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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 711

चौदहवां कांड
सूक्त-१ देवता—सोम
सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्येणोत्तभिता द्यौः.
ऋतेनादित्यास्तिष्ठन्ति दिवि सोमो अधि श्रितः.. (१)
सत्य से भूमि और सूर्य से आकाश स्थित है. सूर्य के बिना आकाश में चंद्रमा स्थित नहीं
होता. (१)
सोमेनादित्या बलिनः सोमेन पृथिवी मही.
अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहितः.. (२)
सोम के कारण आदित्य बलशाली है तथा सोम के कारण पृथ्वी विशाल है. इसी कारण
यह सोम नक्षत्रों के समीप रहता है. (२)
सोमं मन्यते पपिवान् यत् संपिषन्त्योषधिम्.
सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति पार्थिवः.. (३)
जो सोम रूप ओषधि को पीस कर पीते हैं, वे अग्नि को सोमपान करने वाला समझते
हैं. ज्ञानी जन जिस सोम को जानते हैं, उस का भक्षण साधारण प्राणी नहीं कर सकते. (३)
यत् त्वा सोम प्रपिबन्ति तत आ प्यायसे पुनः.
वायुः सोमस्य रक्षिता समानां मास आकृतिः.. (४)
हे सोम! पुरुष तुम्हें पीते हैं, फिर भी तुम वृद्धि को प्राप्त होते रहते हो. अनेक संवत्सरों
रूप से वायु इस सोम की रक्षा करता है. (४)
आच्छद्विधानैर्गुपितो बार्हतैः सोम रक्षितः.
ग्राव्णामिच्छृण्वन् तिष्ठसि न ते अश्नाति पार्थिवः.. (५)
हे सोम! बृहती छंदों वाले कर्मों से तथा आच्छद विधानों से तुम्हारी रक्षा होती है. सोम
कूटने के पाषाण से जो शब्द होता है, उस से तुम्हारी स्थिति है. पार्थिव जीव तुम्हारा सेवन
नहीं कर सके. (५)
चित्तिरा उपबर्हणं चक्षुरा अभ्यञ्जनम्.