अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextद्यौर्भूमिः कोश आसीद् यदयात् सूर्या पतिम्.. (६)
जब सूर्या अपने पति के पास गई, तब ज्ञान उस का तकिया तथा चक्षु ही अंजन बने.
आकाश और पृथ्वी उस के कोष थे. (६)
रैभ्यासीदनुदेयी नाराशंसी न्योचनी.
सूर्याया भद्रमिद् वासो गाथैर्यात परिष्कृता.. (७)
वेदमंत्रों के साथ उस की पिता के घर से विदाई हुई. मंत्रों से ही पति गृह में उस का
स्वागत हुआ. मंत्रों के द्वारा पवित्र बना पति के घर का वस्त्र उस वधू का कल्याण करता है.
(७)
स्तोमा आसन् प्रतिधयः कुरीरं छन्द ओपशः.
सूर्याया अश्विना वराग्निरासीत् पुरोगवः.. (८)
पति के घर के यज्ञ वधू के लिए भोग तथा वेदमंत्र ही उस के आभूषण हुए थे. कुरीर
नाम का छंद उस के शरीर का आभूषण बना. दोनों अश्विनीकुमार सूर्य के घर में और अग्नि
देव उस के आगे चल रहे थे. (८)
सोमो वध्यूरभवदश्विनास्तामुभा वरा.
सूर्या यत् पतये शंसन्तीं मनसा सविताददात्.. (९)
सोम वधू की इच्छा करने वाले हुए. दोनों अश्विनीकुमार उन के साक्षी थे. तब सविता ने
मन से स्तुति करने वाली सूर्या को पति के हाथ में दान के रूप में दिया. (९)
मनो अस्या अन आसीद् द्यौरासीदुत च्छदिः.
शुक्रावनड्वाहावास्तां यदयात् सूर्या पतिम्.. (१०)
जब सूर्या अपने पति को प्राप्त हुई तब मन रथ बना तथा द्युलोक उस की छत हुआ.
उस रथ में दो बलवान बैल जुड़े हुए थे. (१०)
ऋक्सामाभ्यामभिहितौ गावौ ते सामनावैताम्.
श्रोत्रे ते चक्रे आस्तां दिवि पन्थाश्चराचरः.. (११)
ऋग्वेद और सामवेद से अभिमंत्रित तेरे दोनों बल शक्तिपूर्वक चलते हैं. दोनों कान तेरे
रथ के दो पहिए हैं. द्युलोक में तेरा चर और अचर मार्ग है. (११)
शुची ते चक्रे यात्या व्यानो अक्ष आहतः.
अनो मनस्मयं सूर्यारोहत् प्रयती पतिम्.. (१२)
तुझे ले जाने वाले रथ के दोनों पहिए शुद्ध हैं. उस रथ के अक्ष के स्थान पर व्यान
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