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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 602 of 1063

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Page 602

प्राण अर्थात् सूर्य देव के द्वारा वर्षा के जल से सींची गई फसलें और जड़ीबूटियां सूर्य से
संभाषण करने लगती हैं—"हे प्राण अर्थात् सूर्य देव! तुम हमारा जीवन बढ़ाओ तथा हमें
शोभन गंध वाली बनाओ.” (६)
नमस्ते अ्रस्त्वायते नमो अस्तु परायते.
नमस्ते प्राण तिष्ठत आसीनायोत ते नमः.. (७)
हे प्राण देव! तुझ आते हुए को नमस्कार है और वापस जाते हुए को नमस्कार है. हे
प्राण देव! तुझ स्थिर रहने वाले को तथा बैठे हुए को नमस्कार है. (७)
नमस्ते प्राण प्राणते नमो अस्त्वपानते.
पराचीनाय ते नमः प्रतीचीनाय ते नमः सर्वस्मै त इंद नमः.. (८)
हे प्राण देव! सांस लेने का व्यापार करने वाले तुम्हें नमस्कार है तथा अपान वायु छोड़ने
वाले तुम्हें नमस्कार है. अधिक कहने से क्या लाभ है, समस्त व्यापार अर्थात् क्रियाएं करने
वाले तुम्हें नमस्कार है. (८)
या ते प्राण प्रिया तनूर्यो ते प्राण प्रेयसी.
अथो यद् भेषजं तव तस्य नो धेहि जीवसे.. (९)
हे प्राण देव! तुम्हारा प्रिय जो शरीर है एवं प्राण, अपान अर्थात् अग्नि और सोम रूपी
तुम्हारी जो दो प्रियाएं हैं तथा जो तुम्हारी अमरता प्रदान करने वाली ओषधि है, इन सब से
हमें जीवन के अमृत का साधन ओषधि प्रदान करो. (९)
प्राणः प्रजा अनु वस्ते पिता पुत्रमिव प्रियम्.
प्राणो ह सर्वस्येश्वरो यच्च प्राणति यच्च न.. (१०)
हे प्राण देव! समस्त प्रजाओं के शरीर में तुम इस प्रकार निवास करते हो, जिस प्रकार
पिता अपने वस्त्र से प्रिय पुत्र को ढकता है. प्राण उन सब के स्वामी हैं, जो सांस लेते हैं
अथवा सांस नहीं लेते हैं. (१०)
प्राणो मृत्युः प्राणस्तक्मा प्राणं देवा उपासते.
प्राणो ह सत्यवादिनमुत्तमे लोक आ दधत्.. (११)
ये प्राण देव ही मृत्यु करने वाले हैं एवं यही जीवन को कष्टमय बनाने वाले ज्वर हैं. शरीर
के मध्य में वर्तमान इन्हीं प्राण की देवगण उपासना करते हैं. (११)
प्राणो विराट् प्राणो देष्ट्री प्राणं सर्व उपासते.
प्राणो ह सूर्यश्चन्द्रमाः प्राणमाहुः प्रजापतिम्.. (१२)
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