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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 614

उच्छिष्टे द्यावापृथिवी विश्वं भूतं समाहितम्.
आपः समुद्र उच्छिष्टे चन्द्रमा वात आहितः.. (२)
उच्छिष्ट अर्थात् होम करने के बाद बचे हुए भात में स्वर्ग, पृथ्वी तथा उन में स्थित प्राणी
आश्रित हैं. इस उच्छिष्ट में जल, सागर, चंद्रमा और वायु स्थित हैं. (२)
सन्नुच्छिष्टे असंश्चोभौ मृत्युर्वाजः प्रजापतिः.
लौक्या उच्छिष्ट आयत्ता वश्र द्रश्चापि श्रीमंयि.. (३)
उच्छिष्ट अर्थात् होम करने के बाद शेष बचे भात में सत् और असत् दोनों के अतिरिक्त
मृत्यु, मृत्यु का बल, प्रजापति तथा प्रजाएं स्थापित हैं. वरुण और सोम भी इस में स्थित हैं.
उन की कृपा से मुझ में भी श्री स्थित हो. (३)
दृढो दृंहस्थिरो न्यो ब्रह्म विश्वसृजो दश.
नाभिमिव सर्वतश्चक्रमुच्छिष्टे देवताः श्रिताः.. (४)
दृढ़ अंग वाला देव, दृढ़ होने के कारण स्थिर किया हुआ लोम, सभी प्राणी, जगत् का
कारण ब्रह्म, दस प्राण एवं सभी देवता हुतशिष्ट अर्थात् हवन करने के बाद शेष बचे भात में
उसी प्रकार आश्रित हैं, जिस प्रकार रथ का पहिया धुरी पर आश्रित रहता है. (४)
ऋक् साम यजुरुच्छिष्ट उद्गीथः प्रस्तुतं स्तुतम्.
हिङ्कार उच्छिष्टे स्वरः साम्नो मेडिश्च तन्मयि.. (५)
ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद के मंत्र, इन का गाया हुआ भाग एवं प्रस्तुत स्तुतियां
उच्छिष्ट अर्थात् होम के बाद बचे हुए भात में आश्रित हैं. सभी उद्गाताओं के द्वारा प्रयोग
किया जाता हुआ ‘हि’ शब्द, सामवेद के स्वर, सामवेद संबंधित वाणी—ये सब यज्ञ शेष के
लिए मुझ में स्थित हैं. (५)
ऐन्द्राग्नं पावमानं महानाम्नीर्महाव्रतम्.
उच्छिष्टे यज्ञस्याङ्गान्यन्तर्गर्भइव मातरि.. (६)
इंद्र और अग्नि की स्तुति से संबंधित सामवेद के मंत्र, तीनों में सोम देवता से संबंधित
सामवेद के मंत्र, महानाम्नी और महाव्रत नाम के स्तोत्र तथा यज्ञ के अंग होम के बाद बचे
भात में उसी प्रकार स्थित हैं, जिस प्रकार गर्भ माता के पेट में स्थित रहता है. (६)
राजसूयं वाजपेयमग्निष्टोमस्तदध्वरः.
अर्काश्वमेधावुच्छिष्टे जीवबर्हिर्मदिन्तमः.. (७)
राजसूय, वाजपेय और अग्निष्टोम नाम के यज्ञ हिंसा रहित हैं. अर्क, अश्वमेध, जीवबर्हि
तथा मादक सोमयाग—ये सभी उच्छिष्ट अर्थात् होम से शेष बचे भात में आश्रित हैं. (७)
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