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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 603 of 1063

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Page 603

प्राण अर्थात् स्थूल प्रपंच का अभिमानी देवता ईश्वर प्राण है तथा अपनेअपने व्यापारों में
सब को प्रेरित करने वाला परम देवता प्राण है. अपने मनचाहे फल को पाने के लिए सभी
प्राण की उपासना करते हैं. प्राण सूर्य और चंद्रमा है तथा प्राण को ही ज्ञानी जन सब की
रचना करने वाला प्रजापति कहते हैं. (१२)
प्राणापानौ व्रीहियवावनड्‌वान् प्राण उच्यते.
यवे ह प्राण आहितो ऽ पानो व्रीहिरुच्यते.. (१३)
प्राण और अपान प्रधान प्राण की विशेष वृत्तियां हैं. प्राण ही गेहूं, जौ तथा अपान बैल
कहे जाते हैं. प्राण वायु जौ में आश्रित है तथा अपान वायु को ही गेहूं कहा जाता है. (१३)
अपानति प्राणति पुरुषो गर्भे अन्तरा.
यदा त्वं प्राण जिन्वस्यथ स जायते पुनः.. (१४)
पुरुष स्त्री के गर्भाशय के मध्य सांस लेता और अपान वायु छोड़ता है. हे प्राण! जब तुम
गर्भस्थ भ्रूण को पुष्ट करते हो, तब वह जन्म लेता है. (१४)
प्राणमाहुर्मातरिश्वानं वातो ह प्राण उच्यते.
प्राणे ह भूतं भव्यं च प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्.. (१५)
प्राण को मातरिश्वा अंतरिक्ष का स्वामी वायु कहा जाता है. उसी वायु को प्राण कहा
जाता है. उन दोनों में केवल नाम का भेद है. जगत् के आधार बने हुए उस प्राण में भूतकाल
से संबंधित और भविष्य काल में उत्पन्न होने वाला जगत् आश्रित रहता है. इस प्रकार प्राणों
में ही सब प्रतिष्ठित हैं. (१५)
आथर्वणीराङ्गिरसीर्देवीर्मनुष्यजा उत.
ओषधयः प्र जायन्ते यदा त्वं प्राण जिन्वसि.. (१६)
अथर्वा महर्षि द्वारा, अंगिरा महर्षि द्वारा, देवों द्वारा तथा मनुष्यों द्वारा उत्पन्न अनेक
प्रकार की जड़ीबूटियों और फसलों को हे प्राण! तुम ही वर्षा का जल प्रदान कर के प्रसन्न
करते हो. (१६)
यदा प्राणो अभ्यवर्षीद् वर्षेण पृथिवीं महीम्.
ओषधयः प्र जायन्तेऽथो याः काश्च वीरुधः.. (१७)
प्राण जब वर्षा के रूप में विशाल पृथ्वी पर जल गिराता है, तभी जड़ीबूटियां, फसलें
और जो भी वृक्ष हैं, वे सब उत्पन्न होते हैं. (१७)
यस्ते प्राणेदं वेद यस्मिंश्चासि प्रतिष्ठितः.
सर्वे तस्मै बलिं हरानमुष्मिंल्लोक उत्तमे.. (१८)
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