अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.
The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.
The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.
किया है और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं ने इसे वहीं पहुंचा दिया, जहां इसे जाना
चाहिए था. मैंने सविता देव के प्रपदों अर्थात् अर्थात् पंजों की सहायता से उस का सेवन
किया है, यह ओदन समस्त अंगों से युक्त सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला है. जो
इस ओदन को उस विधि से सेवन करना जानता है, वही समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों
सहित और संपूर्ण शरीर वाला हैं. वह स्वर्ग आदि श्रेष्ठ स्थानों में स्थित होता है. (१६)
ततश्चैनमन्याभ्यां हस्ताभ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
ब्राह्मणं हनिष्यसीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
ऋतस्य हस्ताभ्याम्. ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः. सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं
भवति य एवं वेद.. (१७)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—“हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने इस
ओदन को जिन हाथों की सहायता से सेवन किया उस के अतिरिक्त अर्थात् लौकिक हाथों से
यदि इस ओदन का सेवन किया है. यदि उस से भिन्न अर्थात् लौकिक हाथों की सहायता से
उस ब्रह्मौदन का सेवन किया तो ब्राह्मणों की हत्या करोगे अथवा तुम्हें ब्रह्महत्या का पाप
लगेगा. इस के उत्तर के रूप में शिष्य अपने गुरु से कहे—मैं ने इस ओदन का सेवन न
पराङ्मुख हो कर किया है, न सामने से खाया है और न आत्माभिमुख हो कर खाया है. मैं ने
ऋतु रूपी हाथों की सहायता से इस ओदन का सेवन किया है. मैंने ओदन को वहीं पहुंचा
दिया है, जहां उसे जाना था. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त, सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण
अंगों सहित है. इस विधि से जो इस ओदन का सेवना करना जाता. वह समस्त अंगों वाला है.
सभी जोड़ों से युक्त और संपूर्ण शरीर वाला हो जाता है, वह स्वर्ग आदि पुण्य लोकों में
प्रतिष्ठित होता है. (१७)
ततश्चैनमन्यया प्रतिष्ठया प्राशीर्यया चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. अप्रतिष्ठानो ऽ
नायटनो मरिष्यसीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
सत्ये प्रतिष्ठाय. तयैनं प्राशिषं तयैनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः
सर्वपरुः सर्वतनूः. सर्वाङ्गः एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद..
(१८)
गुरु अपने शिष्य से कहे—“हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने जिस प्रतिष्ठा के
माध्यम से इस ब्रह्मौदन का सेवन किया है उस के अतिरिक्त लौकिक प्रतिष्ठा के माध्यम से
तुम यदि इस ओदन का सेवन करोगे तो तुम बिना प्रतिष्ठा वाले और बिना घर के स्वामी हुए
मरोगे. इस के उत्तर में शिष्य अपने गुरु से निवेदन करे—मैंने इस ब्रह्मौदन का न पराङ्मुख
हो कर सेवन किया है, न सामने से सेवन किया है और न आत्माभिमुख हो कर सेवन किया
है. मैं ने सत्य में प्रतिष्ठित हो कर उस प्रतिष्ठा के माध्यम से इस ओदन का सेवन किया है. इस
ब्रह्मौदन को जहां जाना चाहिए था. मैं ने उसे वहीं पहुंचा दिया है. यह ओदन समस्त अंगों से
ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-६ देवता—प्राण
युक्त, सभी जोड़ों सहित एवं संपूर्ण शरीर वाला है इस विधि से जो इस ओदन का सेवन
करना जानता है वह समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर है. (१८)
सूक्त-६ देवता—प्राण
प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे.
यो भूत: सर्वस्येश्वरो यस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम्.. (१)
इस प्राण के लिए नमस्कार है, जिस के वश में यह समस्त चराचर जगत् है. यह प्राण
सब का ईश्वर है और इसी में सारा जगत् स्थित है. (१)
नमस्ते प्राण क्रन्दाय नमस्ते स्तनयित्नवे.
नमस्ते प्राण विद्युते नमस्ते प्राण वर्षते.. (२)
हे ध्वनि करते हुए प्राण! तुम्हारे लिए नमस्कार है, मेघ घटा में घुस कर वर्षा करने वाले
तुम्हारे लिए नमस्कार है. बिजली के रूप में प्रकाशित एवं वर्षा करते हुए तुम्हें नमस्कार है.
(२)
यत् प्राण स्तनयित्नुनाभिक्रन्दत्योषधी:.
प्र वीयन्ते गर्भान् दधतेऽथो बह्वीर्वि जायन्ते.. (३)
जब प्राण अर्थात् सूर्यात्मक देव वर्षा काल में मेघ ध्वनि के द्वारा जौ, गेहूं, एवं जंगली
वृक्षों को लक्ष्य कर के गरजते हैं, तब सभी फसलें गर्भ धारण करती हैं एवं अनेक प्रकार से
उत्पन्न होती हैं. (३)
यत् प्राण ऋतावागते ऽ भिक्रन्दत्योषधी:.
सर्वं तदा प्र मोदते यत् किं च भूम्यामधि.. (४)
जब प्राण अर्थात् सूर्यात्मक देव वर्षा ऋतु आने पर फसलों को लक्ष्य कर के गर्जन
करते हैं, तब भूमि पर जितने भी प्राणी हैं, वे सब प्रसन्न होते हैं. (४)
यदा प्राणो अभ्यवर्षीद् वर्षेण पृथिवीं महीम्.
पशवस्तत् प्र मोदन्ते महो वै नो भविष्यति.. (५)
जिस समय प्राण अर्थात् सूर्य देव, पृथ्वी को वर्षा के जल से सभी ओर गीला कर देते हैं,
उस समय गाय आदि पशु प्रसन्न होते हैं कि घास की अधिकता से हमारे लिए उत्सव होगा.
(५)
अभिवृष्टा ओषधयः प्राणेन समवादिरन्.
आयुर्वै नः प्रातीतरः सर्वा नः सुरभीरकः.. (६)
ebook converter DEMO Watermarks*
प्राण अर्थात् सूर्य देव के द्वारा वर्षा के जल से सींची गई फसलें और जड़ीबूटियां सूर्य से
संभाषण करने लगती हैं—"हे प्राण अर्थात् सूर्य देव! तुम हमारा जीवन बढ़ाओ तथा हमें
शोभन गंध वाली बनाओ.” (६)
नमस्ते अ्रस्त्वायते नमो अस्तु परायते.
नमस्ते प्राण तिष्ठत आसीनायोत ते नमः.. (७)
हे प्राण देव! तुझ आते हुए को नमस्कार है और वापस जाते हुए को नमस्कार है. हे
प्राण देव! तुझ स्थिर रहने वाले को तथा बैठे हुए को नमस्कार है. (७)
नमस्ते प्राण प्राणते नमो अस्त्वपानते.
पराचीनाय ते नमः प्रतीचीनाय ते नमः सर्वस्मै त इंद नमः.. (८)
हे प्राण देव! सांस लेने का व्यापार करने वाले तुम्हें नमस्कार है तथा अपान वायु छोड़ने
वाले तुम्हें नमस्कार है. अधिक कहने से क्या लाभ है, समस्त व्यापार अर्थात् क्रियाएं करने
वाले तुम्हें नमस्कार है. (८)
या ते प्राण प्रिया तनूर्यो ते प्राण प्रेयसी.
अथो यद् भेषजं तव तस्य नो धेहि जीवसे.. (९)
हे प्राण देव! तुम्हारा प्रिय जो शरीर है एवं प्राण, अपान अर्थात् अग्नि और सोम रूपी
तुम्हारी जो दो प्रियाएं हैं तथा जो तुम्हारी अमरता प्रदान करने वाली ओषधि है, इन सब से
हमें जीवन के अमृत का साधन ओषधि प्रदान करो. (९)
प्राणः प्रजा अनु वस्ते पिता पुत्रमिव प्रियम्.
प्राणो ह सर्वस्येश्वरो यच्च प्राणति यच्च न.. (१०)
हे प्राण देव! समस्त प्रजाओं के शरीर में तुम इस प्रकार निवास करते हो, जिस प्रकार
पिता अपने वस्त्र से प्रिय पुत्र को ढकता है. प्राण उन सब के स्वामी हैं, जो सांस लेते हैं
अथवा सांस नहीं लेते हैं. (१०)
प्राणो मृत्युः प्राणस्तक्मा प्राणं देवा उपासते.
प्राणो ह सत्यवादिनमुत्तमे लोक आ दधत्.. (११)
ये प्राण देव ही मृत्यु करने वाले हैं एवं यही जीवन को कष्टमय बनाने वाले ज्वर हैं. शरीर
के मध्य में वर्तमान इन्हीं प्राण की देवगण उपासना करते हैं. (११)
प्राणो विराट् प्राणो देष्ट्री प्राणं सर्व उपासते.
प्राणो ह सूर्यश्चन्द्रमाः प्राणमाहुः प्रजापतिम्.. (१२)
ebook converter DEMO Watermarks*
प्राण अर्थात् स्थूल प्रपंच का अभिमानी देवता ईश्वर प्राण है तथा अपनेअपने व्यापारों में
सब को प्रेरित करने वाला परम देवता प्राण है. अपने मनचाहे फल को पाने के लिए सभी
प्राण की उपासना करते हैं. प्राण सूर्य और चंद्रमा है तथा प्राण को ही ज्ञानी जन सब की
रचना करने वाला प्रजापति कहते हैं. (१२)
प्राणापानौ व्रीहियवावनड्वान् प्राण उच्यते.
यवे ह प्राण आहितो ऽ पानो व्रीहिरुच्यते.. (१३)
प्राण और अपान प्रधान प्राण की विशेष वृत्तियां हैं. प्राण ही गेहूं, जौ तथा अपान बैल
कहे जाते हैं. प्राण वायु जौ में आश्रित है तथा अपान वायु को ही गेहूं कहा जाता है. (१३)
अपानति प्राणति पुरुषो गर्भे अन्तरा.
यदा त्वं प्राण जिन्वस्यथ स जायते पुनः.. (१४)
पुरुष स्त्री के गर्भाशय के मध्य सांस लेता और अपान वायु छोड़ता है. हे प्राण! जब तुम
गर्भस्थ भ्रूण को पुष्ट करते हो, तब वह जन्म लेता है. (१४)
प्राणमाहुर्मातरिश्वानं वातो ह प्राण उच्यते.
प्राणे ह भूतं भव्यं च प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्.. (१५)
प्राण को मातरिश्वा अंतरिक्ष का स्वामी वायु कहा जाता है. उसी वायु को प्राण कहा
जाता है. उन दोनों में केवल नाम का भेद है. जगत् के आधार बने हुए उस प्राण में भूतकाल
से संबंधित और भविष्य काल में उत्पन्न होने वाला जगत् आश्रित रहता है. इस प्रकार प्राणों
में ही सब प्रतिष्ठित हैं. (१५)
आथर्वणीराङ्गिरसीर्देवीर्मनुष्यजा उत.
ओषधयः प्र जायन्ते यदा त्वं प्राण जिन्वसि.. (१६)
अथर्वा महर्षि द्वारा, अंगिरा महर्षि द्वारा, देवों द्वारा तथा मनुष्यों द्वारा उत्पन्न अनेक
प्रकार की जड़ीबूटियों और फसलों को हे प्राण! तुम ही वर्षा का जल प्रदान कर के प्रसन्न
करते हो. (१६)
यदा प्राणो अभ्यवर्षीद् वर्षेण पृथिवीं महीम्.
ओषधयः प्र जायन्तेऽथो याः काश्च वीरुधः.. (१७)
प्राण जब वर्षा के रूप में विशाल पृथ्वी पर जल गिराता है, तभी जड़ीबूटियां, फसलें
और जो भी वृक्ष हैं, वे सब उत्पन्न होते हैं. (१७)
यस्ते प्राणेदं वेद यस्मिंश्चासि प्रतिष्ठितः.
सर्वे तस्मै बलिं हरानमुष्मिंल्लोक उत्तमे.. (१८)
ebook converter DEMO Watermarks*
हे प्राण! यह कहा हुआ तुम्हारा माहात्म्य जो जानता है एवं जिस विद्वान् में तुम
प्रतिष्ठित रहते हो, उस के लिए सभी देव स्वर्ग में अमृतमय भाग प्रस्तुत करते हैं. (१८)
यथा प्राण बलिहृतस्तुभ्यं सर्वाः प्रजा इमाः.
एवा तस्मै बलिं हरान् यस्त्वा शृणवत् सुश्रवः.. (१९)
हे प्राण! जिस प्रकार ये सभी प्रजाएं तुम्हारे लिए बलि प्रस्तुत करें. हे सुनने वाले प्राण!
जो तुम्हारा माहात्म्य सुनता है, उस के लिए भी सब बलि प्रस्तुत कर देते हैं. (१९)
अन्तर्गर्भश्चरति देवतास्वाभूतो भूतः स उ जायते पुन:.
स भूतो भव्यं भविष्यत् पिता पुत्रं प्र विवेशा शचीभिः.. (२०)
प्राण गर्भ हो कर देवताओं में विचरण करता है, वही भलीभांति व्याप्त हो कर मनुष्य
आदि के शरीर के रूप में पुनः उत्पन्न होता है. नित्य वर्तमान वह प्राण भूतकाल की वस्तुओं
में तथा भविष्य काल की वस्तुओं के रूप में उत्पन्न होता है. वही अपनी शक्तियों से पिता
और पुत्र में प्रवेश करता है. (२०)
एकं पादं नोत्खिदति सलिलाद्धंस उच्चरन्.
यदङ्ग स तमुत्खिदेन्रैवाद्य
न श्वः स्यान्न रात्री नाहः स्यान्न व्युच्छेत् कदा चन.. (२१)
हंस अर्थात् जगत् के प्राण बने हुए सूर्य जल से उदित होते हुए अपने एक चरण अर्थात्
भाग को जल से ऊपर नहीं उठाते हैं. यदि वे अपने दूसरे चरण को भी ऊपर उठा लें तो काल
विभाजन नहीं हो सकेगा. तब वे कहीं न जा सकेंगे और न दिन और रात हो सकेंगे. (२१)
अष्टाचक्रं वर्तत एकनेमि सहस्राक्षरं प्र पुरो नि पश्चा.
अर्धेन विश्वं भुवनं जजान यदस्यार्धं कतमः स केतुः.. (२२)
त्वचा, रक्त आदि आठ धातुएं शरीर का निर्माण करती हैं. उन्हीं का यहां रथ के पहियों
के रूप में निरूपण है—यह शरीर आठ पहियों वाला रथ है. प्राण ही इस की एकमात्र धुरी है.
लोक में रथ के पहिए धुरी को घेरे रहते हैं. प्राण रूपी धुरी एक पहिए से निकल कर दूसरे में
प्रवेश करती है. वह प्राण अपने एक अंश से सारे प्राणियों में प्रवेश कर के आत्मा के रूप में
उत्पन्न होता है. उस का दूसरा भाग असीमित ब्रह्म का झंडा अर्थात् ब्रह्मांड बन जाता है.
(२२)
यो अस्य विश्वजन्मन ईशे विश्वस्य चेष्टतः.
अन्येषु क्षिप्रधन्वने तस्मै प्राण नमो ऽ स्तु ते.. (२३)
जो प्राण नाना रूपों को जन्म देने वाला है, जो इस संसार का स्वामी है तथा नाना
प्राणियों के शरीरों में व्याप्त है, उस तीव्रता से व्याप्त होने वाले हे प्राण! तुम्हारे लिए नमस्कार
ebook converter DEMO Watermarks*
है. (२३)
यो अस्य सर्वजन्मन ईशे सर्वस्य चेष्टतः.
अतन्द्रो ब्रह्मणा धीरः प्राणो मानु तिष्ठतु.. (२४)
वह जगदीश्वर प्राण आलस्य रहित सदा सूर्य के रूप में विचरण करने वाला, ज्ञानवान
एवं सर्वव्यापक होने के कारण मेरा अनुवर्तन करे. (२४)
ऊर्ध्वः सुप्तेषु जागार ननु तिर्यङ्ङ नि पद्यते.
न सुप्तमस्य सुप्तेष्वनु शुश्राव कश्चन.. (२५)
हे प्राण! तुम ऊर्ध्वगामी हो कर निद्रा परवश प्राणियों में जागते रहो. सोने वाला प्राणी
निद्रा के वशीभूत हो जाता है. इसलिए उस की रक्षा हेतु तुम जाग्रत रहो. ऐसा किसी ने नहीं
सुना है कि मनुष्य के निद्रा पर वश होने पर उस का प्राण भी सो गया हो. (२५)
प्राण मा मत् पर्यावृतो न मदन्यो भविष्यसि.
अपां गर्भमिव जीवसे प्राण बध्नामि त्वा मयि.. (२६)
हे प्राण! आप मुझ से न तो विमुख हों तथा न मुझे त्याग कर अन्यत्र जाएं. जल जिस
प्रकार वाडवाग्नि को धारण करते हैं, उसी प्रकार हम अपनी देह में आप को धारण करते हैं.
(२६)
सूक्त-७ देवता—ब्रह्मचारी
ब्रह्मचारीष्णंश्चरति रोदसी उभे तस्मिन् देवाः संमनसो भवन्ति.
स दाधार पृथिवीं दिवं च स आचार्यं १ तपसा पिपर्ति.. (१)
वेदों का अध्ययन करने वाला अपने तप से धरती और आकाश दोनों में व्याप्त होता है.
इंद्र आदि सभी देव इस ब्रह्मचारी के प्रति अनुग्रह करते हैं. यह ब्रह्मचारी अपने तप से धरती
और स्वर्ग को धारण करता है तथा सन्मार्ग पर चलता हुआ अपने आचार्य का पालन करता
है. (१)
ब्रह्मचारिणं पितरो देवजनाः पृथग् देवा अनुसंयन्ति सर्वे.
गन्धर्वा एनमन्वायन् त्रयस्त्रिंशत् त्रिशताः षट्सहस्राः सर्वान्त्स देवांस्तपसा
पिपर्ति.. (२)
पितर, देवजन एवं इंद्र आदि सभी देव ब्रह्मचारी की रक्षा के लिए उस के पीछे चलते हैं.
गंधर्व भी ब्रह्मचारी का अनुगमन करते हैं. ब्रह्मचारी अपने तप से तैंतीस, तीस और छह हजार
संख्या वाले सभी देवों का पालन करता है. (२)
ebook converter DEMO Watermarks*
आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः.
तं रात्रीस्तिस्र उदरे बिभर्ति तं जातं द्रष्टुमभिसंयन्ति देवाः.. (३)
आचार्य ब्रह्मचारी का उपनयन अर्थात् यज्ञोपवीत संस्कार कर के अपने समीप रखता
हुआ उसे विद्या से संपन्न करता है. आचार्य उस ब्रह्मचारी को तीन रात्रियों तक अपने
अत्यधिक समीप रखता है. चौथे दिन विद्यामय शरीर से उत्पन्न उस ब्रह्मचारी को देखने के
लिए देवगण एकत्र हो कर आते हैं. (३)
इयं समित् पृथिवी द्यौर्द्वितीयेातान्तरिक्षं समिधा पृणाति.
ब्रह्मचारी समिधा मेखलया श्रमेण लोकांस्तपसा पिपर्ति.. (४)
यह पृथ्वी ब्रह्मचारी की पहली समिधा है. द्युलोक अर्थात् स्वर्ग ब्रह्मचारी की दूसरी
समिधा है. ब्रह्मचारी स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य अर्थात् अंतरिक्ष को अग्नि में डाली गई समिधा
के द्वारा पूर्ण करता है. इस प्रकार ब्रह्मचारी समिधा, मेखला, श्रम और तप के द्वारा लोकों को
पूर्ण करता है अर्थात् भर देता है. (४)
पूर्वो जातो ब्रह्मणो ब्रह्मचारी घर्मं वसानस्तपसोदतिष्ठत्.
तस्माज्जातं ब्राह्मणं ब्रह्म ज्येष्ठं देवाश्च सर्वे अमृतेन साकम्.. (५)
सर्व जगत् के कारण ब्रह्म से सब से पहले ब्रह्मचारी उत्पन्न हुआ. उत्पन्न हुआ ब्रह्मचारी
धर्म से अपनेआप को ढकता हुआ तप के द्वारा उठा. उस ब्रह्मचारी रूपी ब्रह्म से ब्राह्मणों का
धन वेद उत्पन्न हुआ. उस वेद से अमृत के साथ अग्नि आदि देव उत्पन्न हुए. (५)
ब्रह्मचर्येति समिधा समिद्धः कार्ष्णं वसानो दीक्षितो दीर्घश्मश्रुः.
स सद्य एति पूर्वस्मादुत्तरं समुद्रं लोकान्संगृह्य मुहुराचरिक्रत्.. (६)
समिधा से उत्पन्न तेज को धारण करता हुआ, नियमों के द्वारा वश में किया गया, लंबी
दाढ़ी वाला ब्रह्मचारी पूर्व सागर से उत्तर सागर की ओर गया. उस ने पृथ्वी, अंतरिक्ष आदि
लोकों को वश में कर के अपने अभिमुख किया. (६)
ब्रह्मचारी जनयन् ब्रह्मापो लोकं प्रजापतिं परमेष्ठिनं विराजम्.
गर्भो भूत्वा मृतस्य योनाविन्द्रो ह भूत्वा ऽ सुरांस्ततर्ह.. (७)
उस ब्रह्मचारी ने ब्राह्मण जाति के जल अर्थात् गंगा आदि नदियों को, स्वर्ग आदि लोकों
को, प्रजाओं की सृष्टि करने वाले प्रजापति को तथा प्रजापति के बाद सृष्टि की रचना करने
वाले परमेष्ठी को उत्पन्न किया. वह ब्रह्मचारी मृत्यु रहित ब्रह्म की सत्ता, रज, तमोगुण वाली
प्रकृति में गर्भ बन कर सब को जन्म देता है. उस ने तप के बल से इंद्र हो कर देवों के विरोधी
असुरों का विनाश किया. (७)
आचार्य स्ततक्ष नभसी उभे इमे उर्वी गम्भीरे पृथिवीं दिवं च.
ebook converter DEMO Watermarks*
ते रक्षति तपसा ब्रह्मचारी तस्मिन् देवाः संमनसो भवन्ति.. (८)
आचार्य ने उसी क्षण आकाश और धरती दोनों को जन्म दिया. ये दोनों विस्तृत और
गंभीर हैं. पृथ्वी विस्तृत है और आकाश गंभीर है. ब्रह्मचारी अपने तप से दोनों की चर्चा करता
है. उस ब्रह्मचारी से सभी देव प्रसन्न होते हैं. (८)
इमां भूमिं पृथिवीं ब्रह्मचारी भिक्षामा जभार प्रथमो दिवं च.
ते कृत्वा समिधावुपास्ते तयोरर्पिता भुवनानि विश्वा.. (९)
सब से पहले उत्पन्न ब्रह्मचारी ने इस विस्तृत भूमि को पहली भिक्षा के रूप में ग्रहण
किया. इस के बाद स्वर्ग को दूसरी भिक्षा के रूप में ग्रहण किया. वह भिक्षा में प्राप्त उन स्वर्ग
और धरती को समिधा बना कर अग्नि की परिचर्या अर्थात् सेवा करता है. स्वर्ग और पृथ्वी के
मध्य सभी प्राणी स्थापित किए गए हैं. (९)
अर्वागन्यः परो अन्यो दिवस्पृष्ठाद् गुहा निधी निहितौ ब्राह्मणस्य.
तौ रक्षति तपसा ब्रह्मचारी तत् केवलं कृणुते ब्रह्म विद्वान्.. (१०)
स्वर्ग के ऊपरी भाग से तथा उस के नीचे के भाग अर्थात् धरती पर वेद रूपी खजाने को
आचार्य की हृदयरूपी गुफा में छिपा दिया. दूसरा खजाना अर्थात् वेद के द्वारा प्रतिपाद्य देवों
को स्थापित किया. वेद पढ़ने वाले से संबंधित इन दोनों खजानों की रक्षा ब्रह्मचारी अपने तप
से करता है. वह वेद के रूप में उस के विषय ब्रह्म का ही साक्षात्कार करता है. (१०)
अर्वागन्य इतो अन्यः पृथिव्या अग्नी समेतो नभक्षी अन्तरेमे.
तयोः श्रयन्ते रश्मयो ऽ धि दृढास्ताना तिष्ठति तपसा ब्रह्मचारी.. (११)
इस स्वर्ग के नीचे एक सूर्यात्मक अग्नि है और दूसरी पृथ्वी के ऊपर है. इस स्वर्ग और
धरती के मध्य दोनों अग्नियां आपस में मिल कर उदय होती हैं. उन सूर्य और अग्नि से
संबंधित किरणें धरती और स्वर्ग के मध्य आश्रय लेती हैं. ब्रह्मचारी अपने तप की महिमा से
उन का देवता बनता है. (११)
अभिक्रन्दन् स्तनयन्नरुणः शितिङ्गो बृहच्छेपो ऽ नु भूमौ जभार.
ब्रह्मचारी सिञ्चति सानौ रेतः पृथिव्यां तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः.. (१२)
मेघों में गर्जन करता हुआ, जल पूर्ण मेघ को प्राप्त वह ब्रह्मचारी वरुण बन कर अपने
जलरूपी वीर्य को ऊंचे स्थानों पर बरसाता है. उस जल से धरती पर चारों दिशाएं प्राणियों
को धारण करती हैं. (१२)
अग्नौ सूर्ये चन्द्रमसि मातरिश्वन् ब्रह्मचार्य १ प्सु समिधमा दधाति.
तासामर्चींषि पृथगभ्रे चरन्ति तासामाज्यं पुरुषो वर्षमापः.. (१३)
ebook converter DEMO Watermarks*
ब्रह्मचारी अग्नि में, सूर्य में, चंद्रमा में, वायु में और जल में समिधा को धारण करता है.
अग्नि आदि की किरणें अंतरिक्ष अर्थात् आकाश में अलग-अलग विचरण करती हैं. वे किरणें
गायों में घृत को, पुरुष और स्त्री में संतान को तथा वर्षा में जल को उत्पन्न करती हैं. (१३)
आचार्यो मृत्युर्वरुणः सोम ओषधयः पयः.
जीमूता आसन्त्सत्वानस्तैरिदं स्व १ राभृतम्.. (१४)
आचार्य ही मृत्यु, वरुण, सोम, जड़ीबूटियां, फसलें एवं जल है. आचार्य रूपी वरुण के
अनुचर जलपूर्ण मेघ हुए. उन मेघों ने अपने भीतर वर्षा के निमित्त जल धारण किया है. (१४)
अमां घृतं कृणुते केवलमाचार्यो भूत्वा वरुणो यद्यदैच्छत् प्रजापतौ.
तद् ब्रह्मचारी प्रायच्छत् स्वन्मित्रो अध्यात्मनः.. (१५)
वरुण देव आचार्य हो कर जल को ही उत्पन्न करते हैं. वह वरुण अपने जनक प्रजापति
अर्थात् ब्रह्म से जो चाहता है, मित्र देव बन कर अपने ब्रह्मचर्य के माहात्म्य के द्वारा अपने
शरीर से ही प्राप्त कर लेता है. (१५)
आचार्यो ब्रह्मचारी ब्रह्मचारी प्रजापतिः.
प्रजापतिर्वि राजति विराडिन्द्रो ऽ भवद्वशी.. (१६)
आचार्य पहले विद्या का उपदेश कर के ब्रह्मचारी के रूप में उत्पन्न हुआ. ब्रह्मचारी तप
के द्वारा अधिक महिमा को प्राप्त कर के जगत् स्रष्टा प्रजापति हुआ. प्रजापति विराट् हुआ.
बाद में वह स्वतंत्र इंद्र हुआ. (१६)
ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति.
आचार्यो ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते.. (१७)
ब्रह्मचर्य रूपी तप से राजा राष्ट्र की रक्षा करता है. आचार्य भी ब्रह्मचर्य के नियम के
द्वारा अपने शिष्य को अपने समान बनाना चाहता है. (१७)
ब्रह्मचर्येण कन्या ३ युवानं विन्दते पतिम्.
अनड्वान् ब्रह्मचर्येणाश्वो घासं जिगीर्षति.. (१८)
ब्रह्मचर्य के द्वारा कन्या युवा पति को प्राप्त करती है. ब्रह्मचर्य के द्वारा बैल और घोड़ा
घास खाने की इच्छा करता है. (१८)
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत.
इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्व १ राभरत्.. (१९)
ब्रह्मचर्य रूपी तप के द्वारा देवों ने मृत्यु का हनन कर दिया अर्थात् देव अमर हो गए. इंद्र
ebook converter DEMO Watermarks*
ने ब्रह्मचर्य के द्वारा देवों के लिए स्वर्ग पर अधिकार किया. (१९)
ओषधयो भूतभव्यमहोरात्रे वनस्पतिः.
संवत्सरः सहर्तुभिस्ते जाता ब्रह्मचारिणः... (२०)
जड़ीबूटियां और फसलें, भूतकाल में उत्पन्न और भविष्य में उत्पन्न होने वाला प्राणि
समूह, दिन और रात, ऋतुओं के साथ संवत्सर—ये सब ब्रह्मचर्य से उत्पन्न हुए. (२०)
पार्थिवा दिव्याः पशव आरण्या ग्राम्याश्च ये.
अपक्षाः पक्षिणश्च ये ते जाता ब्रह्मचारिणः... (२१)
पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य, देव, जंगली और ग्रामीण पशु, बिना पंखों के और पंखों
वाले प्राणी सभी ब्रह्मचर्य से उत्पन्न हुए. (२१)
पृथक् सर्वे प्राजापत्याः प्राणानात्मसु बिभ्रति.
तान्सर्वान् ब्रह्म रक्षति ब्रह्मचारिण्याभृतम्.. (२२)
प्रजापति के द्वारा उत्पन्न देव, मनुष्य आदि सभी अपने शरीरों में प्राणों को धारण करते
हैं. उन सभी की रक्षा आचार्य के द्वारा ब्रह्मचारी में धारण किया हुआ अर्थात् पढ़ाया हुआ वेद
करता है. (२२)
देवानामेतत् परिषूत्मनभ्यारूढं चरति रोचमानम्.
तस्माज्जातं ब्राह्मणं ब्रह्म ज्येष्ठं देवाश्च सर्वे अमृतेन साकम्.. (२३)
इस अपरोक्ष ब्रह्म का साक्षात्कार देवों ने किया है. यह ब्रह्म अपने प्रकाश से प्रकाशित
और सब से उत्कृष्ट है. ब्राह्मण से सब से अधिक बढ़ा हुआ और प्रशंसनीय वेद रूपी ब्रह्म
उत्पन्न हुआ है. अग्नि आदि सब देव अपने द्वारा उपभोग किए जाने वाले अमृत के साथ
उत्पन्न हुए. (२३)
ब्रह्मचारी ब्रह्म भ्राजद् बिभर्ति तस्मिन् देवा अधि विश्वे समोताः.
प्राणापानौ जनयन्नाद् व्यानं वाचं मनो हृदयं ब्रह्म मेधाम्.. (२४)
ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला पुरुष दीप्ति वाले वेदरूपी ब्रह्म को धारण करता है. उस
वेद से सभी देव संबंधित हैं. देवों का निवास बना हुआ ब्रह्मचारी प्राण और अपान के बाद
ज्ञान को, मन, वाणी, हृदय और मेधा को उत्पन्न करता है. (२४)
चक्षुः श्रोत्रं यशो अस्मासु धेह्यन्नं रेतो लोहितमुदरम्.. (२५)
हे ब्रह्मचारी रूपी ब्रह्म! हम स्तोत्राओं में चक्षु, क्षेत्र अर्थात् यज्ञ को धारण करो. तुम
अन्न, वीर्य, रक्त तथा संपूर्ण शरीर को हम में धारण करो. (२५)
ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-८ देवता—अग्नि
तानि कल्पद् ब्रह्मचारी सलिलस्य पृष्ठे तपो ऽ तिष्ठत् तप्यमानः समुद्रे.
स स्नातो बभ्रुः पिङ्गलः पृथिव्यां बहु रोचते.. (२६)
ब्रह्मचारी उन अन्न आदि को उत्पन्न करता हुआ, जल के ऊपर तपस्या करता हुआ
सागर पर वर्तमान रहता है. स्नान से पवित्र हुआ एवं कबरे रंग के साथ पीले रंग का होता
हुआ पृथ्वी पर अधिक दीप्त होता है. अर्थात् अधिक चमकता है (२६)
सूक्त-८ देवता—अग्नि
अग्निं ब्रूमो वनस्पतीनोषधीरुत वीरुधः.
इन्द्रं बृहस्पतिं सूर्यं ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१)
हम अग्नि की, वनस्पतियों की, जड़ीबूटियों और फसलों की, वृक्षों की, इंद्र की,
बृहस्पति की तथा सूर्य की स्तुति करते हैं. वे हमें सभी पापों से मुक्त करें. (१)
ब्रूमो राजानं वरुणं मित्रं विष्णुमथो भगम्.
अंशं विवस्वन्तं ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (२)
हम तेजस्वी वरुण की, मित्र की, विष्णु की, भग की, अंश और विवस्वान् अर्थात् सूर्य
की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (२)
ब्रूमो देवं सवितारं धातारमुत पूषणम्.
त्वष्टारमग्रियं ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (३)
हम दानादि गुणों से युक्त सविता, धाता, पूषा, त्वष्टा और अग्नि की स्तुति करते हैं. वे
हमें पाप से मुक्त करें. (३)
गन्धर्वाप्सरसो ब्रूमो अश्विना ब्रह्मणस्पतिम्.
अर्यमा नाम यो देवस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (४)
हम प्रथम गिने जाने वाले गंधर्वों की, अप्सराओं की, अश्विनीकुमारों की, त्वष्टा की
स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (४)
अहोरात्रे इदं ब्रूमः सूर्याचन्द्रमसावुभा.
विश्वानदित्यान् ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (५)
हम दिनरात तथा सूर्य चंद्रमा दोनों की स्तुति करते हैं. हम सभी आदित्यों की स्तुति
करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (५)
वातं ब्रूमः पर्जन्यमन्तरिक्षमथो दिशः.
आशाश्च सर्वा ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (६)
हम वायु की, मेघ की, आकाश की तथा दिशाओं की स्तुति करते हैं. हम सभी
विदिशाओं अर्थात् दिशाओं के कोनों की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (६)
मुञ्चन्तु मा शपथ्यादहोरात्रे अथो उषाः.
सोमो मा देवो मुञ्चतु यमाहुश्चन्द्रमा इति.. (७)
दिन, रात और उषाएं शपथ से उत्पन्न पाप से हमारी रक्षा करें. वे सोम देव मुझे पाप से
मुक्त करें, जिन्हें लोग चंद्रमा कहते हैं. (७)
पार्थिवा दिव्याः पशव आरण्या उत ये मृगाः.
शकुन्तान् पक्षिणो ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (८)
हम पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों, देवों, ग्रामीण पशुओं और सिंह आदि जंगली पशुओं
की स्तुति करते हैं. हम शकुन बने हुए पक्षियों की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें.
(८)
भवाशर्वाविदं ब्रूमो रुद्रं पशुपतिश्च यः.
इषूर्या एषां संविद्म ता नः सन्तु सदा शिवाः.. (९)
हम उन भव, शर्व, रुद्र और पशुपति की स्तुति करते हैं. हम इन देवों के बाणों को
जानते हैं. वे सदा हमारे लिए कल्याणकारी हों. (९)
दिवं ब्रूमो नक्षत्राणि भूमिं यक्षाणि पर्वतान्.
समुद्रा नद्यो वेशन्तास्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१०)
हम स्वर्ग की, नक्षत्रों अर्थात् तारों की, भूमि की, यक्षों और पर्वतों की स्तुति करते हैं. जो
सागर, नदियां और सरोवर हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (१०)
सप्तर्षीन् वा इदं ब्रूमो ऽ पो देवीः प्रजापतिम्.
पितॄन् यमश्रेष्ठान् ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (११)
हम उन सप्तर्षियों की, जल देवियों की और प्रजापति की स्तुति करते हैं. हम ऐसे
पितरों की स्तुति करते हैं, जिन में यमराज श्रेष्ठ हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (११)
ये देवा दिविषदो अन्तरिक्षसदश्च ये.
पृथिव्यां शक्रा ये श्रितास्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१२)
जो देव स्वर्ग में निवास करते हैं और अंतरिक्ष अर्थात् धरती और आकाश के मध्य
निवास करते हैं, जो देव पृथ्वी पर आश्रित हैं, वे हमें पाप से मुक्त करें. (१२)
ebook converter DEMO Watermarks*
आदित्या रुद्रा वसवो दिवि देवा अथर्वाणः.
अङ्गिरसो मनीषिणस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१३)
आदित्य, रुद्र और वसु देव स्वर्ग में निवास करते हैं. जो देव पृथ्वी पर शक्तिशाली हैं, वे
हमें पाप से मुक्त करें. वेद मंत्रों के दृष्टा अंगिरा गोत्रीय ऋषि तथा मनीषी पाप से हमारी रक्षा
करें. (१३)
यज्ञं ब्रूमो यजमानमृचः सामानि भेषजा.
यजूंषि होत्रा ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१४)
हम यज्ञ की, यजमान की, ऋचाओं की, सामवेद के मंत्रों की, यजुर्वेद के मंत्रों तथा इन
वेदों में बताई गई ओषधियों एवं होताओं की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (१४)
पञ्च राज्यानि वीरुधां सोमश्रेष्ठानि ब्रूमः.
दर्भो भङ्गो यवः सहस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१५)
फल पकने पर उन्नत होने वाली जड़ीबूटियों और फसलों में जो पांच श्रेष्ठ हैं और इन के
राजा हैं, हम उन की स्तुति करते हैं. दर्भ भाग, जौ और सह नाम की विशेष ओषधि की स्तुति
करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (१५)
अरायान् ब्रूमो रक्षांसि सर्पान् पुण्यजनान् पितॄन्.
मृत्यूनेकशतं ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१६)
हम दान के प्रतिबंधक हिंसकों, राक्षसों, सर्पों, यातुधानों और पितरों की स्तुति करते हैं.
मैं एक से एक मृत्युओं की स्तुति करता हूं. वे मुझे पाप से मुक्त करें. (१६)
ऋतून्र् ब्रूम ऋतुपतीनार्तवानुत हायनान्.
समाः संवत्सरान् मासांस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१७)
हम ऋतुओं की, ऋतुओं के स्वामियों की, ऋतुओं से संबंधित पदार्थों की, अर्थात् चंद्र
वर्षों की, सूर्य वर्षों की, संवत्सरों की तथा मासों की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें.
(१७)
एत देवा दक्षिणतः पश्चात् प्राञ्च उदेत.
पुरस्तादुत्तराच्चक्रा विश्वे देवाः समेत्य ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१८)
हे दक्षिण दिशा में स्थित देवो! तुम आओ. चारों दिशाओं में स्थित सभी देव यहां यज्ञ में
आ कर हमें पाप से मुक्त करें. (१८)
विश्वान् देवानिदं ब्रूमः सत्यसंधानृतावधः.
विश्वाभिः पत्नीभिः सह ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१९)
हम सच्ची प्रतिज्ञा वाले, सत्य अथवा यज्ञ की वृद्धि करने वाले सभी देवों की स्तुति
करते हैं. वे अपनी पत्नियों के साथ यहां हमारे यज्ञ में आएं और हमें पाप से मुक्त करें. (१९)
सर्वान् देवानिदं ब्रूमः सत्यसंधानृतावृधः.
सर्वाभिः पत्नीभिः सह ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (२०)
हम कहे गए और न कहे गए सच्ची प्रतिज्ञा वाले और यज्ञ अथवा सत्य की रक्षा करने
वाले सभी देवों की स्तुति करते हैं. वे सभी अपनी पत्नियों के साथ आएं और हमें पाप से
मुक्त करें. (२०)
भूतं ब्रूमो भूतपतिं भूतानामुत यो वशी.
भूतानि सर्वा संगत्य ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (२१)
हम भूत की, भूतों के स्वामी की तथा भूतों को वश में करने वाले की स्तुति करते हैं.
सभी भूत मिल कर हमें पाप से मुक्त करें. (२१)
या देवीः पञ्च प्रदिशो ये देवा द्वादशर्तवः.
संवत्सरस्य ये दंष्ट्रास्ते नः सन्तु सदा शिवाः.. (२२)
पांच प्रधान दिशाओं की जो देवियां हैं तथा बारह मासों के स्वामी जो देव हैं और स्वतंत्र
रूप प्रजापति की जो दाढ़ें अर्थात् पक्ष, सप्ताह आदि हैं, वे हमें पाप से मुक्त करें. (२२)
यन्मातली रथक्रीतममृतं वेद भेषजम्.
तदिन्द्रो अप्सु प्रावेशयत् तदापो दत्त भेषजम्.. (२३)
इंद्र का सारथी मातलि रथ के बदले में खरीदी हुई मृत्यु का नाश करने वाली ओषधि को
जानता है. इंद्र ने उस ओषधि को जल में डुबा दिया है. जल हमें वह ओषधि प्रदान करे.
(२३)
सूक्त-९ देवता—हवन से बचा भात
उच्छिष्टे नाम रूपं चोच्छिष्टे लोक आहितः.
उच्छिष्ट इन्द्रश्चाग्निश्च विश्वमन्तः समाहितम्.. (१)
उच्छिष्ट अर्थात् होम के बाद बचे हुए भात में नाम और रूप वाला विश्व स्थित है. इस
उच्छिष्ट में पृथ्वी आदि सभी लोक स्थित हैं. उच्छिष्ट ही इंद्र और अग्नि हैं. होम के बाद शेष
बचे हुए इस भात में ईश्वर ने सारा जगत् स्थापित किया है. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*
उच्छिष्टे द्यावापृथिवी विश्वं भूतं समाहितम्.
आपः समुद्र उच्छिष्टे चन्द्रमा वात आहितः.. (२)
उच्छिष्ट अर्थात् होम करने के बाद बचे हुए भात में स्वर्ग, पृथ्वी तथा उन में स्थित प्राणी
आश्रित हैं. इस उच्छिष्ट में जल, सागर, चंद्रमा और वायु स्थित हैं. (२)
सन्नुच्छिष्टे असंश्चोभौ मृत्युर्वाजः प्रजापतिः.
लौक्या उच्छिष्ट आयत्ता वश्र द्रश्चापि श्रीमंयि.. (३)
उच्छिष्ट अर्थात् होम करने के बाद शेष बचे भात में सत् और असत् दोनों के अतिरिक्त
मृत्यु, मृत्यु का बल, प्रजापति तथा प्रजाएं स्थापित हैं. वरुण और सोम भी इस में स्थित हैं.
उन की कृपा से मुझ में भी श्री स्थित हो. (३)
दृढो दृंहस्थिरो न्यो ब्रह्म विश्वसृजो दश.
नाभिमिव सर्वतश्चक्रमुच्छिष्टे देवताः श्रिताः.. (४)
दृढ़ अंग वाला देव, दृढ़ होने के कारण स्थिर किया हुआ लोम, सभी प्राणी, जगत् का
कारण ब्रह्म, दस प्राण एवं सभी देवता हुतशिष्ट अर्थात् हवन करने के बाद शेष बचे भात में
उसी प्रकार आश्रित हैं, जिस प्रकार रथ का पहिया धुरी पर आश्रित रहता है. (४)
ऋक् साम यजुरुच्छिष्ट उद्गीथः प्रस्तुतं स्तुतम्.
हिङ्कार उच्छिष्टे स्वरः साम्नो मेडिश्च तन्मयि.. (५)
ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद के मंत्र, इन का गाया हुआ भाग एवं प्रस्तुत स्तुतियां
उच्छिष्ट अर्थात् होम के बाद बचे हुए भात में आश्रित हैं. सभी उद्गाताओं के द्वारा प्रयोग
किया जाता हुआ ‘हि’ शब्द, सामवेद के स्वर, सामवेद संबंधित वाणी—ये सब यज्ञ शेष के
लिए मुझ में स्थित हैं. (५)
ऐन्द्राग्नं पावमानं महानाम्नीर्महाव्रतम्.
उच्छिष्टे यज्ञस्याङ्गान्यन्तर्गर्भइव मातरि.. (६)
इंद्र और अग्नि की स्तुति से संबंधित सामवेद के मंत्र, तीनों में सोम देवता से संबंधित
सामवेद के मंत्र, महानाम्नी और महाव्रत नाम के स्तोत्र तथा यज्ञ के अंग होम के बाद बचे
भात में उसी प्रकार स्थित हैं, जिस प्रकार गर्भ माता के पेट में स्थित रहता है. (६)
राजसूयं वाजपेयमग्निष्टोमस्तदध्वरः.
अर्काश्वमेधावुच्छिष्टे जीवबर्हिर्मदिन्तमः.. (७)
राजसूय, वाजपेय और अग्निष्टोम नाम के यज्ञ हिंसा रहित हैं. अर्क, अश्वमेध, जीवबर्हि
तथा मादक सोमयाग—ये सभी उच्छिष्ट अर्थात् होम से शेष बचे भात में आश्रित हैं. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*
अग्न्याधेयमथो दीक्षा कामप्रश्छन्दसा सह.
उत्सन्ना यज्ञा: सत्राण्युच्छिष्टे ऽ धि समाहिता:.. (८)
अग्नि के आधान के पश्चात सोम याग की दीक्षा, यजमान की इच्छाएं पूर्ण करने वाले
मंत्रों के साथ लुप्तप्राय यज्ञ एवं सोमयाग उच्छिष्ट रूपी ब्रह्म में आश्रित हैं. (८)
अग्निहोत्रं च श्रद्धा च वषट्कारो व्रतं तप:.
दक्षिणेष्टं पूर्तं चोच्छिष्टे ऽ धि समाहिता:.. (९)
अग्नि होम, श्रद्धा, वषट शब्द, व्रत, तप, दक्षिणा, वेदों में बताए गए याग, होमादि कर्म
तथा स्मृतियों और पुराणों में बताए गए बावड़ी, कुआं आदि बनवाने के कर्म उच्छिष्ट अर्थात्
यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (९)
एकरात्रो द्विरात्र: सद्य: क्री: प्रक्रीरुक्थ्य:.
ओतं निहितमुच्छिष्टे यज्ञस्याणूनि विद्यया.. (१०)
एक रात्रि वाला सोमयाग, दो रात्रियों तक चलने वाला सोमयाग, एक दिन में होने वाले
क्री और प्रक्री नाम के सोमयाग, उक्थों वाला सोमयाग, यज्ञ से संबंधित सूक्ष्म रूप, भावना
के साथ यज्ञ शेष अर्थात् यज्ञ के पश्चात बचे हुए भातरूपी ब्रह्म में स्थित है. (१०)
चतूरात्र: पञ्चरात्र: षड्रात्रश्चोभय: सह.
षोडशी सप्तरात्रश्चोच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे ये यज्ञा अमृते हिता:.. (११)
चार रात्रियों वाला, पांच रात्रियों वाला, छह रात्रियों वाला तथा इन से दूनी रात्रियों वाले
सोमयाग, सोलह रात्रियों वाले, सात रात्रियों वाले सोमयाग तथा अमृत का फल देने वाले जो
यज्ञ हैं, वे सब उच्छिष्ट अर्थात् यज्ञशेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. (११)
प्रतीहारो निधनं विश्वजिच्चाभिजित्च य:.
साह्नातिरात्रावुच्छिष्टे द्वादशाहो ऽ पि तन्मयि.. (१२)
उद्गीथ के बाद गाए जाने वाले सामवेद के मंत्र, प्रतीहार तथा सोमयागों की समाप्ति के
मंत्र, विश्वजित और अभिजित नाम के यज्ञ, एक दिन में होने वाला सोमयाग साह्न, अतिरात्र
नाम के जो सोमयाग यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं, वे सब मुझ में हों अर्थात् मेरे द्वारा किए
जाएं. (१२)
सूनृता संनति: क्षेम: स्वधोर्जामृतं सह:.
उच्छिष्टे सर्वे प्रत्यञ्च: कामा: कामेन तात्पु:.. (१३)
सूनृता, विनम्र भाव, क्षेम, स्वधा, अमृत, बल तथा सामने उपस्थित सभी कामनाएं
यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. ये सभी कामना करने वाले यजमान को तृप्त करते हैं. (१३)
ebook converter DEMO Watermarks*
नव भूमीः समुद्रा उच्छिष्टे ऽ धि श्रिता दिवः.
आ सूर्यो भात्युच्छिष्टे ऽ होरात्रे अपि तन्मयि.. (१४)
नौ खंडों वाली पृथ्वी, सात सागर तथा स्वर्ग यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित है. सूर्य और
रात दिन भी उच्छिष्ट अर्थात् यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. ये सभी मेरे द्वारा हों. (१४)
उपहव्यं विषूवन्तं ये च यज्ञा गुहा हिताः.
बिभर्ति भर्ता विश्वस्योच्छिष्टो जनितुः पिता.. (१५)
उपहव्य, विषूवान नाम के सोमयाग तथा जो सोमयाग ज्ञात नहीं है, विश्व का
भरणपोषण करने वाला तथा सवनयज्ञ का अनुष्ठान करने वाले का पालनकर्ता यज्ञशेष रूपी
ब्रह्म है. (१५)
पिता जनितुरुच्छिष्टो ऽ सोः पौत्रः पितामहः.
स क्षियति विश्वस्येशानो वृषा भूम्यामत्तिघ्न्यः.. (१६)
यज्ञशेष रूपी ब्रह्म अपने को उत्पन्न करने वाले का पिता है. यह भात प्राण वायु का पौत्र
और पितामह है. विश्व का स्वामी और कामनाएं पूर्ण करने वाला वह सब को अतिक्रमण कर
के भूमि पर निवास करता है. (१६)
ऋतं सत्यं तपो राष्ट्रं श्रमो धर्मश्च कर्म च.
भूतं भविष्यदुच्छिष्टे वीर्यं लक्ष्मीर्बलं बले.. (१७)
ऋत, सत्य, तप, राष्ट्र, श्रम, धर्म, कर्म, भूतकाल, भविष्यकाल, वीर्य, लक्ष्मी और बल
यज्ञशेष रूपी बल में आश्रित है. (१७)
समृद्धिदोज आकूतिः क्षत्रं राष्ट्रं षडुर्व्यः.
संवत्सरो ऽ ध्युच्छिष्ट इडा प्रैषा ग्रहा हविः.. (१८)
समृद्धि, ओज, आकूति अर्थात् मन चाहे फल संबंधी संकल्प, क्षत्रिय का तेज, राष्ट्र, छह
पृथिवियां, संवत्सर, इडा नाम की देवी, यज्ञ कर्मों में ऋत्विजों के प्रेरक मंत्र, गृह और हवि ये
सभी यज्ञ शेषरूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (१८)
चतुर्होतार आप्रियश्चातुर्मास्यानि नीविदः.
उच्छिष्टे यज्ञा होत्राः पशुबन्धास्तदिष्टयः.. (१९)
चतुर्होत्र नाम के मंत्र, पशुयाग संबंधी मंत्र, चार मासों में किए जाने वाले चार पर्व, स्तुति
संबंधी देव के उत्कर्ष को बताने वाले मंत्र, नीविद, यज्ञ, होता, इष्टियां—ये सब यज्ञशेष रूपी
ब्रह्म में स्थित हैं. (१९)
ebook converter DEMO Watermarks*
अर्धमासाश्च मासाश्चार्तवा ऋतुभिः सह.
उच्छिष्टे घोषिणीरापः स्तनयित्नुः श्रुतिर्मही.. (२०)
आधा महीना अर्थात् पक्ष, महीने, ऋतुओं के साथ उन में उत्पन्न होने वाले पदार्थ, शब्द
करने वाले जल, गर्जन करते हुए मेघ और पवित्र भूमि—ये सभी यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित
हैं. (२०)
शर्कराः सिकता अश्मान ओषधयो वीरुधस्तृणा.
अभ्राणि विद्युतो वर्षमुच्छिष्टे संश्रिता श्रिता.. (२१)
पत्थरों के छोटे टुकड़े, बालू, पत्थर, जड़ीबूटी और फसलें, लताएं, तिनके, मेघ,
बिजलियां और वर्षा ये सब यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (२१)
राद्धिः प्राप्तिः समाप्तिर्व्याप्तिर्मह एधतुः.
अत्याप्तिरुच्छिष्टे भूतिश्चाहिता निहिता हिता.. (२२)
सिद्धि, प्राप्ति, समाप्ति, व्याप्ति, तेज, वृद्धि, अत्यधिक प्राप्ति, समृद्धि तथा सामने
स्थित हितकारी पदार्थ यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित है. (२२)
यच्च प्राणति प्राणेन यच्च पश्यति चक्षुषा.
उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२३)
जो प्राण वायु के द्वारा जीवित रहता है, जो आंखों से देखता है, स्वर्ग में स्थित देव और
स्वर्ग—ये सभी यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न है. (२३)
ऋचः सामानि च्छन्दांसि पुराणं यजुषा सह.
उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२४)
ऋग्वेद और सामवेद के मंत्र, छंद, यजुर्वेद के सहित प्राचीन मंत्र, स्वर्ग और स्वर्ग में
स्थित देव—ये सभी यज्ञ रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. (२४)
प्राणापानौ चक्षुः श्रोत्रमक्षितिश्च क्षितिश्च या.
उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२५)
प्राण और अपान वायु, नेत्र, कान, विनाश का अभाव और विनाश, स्वर्ग और स्वर्ग में
स्थित देव—ये सभी यज्ञशेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. (२५)
आनन्दा मोदाः प्रमुदोऽभीमोदमुश्च ये.
उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२६)
विषयों के उपभोग से उत्पन्न आनंद नाम के विशेष सुख, हर्ष, अधिक प्रसन्नता एवं इन्हें
ebook converter DEMO Watermarks*
देने वाले पदार्थ, स्वर्ग और स्वर्ग में स्थित देव—ये सभी यज्ञशेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए.
(२६)
देवाः पितरो मनुष्या गन्धर्वाप्सरसश्च ये.
उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२७)
देव, पितर, मनुष्य, गंधर्व, अप्सराएं, स्वर्ग और स्वर्ग में स्थित देव—ये सभी यज्ञ शेष
रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए. (२७)
सूक्त-१० देवता—मन्यु
यन्मन्युर्जायामावहत् संकल्पस्य गृहादधि.
क आसं जन्याः के वराः क उ ज्येष्ठवरो ऽ भवत्.. (१)
ब्रह्म माया के अभिमुख उसी प्रकार प्राप्त हुआ, जिस प्रकार पति पत्नी के सामने जाता
है. ब्रह्म ने माया को उसी प्रकार प्राप्त किया, जिस प्रकार पति अपनी पत्नी को घर से प्राप्त
करता है. ब्रह्मा की सृष्टि रचना की इच्छा में वधू पक्ष के बंधन कौन थे? कन्या का वरण करने
वाले कौन थे? उस समय प्रधान वर अर्थात् विवाह करने वाला कौन था? (१)
तपश्चैवास्तां कर्म चान्तर्महत्यर्णवे.
त आसं जन्यास्ते वरा ब्रह्म ज्येष्ठवरो ऽ भवत्.. (२)
उस सृष्टि रचना के समय सृष्टि की रचना करने वाले परमेश्वर का तप और कर्म ही उस
समय स्थित थे. यह तप और कर्म प्रलय काल के सागर का मंत्र था. विवाह के मुहूर्त पर जो
कन्या पक्ष वाले बंधन थे, वे ही विवाह करने वाले थे. ब्रह्म उन में सब से बड़ा वर था. (२)
दश साकमजायन्त देवा देवेभ्यः पुरा.
यो वै तान् विद्यात् प्रत्यक्षं स वा अद्य महद् वदेत्.. (३)
अग्नि आदि देवों की उत्पत्ति से पहले ही ज्ञानेंद्रियां और कर्मेंद्रियां उत्पन्न हुईं. जो
उपासक उन देवों को जान सकेगा, वह प्रत्यक्ष ही ब्रह्म का उपदेश करेगा. (३)
प्राणापानौ चक्षुः श्रोत्रमक्षितिश्च क्षितिश्च या.
व्यानोदानौ वाङ्मनस्ते वा आकूतिमावहन्.. (४)
प्राण और अपान वायु, नयन, कान, क्षीण होने वाली क्रिया शक्ति, क्षय रहित ब्रह्म,
व्यान और उदान वायुएं, वाणी और मन ने देवकृत संकल्प को धारण किया. (४)
अजाता आसन्नृतवो ऽ थो धाता बृहस्पतिः.
इन्द्राग्नी अश्विना तर्हि कं ते ज्येष्ठमुपासत.. (५)
ebook converter DEMO Watermarks*
सृष्टि रचना के समय वसंत आदि ऋतुएं उत्पन्न नहीं हुई थीं. धाता, बृहस्पति, इंद्र, अग्नि
तथा दो अश्विनीकुमार भी उस समय उत्पन्न नहीं हुए थे. धाता आदि वे देव अपने जन्मदाता
ब्रह्म की उपासना कर रहे थे. (५)
तपश्चैवास्तां कर्म चान्तर्महत्यर्णवे.
तपो ह जज्ञे कर्मणस्तत् ते ज्येष्ठमुपासत.. (६)
प्रलय काल के महासागर में तप और कर्म ही थे. तप कर्म से उत्पन्न हुआ था. वे धाता
आदि सृष्टि के कारण बने हुए ब्रह्म की उपासना कर रहे थे. (६)
येत आसीद् भूमिः पूर्वा यामद्धात्तय इद् विदुः.
यो वै तां विद्यान्नामथा स मन्येत पुराणवित्.. (७)
सामने वर्तमान इस भूमि से पहले जो भूमि थी. उसे तप के प्रभाव से शक्ति प्राप्त करने
वाले ऋषि जानते थे. जो अतीत काल के कल्प में स्थित उस भूमि को जो जानेगा, वह
प्राचीन अर्थ को जानने वाला माना जाएगा. (७)
कुत इन्द्रः कुतः सोमः कुतो अग्निरजायत.
कुतस्त्वष्टा समभवत् कुतो धाताजायत.. (८)
कहां से इंद्र, कहां से सोम और कहां से अग्नि उत्पन्न हुई? त्वष्टा कहां से उत्पन्न हुआ
तथा धाता की उत्पत्ति कहां से हुई? (८)
इन्द्रादिन्द्रः सोमात् सोमो अग्नेरग्निरजायत.
त्वष्टा ह जज्ञे त्वष्टुर्धातुर्धाताजायत.. (९)
पूर्व काल में जो इंद्र थे, उन से इन वर्तमान काल के इंद्र की उत्पत्ति हुई. इसी सोम से
सोम, अग्नि से अग्नि, त्वष्टा से त्वष्टा और धाता से धाता उत्पन्न हुए. (९)
ये त आसन् दश जाता देवा देवेभ्यः पुरा.
पुत्रेभ्यो लोकं दत्त्वा कस्मिंस्ते लोक आसते.. (१०)
प्राचीन काल में देवों से जो दस देव उत्पन्न हुए, वे अपने पुत्रों को यह लोक दे कर भी
स्वयं किस लोक में निवास करते हैं? (१०)
यदा केशानस्थि स्नाव मांसं मज्जानमाभरत्.
शरीरं कृत्वा पादवत् कं लोकमनुप्राविशत्.. (११)
जिस सृष्टि रचना के समय रचना करने वाले ने केशों को, अस्थियों को, स्नायुओं अर्थात्
नसों को, मांस को और मज्जा अर्थात् चरबी को एकत्र किया. हाथपैरों वाले शरीर की रचना
ebook converter DEMO Watermarks*