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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 605

है. (२३)
यो अस्य सर्वजन्मन ईशे सर्वस्य चेष्टतः.
अतन्द्रो ब्रह्मणा धीरः प्राणो मानु तिष्ठतु.. (२४)
वह जगदीश्वर प्राण आलस्य रहित सदा सूर्य के रूप में विचरण करने वाला, ज्ञानवान
एवं सर्वव्यापक होने के कारण मेरा अनुवर्तन करे. (२४)
ऊर्ध्वः सुप्तेषु जागार ननु तिर्यङ्ङ नि पद्यते.
न सुप्तमस्य सुप्तेष्वनु शुश्राव कश्चन.. (२५)
हे प्राण! तुम ऊर्ध्वगामी हो कर निद्रा परवश प्राणियों में जागते रहो. सोने वाला प्राणी
निद्रा के वशीभूत हो जाता है. इसलिए उस की रक्षा हेतु तुम जाग्रत रहो. ऐसा किसी ने नहीं
सुना है कि मनुष्य के निद्रा पर वश होने पर उस का प्राण भी सो गया हो. (२५)
प्राण मा मत् पर्यावृतो न मदन्यो भविष्यसि.
अपां गर्भमिव जीवसे प्राण बध्नामि त्वा मयि.. (२६)
हे प्राण! आप मुझ से न तो विमुख हों तथा न मुझे त्याग कर अन्यत्र जाएं. जल जिस
प्रकार वाडवाग्नि को धारण करते हैं, उसी प्रकार हम अपनी देह में आप को धारण करते हैं.
(२६)
सूक्त-७ देवता—ब्रह्मचारी
ब्रह्मचारीष्णंश्चरति रोदसी उभे तस्मिन् देवाः संमनसो भवन्ति.
स दाधार पृथिवीं दिवं च स आचार्यं १ तपसा पिपर्ति.. (१)
वेदों का अध्ययन करने वाला अपने तप से धरती और आकाश दोनों में व्याप्त होता है.
इंद्र आदि सभी देव इस ब्रह्मचारी के प्रति अनुग्रह करते हैं. यह ब्रह्मचारी अपने तप से धरती
और स्वर्ग को धारण करता है तथा सन्मार्ग पर चलता हुआ अपने आचार्य का पालन करता
है. (१)
ब्रह्मचारिणं पितरो देवजनाः पृथग् देवा अनुसंयन्ति सर्वे.
गन्धर्वा एनमन्वायन् त्रयस्त्रिंशत् त्रिशताः षट्सहस्राः सर्वान्त्स देवांस्तपसा
पिपर्ति.. (२)
पितर, देवजन एवं इंद्र आदि सभी देव ब्रह्मचारी की रक्षा के लिए उस के पीछे चलते हैं.
गंधर्व भी ब्रह्मचारी का अनुगमन करते हैं. ब्रह्मचारी अपने तप से तैंतीस, तीस और छह हजार
संख्या वाले सभी देवों का पालन करता है. (२)
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