अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextइन पापनाशक और स्वर्गगामी सूर्य से दोनों अयन अर्थात् उत्तरायण और दक्षिणायन
सहस्रों दिवसों में नियमपूर्वक बंधे रहते हैं. ये सब देवताओं को अपने में लीन कर के सभी
जीवों को देखते हुए चलते हैं. ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक
को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों के बंधन में डालो.
(१४)
अयं स देवो अप्स्व १ न्तः सहस्रमूलः पुरुशाको अत्रिः.
य इदं विश्वं भुवनं जजान.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१५)
सभी लोकों को जिन्होंने प्रकाशित किया वे देव जल में वास करते हैं. वे ही सहस्रों के
मूल रूप तथा तीनों तापों अर्थात् दैहिक, दैविक भौतिक से रहित अग्नि हैं. इस क्रोधवंत देव
के अपराधी और विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण
बनाओ और अपने पाशों में बांध लो. (१५)
शुक्रं वहन्ति हरयो रघुष्यदो देवं दिवि वर्चसा भ्राजमानम्.
यस्योर्ध्वा दिवं तन्व १ स्तपन्त्यर्वाङ् सुवर्णैः पटरैर्वि भाति.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१६)
स्वर्ग में अपने तेज से चमकते हुए सूर्य को उन की द्रुतगामी रश्मियां निर्मल रस प्राप्त
कराती हैं उन की देह के ऊर्ध्व भाग रूप रश्मियां स्वर्ग को संतप्त करती हैं. जो स्वर्णिम
रश्मियों द्वारा प्रकाश फैलाते हैं, उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक
को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों से बांध दो. (१६)
येनादित्यान् हरितः संवहन्ति येन यज्ञेन बहवो यन्ति प्रजानन्तः.
यदेकं ज्योतिर्बहुधा विभाति.
तस्य देवस्य क्रुद्धस्यैतदागो य एवं विद्वांसं ब्राह्मणं जिनाति.
उद् वेपय रोहित प्र क्षिणीहि ब्रह्मज्यस्य प्रति मुञ्च पाशान्.. (१७)
जिन के प्रभाव से सूर्य के अश्व सूर्य को वहन करते हैं तथा जिन के प्रभाव से विज्ञ पुरुष
यज्ञ आदि कर्मों को प्राप्त होते हैं, जो एक ज्योति होते हुए भी अनेक रूप से प्रकाशमान हैं,
ऐसे क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित
करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों से बांधो. (१७)
सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा.
त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वा भुवनाधि तस्थुः.
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