अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextइन एकवृत अर्थात् ब्रह्म का ज्ञाता स्थावर और जंगम सभी को देखने वाला होता है.
(५)
तमिदं निगतं सहः स एष एक एकवृदेक एव. य एतं देवमेकवृतं वेद.. (६)
वह असाधारण एकवृत अर्थात् ब्रह्म ही है, यह सब उसे ही प्राप्त होता है. (६)
सर्वे अस्मिन् देवा एकवृतो भवन्ति.
य एतं देवमेकवृतं वेद... (७)
ये सब देव उस ब्रह्म में एक रूप होते हैं, जो एक व्रत को जानता है. (७)
सूक्त-६ देवता—अध्यात्म
ब्रह्म च तपश्च कीर्तिश्च यशश्चाम्भश्च नभश्च ब्राह्मणवर्चसं चान्नं चान्नाद्यं च. य एतं
देवमेकवृतं वेद.. (१)
भूतं च भव्यं च श्रद्धा च रुचिश्च स्वर्गश्च स्वधा च.. (२)
य एतं देवमेकवृतं वेद.. (३)
ब्रह्म, तप, कीर्ति, यश, जल, आकाश, ब्रह्मचर्य, अन्न और अन्न को पचाने की शक्ति व
भूत, भविष्य, श्रद्धा, रुचि, स्वर्ग और स्वधा—ये सभी उस एक वृत अर्थात् ब्रह्म के ज्ञाता को
प्राप्त होते हैं. (१-३)
य एव मृत्युः सो ३ मृतं सो ३ भ्वं १ स रक्षः. (४)
वे ही मृत्यु, अमृत, अभ्व हैं तथा वही राक्षस हैं. (४)
स रुद्रो वसुवनिर्वसुदेये नमोवाके वषट्कारो ऽ नु संहितः.. (५)
वही रुद्र धनदान के समय धन प्राप्त करने वाले तथा वही नमस्कार यज्ञ में उत्तम रीति
से बोला गया वष्टकार है. (५)
तस्येमे सर्वे यातव उप प्रशिषमासते.. (६)
ये सब राक्षस आदि उस की आज्ञा में रहते हैं. (६)
तस्यामू सर्वा नक्षत्रा वशे चन्द्रमसा सह.. (७)
ये सब नक्षत्र चंद्रमा के साथ उस के वश में रहते हैं. (७)
सूक्त-७ देवता—अध्यात्म
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