अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 696 of 1063
Read in contextउच्चा पतन्तमरुणं सुपर्णं मध्ये दिवस्तरणिं भ्राजमानम्.
पश्याम त्वा सवितारं यमाहुरजस्रं ज्योतिर्यदविन्ददत्रिः.. (३६)
ऊर्ध्वगामी, अरुण वर्ण वाले एवं शुभ गति वाले सूर्य के हम सदा तभी दर्शन करें, जब वे
आकाश में गमन कर रहे हों. (३६)
दिवस्पृष्ठे धावमानं सुपर्णमदित्याः पुत्रं नाथकाम उप यामि भीतः.
स नः सूर्य प्र तिर दीर्घमायुर्मा रिषाम सुमतौ ते स्याम.. (३७)
मैं भयभीत हो कर आकाश में द्रुत गमन करते हुए सूर्य की स्तुति करता हुआ उन का
आश्रय प्राप्त करता हूं. हे सूर्य! हम तुम्हारी शोभन कृपा दृष्टि में रहें तथा हिंसा को प्राप्त न
हों. तुम हमें दीर्घ जीवन प्रदान करो. (३७)
सहस्राह्ण्यं वियतावस्य पक्षौ हरेर्हंसस्य पततः स्वर्गम्.
स देवान्त्सर्वानुरस्युपदद्य संपश्यन् याति भुवनानि विश्वा.. (३८)
हम पापों के नाशक, सुंदर गमन वाले तथा स्वर्गगामी सूर्य देव के दोनों अर्थात् उत्तरायण
व दक्षिणायन तथा सहस्रों दिनों तक नियम में रहते हैं. ये सूर्य देव सभी देवों को अपने में लीन
कर के सभी भूतों अर्थात् प्राणियों को देखते हुए चलते हैं. (३८)
रोहितः कालो अभवद् रोहितो ऽ ग्रे प्रजापतिः.
रोहितो यज्ञानां मुखं रोहितः स्व १ राभरत्.. (३९)
रोहित काल में ये प्रजापति थे. ये यज्ञों के मूल रूप हैं तथा ये ही रोहित अब स्वर्ग का
पोषण करते हैं. (३९)
रोहितो लोको अभवद् रोहितो ऽ त्यतपद् दिवम्.
रोहितो रश्मिभिर्भूमिं समुद्रमनु सं चरत्.. (४०)
स्वर्ग में रहने वाले रोहित अपनी रश्मियों से सागर और पृथ्वी में विचरते हैं. ऐसे रोहित
दर्शन करने योग्य हैं. (४०)
सर्वा दिशः समचरद् रोहितो ऽ धिपतिर्दिवः.
दिवं समुद्रमाद् भूमिं सर्वं भूतं विरक्षति.. (४१)
स्वर्ग के अधिपति रोहित सब दिशाओं में भ्रमण करते तथा स्वर्ग सागर में जाते हैं. ये
सभी जीवों के साथसाथ पृथ्वी की रक्षा करते हैं. (४१)
आरोहंछुक्रो बृहतीरतन्द्रो द्वे रूपे कृणुते रोचमानः.
चित्रश्चिकित्वान् महिषो वातमाया यावतो लोकानभि यद् विभाति.. (४२)
ebook converter DEMO Watermarks*