अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextते रक्षति तपसा ब्रह्मचारी तस्मिन् देवाः संमनसो भवन्ति.. (८)
आचार्य ने उसी क्षण आकाश और धरती दोनों को जन्म दिया. ये दोनों विस्तृत और
गंभीर हैं. पृथ्वी विस्तृत है और आकाश गंभीर है. ब्रह्मचारी अपने तप से दोनों की चर्चा करता
है. उस ब्रह्मचारी से सभी देव प्रसन्न होते हैं. (८)
इमां भूमिं पृथिवीं ब्रह्मचारी भिक्षामा जभार प्रथमो दिवं च.
ते कृत्वा समिधावुपास्ते तयोरर्पिता भुवनानि विश्वा.. (९)
सब से पहले उत्पन्न ब्रह्मचारी ने इस विस्तृत भूमि को पहली भिक्षा के रूप में ग्रहण
किया. इस के बाद स्वर्ग को दूसरी भिक्षा के रूप में ग्रहण किया. वह भिक्षा में प्राप्त उन स्वर्ग
और धरती को समिधा बना कर अग्नि की परिचर्या अर्थात् सेवा करता है. स्वर्ग और पृथ्वी के
मध्य सभी प्राणी स्थापित किए गए हैं. (९)
अर्वागन्यः परो अन्यो दिवस्पृष्ठाद् गुहा निधी निहितौ ब्राह्मणस्य.
तौ रक्षति तपसा ब्रह्मचारी तत् केवलं कृणुते ब्रह्म विद्वान्.. (१०)
स्वर्ग के ऊपरी भाग से तथा उस के नीचे के भाग अर्थात् धरती पर वेद रूपी खजाने को
आचार्य की हृदयरूपी गुफा में छिपा दिया. दूसरा खजाना अर्थात् वेद के द्वारा प्रतिपाद्य देवों
को स्थापित किया. वेद पढ़ने वाले से संबंधित इन दोनों खजानों की रक्षा ब्रह्मचारी अपने तप
से करता है. वह वेद के रूप में उस के विषय ब्रह्म का ही साक्षात्कार करता है. (१०)
अर्वागन्य इतो अन्यः पृथिव्या अग्नी समेतो नभक्षी अन्तरेमे.
तयोः श्रयन्ते रश्मयो ऽ धि दृढास्ताना तिष्ठति तपसा ब्रह्मचारी.. (११)
इस स्वर्ग के नीचे एक सूर्यात्मक अग्नि है और दूसरी पृथ्वी के ऊपर है. इस स्वर्ग और
धरती के मध्य दोनों अग्नियां आपस में मिल कर उदय होती हैं. उन सूर्य और अग्नि से
संबंधित किरणें धरती और स्वर्ग के मध्य आश्रय लेती हैं. ब्रह्मचारी अपने तप की महिमा से
उन का देवता बनता है. (११)
अभिक्रन्दन् स्तनयन्नरुणः शितिङ्गो बृहच्छेपो ऽ नु भूमौ जभार.
ब्रह्मचारी सिञ्चति सानौ रेतः पृथिव्यां तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः.. (१२)
मेघों में गर्जन करता हुआ, जल पूर्ण मेघ को प्राप्त वह ब्रह्मचारी वरुण बन कर अपने
जलरूपी वीर्य को ऊंचे स्थानों पर बरसाता है. उस जल से धरती पर चारों दिशाएं प्राणियों
को धारण करती हैं. (१२)
अग्नौ सूर्ये चन्द्रमसि मातरिश्वन् ब्रह्मचार्य १ प्सु समिधमा दधाति.
तासामर्चींषि पृथगभ्रे चरन्ति तासामाज्यं पुरुषो वर्षमापः.. (१३)
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