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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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किया है और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं ने इसे वहीं पहुंचा दिया, जहां इसे जाना
चाहिए था. मैंने सविता देव के प्रपदों अर्थात् अर्थात् पंजों की सहायता से उस का सेवन
किया है, यह ओदन समस्त अंगों से युक्त सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला है. जो
इस ओदन को उस विधि से सेवन करना जानता है, वही समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों
सहित और संपूर्ण शरीर वाला हैं. वह स्वर्ग आदि श्रेष्ठ स्थानों में स्थित होता है. (१६)
ततश्चैनमन्याभ्यां हस्ताभ्यां प्राशीर्याभ्यां चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्.
ब्राह्मणं हनिष्यसीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
ऋतस्य हस्ताभ्याम्. ताभ्यामेनं प्राशिषं ताभ्यामेनमजीगमम्.
एष वा ओदनः सर्वाङ्गः सर्वपरुः सर्वतनूः. सर्वाङ्ग एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं
भवति य एवं वेद.. (१७)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे—“हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने इस
ओदन को जिन हाथों की सहायता से सेवन किया उस के अतिरिक्त अर्थात् लौकिक हाथों से
यदि इस ओदन का सेवन किया है. यदि उस से भिन्न अर्थात् लौकिक हाथों की सहायता से
उस ब्रह्मौदन का सेवन किया तो ब्राह्मणों की हत्या करोगे अथवा तुम्हें ब्रह्महत्या का पाप
लगेगा. इस के उत्तर के रूप में शिष्य अपने गुरु से कहे—मैं ने इस ओदन का सेवन न
पराङ्मुख हो कर किया है, न सामने से खाया है और न आत्माभिमुख हो कर खाया है. मैं ने
ऋतु रूपी हाथों की सहायता से इस ओदन का सेवन किया है. मैंने ओदन को वहीं पहुंचा
दिया है, जहां उसे जाना था. यह ओदन समस्त अंगों से युक्त, सभी जोड़ों वाला और संपूर्ण
अंगों सहित है. इस विधि से जो इस ओदन का सेवना करना जाता. वह समस्त अंगों वाला है.
सभी जोड़ों से युक्त और संपूर्ण शरीर वाला हो जाता है, वह स्वर्ग आदि पुण्य लोकों में
प्रतिष्ठित होता है. (१७)
ततश्चैनमन्यया प्रतिष्ठया प्राशीर्यया चैतं पूर्व ऋषयः प्राश्नन्. अप्रतिष्ठानो ऽ
नायटनो मरिष्यसीत्येनमाह. तं वा अहं नार्वाञ्चं न पराञ्चं न प्रत्यञ्चम्.
सत्ये प्रतिष्ठाय. तयैनं प्राशिषं तयैनमजीगमम्. एष वा ओदनः सर्वाङ्गः
सर्वपरुः सर्वतनूः. सर्वाङ्गः एव सर्वपरुः सर्वतनूः सं भवति य एवं वेद..
(१८)
गुरु अपने शिष्य से कहे—“हे देवदत्त! पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने जिस प्रतिष्ठा के
माध्यम से इस ब्रह्मौदन का सेवन किया है उस के अतिरिक्त लौकिक प्रतिष्ठा के माध्यम से
तुम यदि इस ओदन का सेवन करोगे तो तुम बिना प्रतिष्ठा वाले और बिना घर के स्वामी हुए
मरोगे. इस के उत्तर में शिष्य अपने गुरु से निवेदन करे—मैंने इस ब्रह्मौदन का न पराङ्मुख
हो कर सेवन किया है, न सामने से सेवन किया है और न आत्माभिमुख हो कर सेवन किया
है. मैं ने सत्य में प्रतिष्ठित हो कर उस प्रतिष्ठा के माध्यम से इस ओदन का सेवन किया है. इस
ब्रह्मौदन को जहां जाना चाहिए था. मैं ने उसे वहीं पहुंचा दिया है. यह ओदन समस्त अंगों से
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