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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 697 of 1063

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Page 697

ये रोहित सूर्य रथ पर और अश्वों पर अपने दो रूप बनाते हैं. ये पूज्य महत्त्वशाली और
प्रकाशमान हैं. सुंदर गमन वाले सूर्य सभी लोकों को प्रकाशित करते हैं. (४२)
अभ्य १ न्येदेति पर्यन्यदस्यते ऽ होरात्राभ्यां महिषः कल्पमानः.
सूर्य वयं रजसि क्षियन्तं गातुविदं हवामहे नाथमानाः.. (४३)
दिनों तथा रात्रियों के द्वारा सूर्य का एक रूप सामने आता है. उन का दूसरा रूप
गमनशील है. स्वर्ग के मार्ग में चलने वाले एवं अंतरिक्षगामी सूर्य का हम आह्वान करते हैं.
(४३)
पृथिवीप्रो महिषो नाथमानस्य गातुरदब्धचक्षुः परि विश्वं बभूव.
विश्वं संपश्यन्त्सुविद्रत्रो यजत्र इदं शृणोतु यदहं ब्रवीमि.. (४४)
जिन की दृष्टि कभी हीन नहीं होती जो पृथ्वी के पालनकर्ता और महिमाशाली हैं, वे सूर्य
संसार के सभी ओर व्याप्त हैं. वे जगत् के द्रष्टा, अत्यधिक ज्ञानी और पूज्य हैं. ऐसे सूर्य मेरे
वचन सुनें. (४४)
पर्यस्य महिमा पृथिवीं समुद्रं ज्योतिषा विभ्राजन् परि द्यामन्तरिक्षम्.
सर्वं संपश्यन्त्सुविद्रत्रो यजत्र इदं शृणोतु यदहं ब्रवीमि.. (४५)
सूर्य अपनी ज्योति के द्वारा व्याप्त हो कर पृथ्वी, सागर और अंतरिक्ष में अपनी ज्योति
के द्वारा व्याप्त हैं. सब के कर्मों को देखने वाले सूर्य की महिमा अंतरिक्ष में फैली हुई है. सूर्य
शोभना विद्या वाले तथा पूज्य हैं. (४५)
अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषासम्.
यह्वा इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सिस्रते नाकमच्छ.. (४६)
गौ के समान आने वाली उषा के अग्नि देव मनुष्य की सुविधाओं के द्वारा जाने जाते हैं.
उन की ऊर्ध्वगामी रश्मियां स्वर्ग की ओर शीघ्र जाती हैं. मैं सूर्य का आश्रय प्राप्त करता हूं.
(४६)
सूक्त-३ देवता—अध्यात्म रोहित
य इमे द्यावापृथिवी जजान यो द्रापिं कृत्वा भुवनानि वस्ते.
यस्मिन् क्षियन्ति प्रदिशः षडुर्वीर्याः पतङ्गो अनु विचाकशीति.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१)
इस आकाश और पृथ्वी को उन्होंने प्रकट किया जो सभी लोकों को आच्छादित करते
हैं, जिन में छह उर्वियां और दिशाएं निवास करती हैं. जिन दिशाओं को वे ही प्रकाशित करते
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