान, यश, तेज और ब्रह्मवर्चस से युक्त करो. (४)
अम्भो अमो महः सह इति त्वोपास्महे वयम्.
नमस्ते अस्तु पश्यत पश्य मा पश्यत.
अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्चसेन.. (५)
तुम जल, पौरुष, महत्ता और बल स्वरूप हो. हम तुम्हारी उपासना करते हैं. हे दर्शनीय!
आप को नमस्कार है. हे शोभन! आप मुझे देखें. आप हमें अन्न, यश, तेज एवं ब्रह्मवर्चस से
युक्त करें. (५)
अम्भो अरुणं रजतं रजः सह इति त्वोपास्महे वयम्.
नमस्ते अस्तु पश्यत पश्य मा पश्यत.
अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्चसेन.. (६)
हे जल! आप अरुण एवं श्वेत वर्ण के हैं. हम आप को क्रियात्मक तथा शक्तिरूप समझ
कर आपकी उपासना करते हैं. आप हमें अन्न, यश, तेज तथा ब्रह्मवर्चस प्रदान करें. (६)
सूक्त-९ देवता—अध्यात्म रोहित
उरुः पृथुः सुभूर्भुव इति त्वोपास्महे वयम्.
नमस्ते अस्तु पश्यत पश्य मा पश्यत.
अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्चसेन.. (१)
तुम हमें अन्न, यश, तेज और ब्रह्मवर्चस प्रदान करो. तुम्हारी हम उपासना करते है. (१)
प्रथो वरो व्यचो लोक इति त्वोपास्महे वयम्.
नमस्ते अस्तु पश्यत पश्य मा पश्यत.
अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्चसेन.. (२)
आप महान, विस्तृत, उत्तम होने वाले एवं सामर्थ्य रूप हैं. हे शोभन! आप को नमस्ते,
हे दर्शनीय! आप मुझे देखें, आप हमें अन्न, यश तेज तथा ब्रह्मवर्चस प्रदान करें. हम आप की
उपासना करते हैं. (२)
भवद्वसुरिद्वद्धसुः संयद्वसुरायद्वसुरिति त्वोपास्महे वयम्.. (३)
हम तुम्हें भागमुक्त, संबंधों को एकत्र करने वाले, संबंधों को प्राप्त करने वाले मान कर
तुम्हारी उपासना करते हैं. (३)
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नमस्ते अस्तु पश्यत पश्य मा पश्यत.. (४)
हे दर्शनीय! तुम्हारे लिए नमस्कार है. तुम मुझे देखो. (४)
अन्नाद्येन यशसा तेजसा ब्राह्मणवर्चसेन.. (५)
तुम मुझे खानपान, यश, तेज और ब्रह्मवर्चस से युक्त करो. (५)
चौदहवां कांड
सूक्त-१ देवता—सोम
सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्येणोत्तभिता द्यौः.
ऋतेनादित्यास्तिष्ठन्ति दिवि सोमो अधि श्रितः.. (१)
सत्य से भूमि और सूर्य से आकाश स्थित है. सूर्य के बिना आकाश में चंद्रमा स्थित नहीं
होता. (१)
सोमेनादित्या बलिनः सोमेन पृथिवी मही.
अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहितः.. (२)
सोम के कारण आदित्य बलशाली है तथा सोम के कारण पृथ्वी विशाल है. इसी कारण
यह सोम नक्षत्रों के समीप रहता है. (२)
सोमं मन्यते पपिवान् यत् संपिषन्त्योषधिम्.
सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति पार्थिवः.. (३)
जो सोम रूप ओषधि को पीस कर पीते हैं, वे अग्नि को सोमपान करने वाला समझते
हैं. ज्ञानी जन जिस सोम को जानते हैं, उस का भक्षण साधारण प्राणी नहीं कर सकते. (३)
यत् त्वा सोम प्रपिबन्ति तत आ प्यायसे पुनः.
वायुः सोमस्य रक्षिता समानां मास आकृतिः.. (४)
हे सोम! पुरुष तुम्हें पीते हैं, फिर भी तुम वृद्धि को प्राप्त होते रहते हो. अनेक संवत्सरों
रूप से वायु इस सोम की रक्षा करता है. (४)
आच्छद्विधानैर्गुपितो बार्हतैः सोम रक्षितः.
ग्राव्णामिच्छृण्वन् तिष्ठसि न ते अश्नाति पार्थिवः.. (५)
हे सोम! बृहती छंदों वाले कर्मों से तथा आच्छद विधानों से तुम्हारी रक्षा होती है. सोम
कूटने के पाषाण से जो शब्द होता है, उस से तुम्हारी स्थिति है. पार्थिव जीव तुम्हारा सेवन
नहीं कर सके. (५)
चित्तिरा उपबर्हणं चक्षुरा अभ्यञ्जनम्.
द्यौर्भूमिः कोश आसीद् यदयात् सूर्या पतिम्.. (६)
जब सूर्या अपने पति के पास गई, तब ज्ञान उस का तकिया तथा चक्षु ही अंजन बने.
आकाश और पृथ्वी उस के कोष थे. (६)
रैभ्यासीदनुदेयी नाराशंसी न्योचनी.
सूर्याया भद्रमिद् वासो गाथैर्यात परिष्कृता.. (७)
वेदमंत्रों के साथ उस की पिता के घर से विदाई हुई. मंत्रों से ही पति गृह में उस का
स्वागत हुआ. मंत्रों के द्वारा पवित्र बना पति के घर का वस्त्र उस वधू का कल्याण करता है.
(७)
स्तोमा आसन् प्रतिधयः कुरीरं छन्द ओपशः.
सूर्याया अश्विना वराग्निरासीत् पुरोगवः.. (८)
पति के घर के यज्ञ वधू के लिए भोग तथा वेदमंत्र ही उस के आभूषण हुए थे. कुरीर
नाम का छंद उस के शरीर का आभूषण बना. दोनों अश्विनीकुमार सूर्य के घर में और अग्नि
देव उस के आगे चल रहे थे. (८)
सोमो वध्यूरभवदश्विनास्तामुभा वरा.
सूर्या यत् पतये शंसन्तीं मनसा सविताददात्.. (९)
सोम वधू की इच्छा करने वाले हुए. दोनों अश्विनीकुमार उन के साक्षी थे. तब सविता ने
मन से स्तुति करने वाली सूर्या को पति के हाथ में दान के रूप में दिया. (९)
मनो अस्या अन आसीद् द्यौरासीदुत च्छदिः.
शुक्रावनड्वाहावास्तां यदयात् सूर्या पतिम्.. (१०)
जब सूर्या अपने पति को प्राप्त हुई तब मन रथ बना तथा द्युलोक उस की छत हुआ.
उस रथ में दो बलवान बैल जुड़े हुए थे. (१०)
ऋक्सामाभ्यामभिहितौ गावौ ते सामनावैताम्.
श्रोत्रे ते चक्रे आस्तां दिवि पन्थाश्चराचरः.. (११)
ऋग्वेद और सामवेद से अभिमंत्रित तेरे दोनों बल शक्तिपूर्वक चलते हैं. दोनों कान तेरे
रथ के दो पहिए हैं. द्युलोक में तेरा चर और अचर मार्ग है. (११)
शुची ते चक्रे यात्या व्यानो अक्ष आहतः.
अनो मनस्मयं सूर्यारोहत् प्रयती पतिम्.. (१२)
तुझे ले जाने वाले रथ के दोनों पहिए शुद्ध हैं. उस रथ के अक्ष के स्थान पर व्यान
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नामक वायु रखी है. अपने पति के पास जाने वाली सूर्या इस मनोमय रथ पर चढ़ती है. (१२)
सूर्याया वहतुः प्रागात् सविता यमवासृजत्.
मघासु हन्यन्ते गावः फल्गुनीषु व्यु ह्यते.. (१३)
सविता देव ने जिस को भेजा था, सूर्या का वह दहेज आगे गया है. मघा नक्षत्र में गाएं
भेजी जाती हैं और फाल्गुनी नक्षत्रों में विवाह होता है. (१३)
यदश्विना पृच्छमानावयातं त्रिचक्रेण वहतुं सूर्यायाः.
क्वैकं चक्रं वामासीत् क्व देष्ट्राय तस्थथुः.. (१४)
हे अश्विनीकुमारो! जब तुम सूर्या का दहेज ले कर चले, उस समय तुम देवों को पूछते
हुए तीन पहियों वाले रथ के सहारे चले. तुम्हारा वह कर्म सब देवों को रुचिकर प्रतीत हुआ.
पूषा ने तुम्हें इस प्रकार स्वीकार किया जैसे पुत्र पिता को स्वीकार करता है. (१४)
यदयातं शुभस्पती वरेयं सूर्यामुप.
विश्वे देवा अनु तद् वामजानन् पुत्रः पितरमवृणीत पूषा.. (१५)
हे सूर्या! तेरे रथ के दोनों चक्रों को ज्ञानीजन ऋतु के अनुसार जानते हैं. तेरे रथ का जो
एक चक्र गुप्त है, उसे विशेष ज्ञानी ही जानते हैं. (१५)
द्वे ते चक्रे सूर्ये ब्रह्माण ऋतुथा विदुः.
अथैकं चक्रं यद् गुहा तदद्धातय इद् विदुः.. (१६)
हे शुभ करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम दोनों जब वर के द्वारा पूछने योग्य सूर्य के समीप
गए, तुम्हारे उसे कर्म को सभी देवों ने सराहा. पूषा ने तुम्हें उसी प्रकार स्वीकार किया जिस
प्रकार पुत्र पिता को स्वीकार करता है. (१६)
अर्यमणं यजामहे सुबन्धुं पतिवेदनम्.
उर्वारुकमिव बन्धनात् प्रेतो मुञ्चामि नामुतः.. (१७)
अच्छे बंधुबांधवों से युक्त पति का ज्ञान देने वाले तथा श्रेष्ठ मनवाले हम तेरा सत्कार
करते हैं. खरबूजा जिस प्रकार अपनी बेल से छूट जाता है, उसी प्रकार मैं तुझे तेरे पितृकुल से
छुड़ाता हूं, मैं तुझे पतिकुल से अलग नहीं करता. (१७)
प्रेतो मुञ्चामि नामुतः सुबद्धाममुतस्करम्.
यथेयमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रा सुभगासति.. (१८)
मैं तुझे तेरे पितृकुल से मुक्त करता हूं, पतिकुल से नहीं. पतिकुल से तो मैं तुझे
भलीभांति बांधता हूं. हे दाता इंद्र! ऐसी कृपा करो कि यह वधू उत्तम पुत्रों वाली तथा
सौभाग्यशालिनी बने. (१८)
प्र त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद् येन त्वाबध्नात् सविता सुशेवाः.
ऋतस्य योनौ सुकृतस्य लोके स्योनं ते अस्तु सहसंभलायै.. (१९)
मैं तुझे वरुण के उस शाप से मुक्त करता हूं, जिस से तुझे सेवा करने योग्य सविता ने
बांधा था. सदाचारी और उत्तम कर्म करने वाले पति के घर में तुझे सुख प्राप्त हो. (१९)
भगस्त्वेतो नयतु हस्तगृह्याश्विना त्वा प्र वहतां रथेन.
गृहान् गच्छ गृहपत्नी यथासो वशिनी त्वं विदथमा वदासि.. (२०)
भग नाम के देव तेरा हाथ पकड़ कर तुझे यहां से चलाएं. अश्विनीकुमार तुझे रथ में बैठा
कर तेरे पति के घर पहुंचाएं. तू अपने पति के घर को जा. वहां तू घर की स्वामिनी बन और
सब को वश में रख. पति के घर में तू उत्तम विवेक की बात कह. (२०)
इह प्रियं प्रजायै ते समृध्यतामस्मिन् गृहे गार्हपत्याय जागृहि.
एना पत्या तन्वं १ सं स्पृशस्वाथ जिर्विर्विदथमा वदासि.. (२१)
अपने पति के घर में तू गार्हपत्य अग्नि के प्रति सचेत रह. तेरी संतान के लिए वस्तुएं
बढ़ें. तू अपनी आयु पूर्ण होने तक बोलती रहे. (२१)
इहैव स्तं मा वि यौष्टं विश्वमायुर्व्य श्रुतम्.
क्रीडन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानौ स्वस्तकौ.. (२२)
तुम दोनों पतिपत्नी सदा साथ रहो. तुम कभी एकदूसरे से अलग मत होओ. तुम दोनों
जीवन पर्यंत अनेक प्रकार के भोजन करो, अपने पुत्र आदि के साथ क्रीड़ा कर के तथा
कल्याण से मुक्त होते हुए सदा प्रसन्न रहो. (२२)
पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशू क्रीडन्तौ परि यातो ऽ र्णवम्.
विश्वान्यो भुवना विचष्ट ऋतूंरन्यो विदधज्जायसे नवः.. (२३)
ये सूर्य और चंद्रमा शिशु के समान क्रीड़ा करते हुए पूर्व से पश्चिम की ओर गमन करते
हैं. इन में से एक अर्थात् सूर्य लोकों को देखता हुआ ऋतुओं का निर्माण करता है तथा नवीन
रूप में प्रकट होता है. (२३)
नवोनवो भवसि जायमानो ऽ ह्नां केतुरुषसामेष्यग्रम्.
भागं देवेभ्यो वि दधास्यायन् प्र चन्द्रमस्तिरसे दीर्घमायुः.. (२४)
हे चंद्र! तुम मास में स्थित हो कर सदा नवीन रहते हो. तुम अपनी कलाओं को घटाते
और बढ़ाते हुए प्रतिपदा आदि तिथियों का निर्माण करते हो. तुम उषा काल में आगे आ कर
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