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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 699 of 1063

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Page 699

यस्मिन् षडुर्वीः पञ्च दिशो अधि श्रिताश्चतस्र आपो यज्ञस्य त्रयो ऽ क्षराः.
यो अन्तरा रोदसी क्रुद्धश्चक्षुषैक्षत.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (६)
पांच दिशाएं, छह उर्वियां, चार जलों तथा यज्ञ के तीन अक्षर जिस में आश्रित हैं, जो
आकाश और पृथ्वी के मध्य अपने क्रोधपूर्ण नेत्र से देखता है, उस क्रोधवान देवता के
अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ
और अपने पाश में बांध लो. (६)
यो अन्नादो अन्नपतिर्बभूव ब्रह्मणस्पतिरुत यः.
भूतो भविष्यद् भुवनस्य यस्पतिः.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (७)
जो ब्रह्मणस्पति हैं, जो अन्न के पालक और भक्षक हैं, जो भूत, भविष्य और लोक के
स्वामी हैं, उन क्रोधयुक्त देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव!
कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों में बांध लो. (७)
अहोरात्रैर्विमितं त्रिंशदङ्गं त्रयोदशं मासं योनिर्मिमीति.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (८)
जिन्होंने तीन दिनरात्रि का समूह बना कर तेरहवें अधिक मास का निर्माण किया, ऐसे
क्रोधयुक्त देव के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए
क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों में बांध लो. (८)
कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत् पतन्ति.
त आववृत्रन्त्सद्नादृतस्य.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (९)
सूर्य की सुंदर रश्मियां जल को सोख कर स्वर्ग में जाती हैं तथा दक्षिणायन में जल
स्थान से लौटती हैं, उन क्रोध वाले देव के अपराधी एवं विद्वान् ब्राह्मणों के हिंसक को हे
रोहितदेव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा अपने पाशों में बांध लो. (९)
यत् ते चन्द्रं कश्यप रोचनावद् यत् संहितं पुष्कलं चित्रभानु.
यस्मिन्त्सूर्या आर्पिताः सप्त साकम्.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
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