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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 702 of 1063

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Page 702

तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१८)
फैलने वाली किरणें अन्य जातियों को निस्तेज कर के चक्र वाले सूर्य के रथ में युक्त
होती हैं. ये सूर्य सप्तऋषियों द्वारा किए हुए नमस्कार को स्वीकार कर के घूमते हैं. ये ग्रीष्म,
वर्षा और हेमंत—इन तीन ऋतुओं वाले वर्ष को बनाते हैं. सब लोक इस काल के आश्रित हैं.
ऐसे क्रोधवंत देवता के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित
करते हुए क्षीण बनाओ और उसे अपने पाशों से बांध लो. (१८)
अष्टधा युक्तो वहति वह्निरुग्रः पिता देवानां जनिता मतीनाम्.
ऋतस्य तन्तुं मनसा मिमानः सर्वा दिशः पवते मातरिश्वा.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१९)
आठ प्रकार से बहने वाले अग्नि उग्र हैं. वे देवों के पालक तथा बुद्धियों को उत्पन्न करने
वाले हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम
कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांध दो. (१९)
सम्यञ्चं तन्तुं प्रदिशो ऽ नु सर्वा अन्तर्गायत्र्याममृतस्य गर्भे.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२०)
गायत्री में, अमृत के गर्भ में तथा सभी दिशाओं में पूजनीय जलतंतु को वायु पवित्र
करते हैं. उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम
कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांध दो. (२०)
निमुचस्तिस्रो व्युषो ह तिस्रस्त्रीणि रजांसि दिवो अङ्ग तिस्रः.
विद्मा ते अग्ने त्रेधा जनित्रं त्रेधा देवानां जनिमानि विद्म.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२१)
हे अग्नि! हम तुम्हारी तीनों उत्पत्तियों को जानते हैं. तुम्हारी तीनों गतियां भस्म करने
वाली हैं. हम तीन लोकों तथा स्वर्ग में तीन भेदों को भी जानते हैं. ऐसे उन क्रोधवंत देव के
अपराधी को तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहितदेव! तुम कंपित करते हुए क्षीण
बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांध लो. (२१)
वि य और्णोत् पृथिवीं जायमान आ समुद्रमदधादन्तरिक्षे.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (२२)
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