अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextआशाश्च सर्वा ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (६)
हम वायु की, मेघ की, आकाश की तथा दिशाओं की स्तुति करते हैं. हम सभी
विदिशाओं अर्थात् दिशाओं के कोनों की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (६)
मुञ्चन्तु मा शपथ्यादहोरात्रे अथो उषाः.
सोमो मा देवो मुञ्चतु यमाहुश्चन्द्रमा इति.. (७)
दिन, रात और उषाएं शपथ से उत्पन्न पाप से हमारी रक्षा करें. वे सोम देव मुझे पाप से
मुक्त करें, जिन्हें लोग चंद्रमा कहते हैं. (७)
पार्थिवा दिव्याः पशव आरण्या उत ये मृगाः.
शकुन्तान् पक्षिणो ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (८)
हम पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों, देवों, ग्रामीण पशुओं और सिंह आदि जंगली पशुओं
की स्तुति करते हैं. हम शकुन बने हुए पक्षियों की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें.
(८)
भवाशर्वाविदं ब्रूमो रुद्रं पशुपतिश्च यः.
इषूर्या एषां संविद्म ता नः सन्तु सदा शिवाः.. (९)
हम उन भव, शर्व, रुद्र और पशुपति की स्तुति करते हैं. हम इन देवों के बाणों को
जानते हैं. वे सदा हमारे लिए कल्याणकारी हों. (९)
दिवं ब्रूमो नक्षत्राणि भूमिं यक्षाणि पर्वतान्.
समुद्रा नद्यो वेशन्तास्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१०)
हम स्वर्ग की, नक्षत्रों अर्थात् तारों की, भूमि की, यक्षों और पर्वतों की स्तुति करते हैं. जो
सागर, नदियां और सरोवर हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (१०)
सप्तर्षीन् वा इदं ब्रूमो ऽ पो देवीः प्रजापतिम्.
पितॄन् यमश्रेष्ठान् ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (११)
हम उन सप्तर्षियों की, जल देवियों की और प्रजापति की स्तुति करते हैं. हम ऐसे
पितरों की स्तुति करते हैं, जिन में यमराज श्रेष्ठ हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (११)
ये देवा दिविषदो अन्तरिक्षसदश्च ये.
पृथिव्यां शक्रा ये श्रितास्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१२)
जो देव स्वर्ग में निवास करते हैं और अंतरिक्ष अर्थात् धरती और आकाश के मध्य
निवास करते हैं, जो देव पृथ्वी पर आश्रित हैं, वे हमें पाप से मुक्त करें. (१२)
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